आज हृदय परिवर्तन को लेकर अधिकांश मसीही लोग भ्रमित हैं। आज बहुत सारे लोग इस बात को सोचते हुए धोखे में हैं, कि वे बचाए गए हैं तथा मसीही हैं। क्योंकि उनका कहना है कि उन्होंने कलीसिया सभा में, या किसी कार्यक्रम में, या सभा में कई वर्ष पहले एक युवा शिविर में हाथ खड़ा किया या पापी की प्रार्थना किया था। कुछ कहते हैं कि उन्होंने यीशु के पीछे चलने का निर्णय लिया था इसलिए वे बचाए गए हैं! क्या वास्तव में पापी की प्रार्थना करना, किसी सभा में हाथ उठाना, या सभा के अंत में कलीसिया के सामने जाना, प्रार्थना को दोहराना ‘हृदय परिवर्तन’ है? आइये, इस लेख में हम देखने का प्रयास करें कि वास्तव में हृदय परिवर्तन क्या है?

हृदय परिवर्तन परमेश्वर का कार्य है। 

जब तक परमेश्वर पवित्र आत्मा हमें नया जन्म प्रदान न करें, हमारा हृदय परिवर्तन नहीं हो सकता है।

सबसे पहले इस बात को जानना हमारे लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि हृदय परिवर्तन परमेश्वर का कार्य है। जब तक परमेश्वर पवित्र आत्मा हमें नया जन्म प्रदान न करें, हमारा हृदय परिवर्तन नहीं हो सकता है। आखिर ऐसा क्यों? क्योंकि मनुष्य पूर्णता पापी है। बाइबल बताती है कि सबने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित है (रोमियों 3:23)। बाइबल मनुष्य की सम्पूर्ण भ्रष्टता, नैतिक अयोग्यता को उजागर करती है। मनुष्य इसलिए पाप करता है क्योंकि वह पूर्ण रूप से भ्रष्ट है। इसका अर्थ यह है कि पतित मनुष्य परमेश्वर के प्रकाशन को प्राप्त नहीं कर सकता है (मत्ती 16:17; यूहन्ना 6:44-45, 64-65; 1कुरिन्थियों 2:14)। वह परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकता है (रोमियों 8:6-8)। परमेश्वर के नियम का पालन नहीं कर सकता है (रोमियों 8:7)। वह स्वयं को बचा नहीं सकता क्योंकि वह मर चुका है (यहेजकेल 36:16; इफिसियों 2:1)। वह एक चलती फिरती लाश है, जैसे एक वायरस शरीर में घुसता है और पूरे शरीर को दूषित कर देता है। उसी प्रकार से पाप जो सबसे बड़ा वायरस है उसने हमें पूरे हृदय, सामर्थ व मन से प्रेम करने को विकृत कर दिया है। मनुष्य अपने आपको बचा नहीं सकता है। 

इसलिए हृदय परिवर्तन मुख्य रूप से कलीसिया के सामने जाने में, पापी की प्रार्थना करने में, किसी सभा में यीशु को ग्रहण करने के लिए हाथ खड़ा करने में, स्वयं निर्णय लेने में, एक बेहतर इंसान होने या कोशिश करने के बारे में नहीं है। हृदय परिवर्तन परमेश्वर का कार्य है। बाइबल बताती है, परन्तु परमेश्वर अपने प्रेम को हमारे प्रति इस प्रकार प्रदर्शित करता है कि जब हम पापी ही थे मसीह हमारे लिए मरा (रोमियों 5:8)। उसने हमारा उद्धार किया, यह हमारे द्वारा किए गए धर्म के कामों के आधार पर नहीं, परन्तु उसने अपनी दया के अनुसार अर्थात् पवित्र आत्मा द्वारा नए जन्म और नए बनाए जाने के स्नान से किया (तीतुस 3:5)। क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से हमारा उद्धार हुआ है ( इफिसियों 2: 8)। जब हमारा नया जन्म होता है, परमेश्वर हमें दो वरदान देते हैं, पश्चाताप और विश्वास का। ये सब एक ही समय में होता है। ये हमारे कार्य के कारण नहीं परन्तु यीशु मसीह के कार्य के कारण ही है। हृदय परिवर्तन में हमें परमेश्वर की आवश्यकता है। 

हृदय परिवर्तन पश्चाताप की मांग करता है। 

जॉन मुरे कहते हैं, ‘सुसमाचार न केवल यह है कि अनुग्रह से हम विश्वास के द्वारा बचाए जाते हैं बल्कि यह पश्चाताप का भी सुसमाचार है।’ परमेश्वर ने जो कार्य किया है अर्थात सुसमाचार हमारे प्रतिउत्तर की मांग करता है। क्योंकि उद्धार का काम हो चुका है। वो घटना घट चुकी है। यह हमारे प्रतिउत्तर की मांग करता है। जब पतरस ने पिन्तेकुस्त के दिन में सुसमाचार का प्रचार किया, उन्होंने जब यह सुना तो उनके हृदय छिद गए और वे पतरस तथा अन्य प्रेरितों से पूछने लगे, भाइयो हम क्या करें ? पतरस ने उनसे कहा, मन फिराओ… ( प्रेरितों के काम 2:37-38)।

पश्चाताप का अर्थ, अपने पाप को पहचानना, उसे परमेश्वर के सामने अंगीकार करना, और पाप से घृणा करना है। पापों से पश्चाताप करने का अर्थ, मन फिराना है। किन चीजों से मन फिराना है? हमें अपनी मूर्तियों से, अपने मृतक कार्यों से, अपने झूठे धर्म से, अपनी वासना से, अपने घमंड से, अपने स्वंय की धार्मिकता से फिरना चाहिए। पश्चाताप का अर्थ है कि उन सब बातों को पीछे छोड़ देना जो हमें परमेश्वर की ओर फिरने में बाधा पहुंचाती है, जैसे, समाज की इज्जत, लज्जा, लोगों की वाह-वाही सुनना, धन का लोभ, भविष्य की चिन्ता आदि। पौलुस कहता है कि, ‘मैं यहूदी तथा दोनों को ही दृढ़तापूर्वक साक्षी देता रहा कि परमेश्वर की ओर मन फिराओ और प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करो’ (प्रेरितों के काम 20:21)। 

हृदय परिवर्तन विश्वास की मांग करता है। 

पश्चाताप और विश्वास एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। यीशु ने कहा, ‘मन फिराओ और सुसमाचार पर विश्वास करो’ (मरकुस 1:15)। वेन ग्रुडेम के अनुसार, “हृदय परिवर्तन सुसमाचार की बुलाहट के प्रति हमारी इच्छुक प्रतिक्रिया है, जिसमें हम सच्चाई से अपने पापों से पश्चाताप करते हैं और उद्धार के लिए यीशु मसीह में अपना भरोसा रखते हैं।” एक मसीही क्या विश्वास करता है? वह यीशु मसीह के व्यक्तित्व और यीशु के कार्य पर भरोसा रखता है। दूसरे शब्दों में वह इस बात को जानता है और विश्वास करता है कि यीशु कौन है और उसने क्या किया है। नए जन्म होने के कारण एक मसीही व्यक्ति अपने पापों से पश्चाताप करता है, और सुसमाचार पर विश्वास करता है अर्थात यीशु के क्रूस पर किये हुये कार्य पर भरोसा रखता है। वह अभी यीशु मसीह को नए दृष्टिकोण से देखता है। इससे पहले यीशु मसीह उसके लिए केवल एक और धार्मिक शिक्षक था या ​गुरू या महापुरूष था परन्तु अब वह उसे एक मात्र सच्चे और जीवित परमेश्वर, संसार के उद्धारकर्ता, प्रभु के रूप में देखता है।

यीशु पर विश्वास करने का अर्थ यह नहीं कि हमारी बीमारी ठीक हो जाएगी, गरीबी दूर हो जाएगी, नौकरी लग जाएगी, या दुख, संकट से दूर हो जाऐंगे, या जीवन में सब कुछ अच्छा होगा। बाइबल बताती है विश्वास करने का अर्थ है कि यीशु मसीह, परमेश्वर का पुत्र है, और उसने जो उद्धार का कार्य  क्रूस पर पूरा किया है, उस पर भरोसा रखना है। हमारा विश्वास हवा में नहीं, हमारा विश्वास अंध-विश्वास नहीं है, किसी काल्पनिक कहानी पर नहीं बल्कि एक व्यक्ति पर अर्थात यीशु मसीह पर है। साथ ही साथ विश्वास कार्य में दिखाई देता है। हमारे व्यवहार में, आचरण में, छोटी- छोटी हरकतों में विश्वास दिखाई देता है। पौलुस थिस्सलुनीकी कलीसिया के विश्वासियों के हृदय परिवर्तन के बारे में बताता है, तुम मूर्तियों को छोड़कर परमेश्वर की ओर कैसे फिरे कि जीवित और सच्चे परमेश्वर की सेवा करो (1 थिस्सलुनीकियों 1:9)। थिस्सलुनीकी कलीसिया के विश्वासियों के विश्वास को हम कार्य में देख सकते हैं। याद रखें, हम केवल विश्वास से बचाए जाते हैं, लेकिन जो विश्वास बचाता है वह कभी अकेला नहीं होता है।

आज हमारा विश्वास किस पर है? आज हम क्या विश्वास करते हैं ? क्या हमारा विश्वास खोखला तो नहीं ? क्या हमारा विश्वास परमेश्वर के वचन पर आधारित है ? क्या हमारा विश्वास यीशु मसीह पर है ? बाइबल बताती है कि अपने आपको परख कर देखो कि तुम विश्वास में हो या नहीं। अपने आपको जांचो (2 कुरिन्थियों 13:5)। क्या आपने अपने पापों से पश्चाताप किया है और अपना विश्वास यीशु मसीह पर रखा है? यदि आपने ऐसा नहीं किया है, तो आप अभी भी अपने पाप में हैं और परमेश्वर के क्रोध के अधीन हैं। इसलिए यीशु मसीह के वचनों पर ध्यान दीजिए, जिसने कहा “मन फिराओ और सुसमाचार पर विश्वास करो।”

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