फादर क्रिसमस कौन थे?

जब हम क्रिसमस के विषय में सोचते हैं तो हमारे मस्तिष्क में सबसे पहले किसका चित्र उभर कर आता है? हम सबके मन में एक लाल व श्वेत वस्त्र पहने और टोपी लगाए हुए एक वृद्ध व्यक्ति का चित्र अवश्य ही उभर कर आता होगा, जो अपने हाथों में गिफ्ट लिए हुए है। इन्हें घरों की सजावटों में, बड़े मॉल की सजावटों में, चर्च के क्रिसमस कार्यक्रमों में देखा जा सकता है और बच्चे जब चर्च जाते हैं तो फादर क्रिसमस को अवश्य ही खोजते हैं। क्या आप वास्तव में जानते हैं कि फादर क्रिसमस कौन थे और उन्होंने क्या किया था? लोग इन्हें पारम्परिक रीति से क्रिसमस से जोड़कर देखते हैं। इन्हें सान्ता क्लॉज भी कहा जाता है। इस लेख के द्वारा हम फादर क्रिसमस से जुड़ी हुई कई रोचक बातों को जानेंगे – 

फादर क्रिसमस चौथी शताब्दी में मायरा (वर्तमान में तुर्की) के बिशप थे, जिनका नाम सन्त निकोलस था। उनके विषय में ऐसा कहा जाता है कि वह लोगों के प्रति बहुत उदार, और दयालु थे और वह बच्चों से बहुत प्रेम करते थे। वह निर्धनों की सहायता किया करते थे और क्रिसमस के समय में वह बच्चों को उपहार बाँटा करते थे। उनके जीवन के पश्चात, उनके प्रेम एवं उदार स्वभाव व कार्य के कारण तथा सन्त परम्परा के कारण लोगों ने उन्हें क्रिसमस से जोड़ दिया और फिर उन्हें फादर क्रिसमस कहा जाने लगा। अविश्वासी लोग भी फादर क्रिसमस को यीशु ख्रीष्ट के दूसरे विकल्प के रूप में स्वीकार करके क्रिसमस को मनाने लगे।

आज, जो लोग यीशु को नहीं जानते हैं, वे लोग क्रिसमस का चित्रण फादर क्रिसमस (सान्ता क्लॉज) को उपहार बाँटते हुए करते हैं। दुःख की बात तो यह है कि ख्रीष्टीय लोग भी अविश्वासियों के जैसे क्रिसमस का चित्रण सान्ता क्लॉज को उपहार बांटते हुए करने लगे हैं। वे लोग भी क्रिसमस से ख्रीष्ट को ही बाहर हटाने  का प्रयास करने लगे हैं। परन्तु क्रिसमस उस प्रभु यीशु ख्रीष्ट के विषय में है, जिस पर फादर क्रिसमस ने विश्वास किया और उसके अनुसार अपने जीवन को जिया तथा उसके लिए मूल्य भी चुकाया। 

फादर क्रिसमस का यीशु में विश्वास तथा उनका महत्वपूर्ण योगदान: 

प्रभु यीशु ख्रीष्ट के प्रति फादर क्रिसमस का विश्वास और योगदान बहुत महत्वपूर्ण और प्रासंगिक है। वह यीशु के विषय में बाइबल की खरी शिक्षा पर विश्वास करने वाले जन थे। वह यीशु ख्रीष्ट की द्वि-स्वाभाविक संयुक्ति (यीशु के दो स्वभाव मानवीय स्वभाव और ईश्वरीय स्वभाव) में दृढ़ विश्वास करते थे कि यीशु अपने परमेश्वरत्व में पूर्ण परमेश्वर है और अपने मनुष्यत्व में पूर्ण मनुष्य है। क्योंकि यीशु त्रिएक परमेश्वर का द्वितीय जन है, जो मनुष्य बनकर आया। वह अनन्तकाल का परमेश्वर है, अदृश्य परमेश्वर का प्रतिरूप है, उसी ने समस्त वस्तुओं की सृष्टि की है और उसी में सब वस्तुएँ स्थिर रहती हैं अर्थात् वह सृष्टिकर्ता और सृष्टि को सम्भालने वाला परमेश्वर है, जो देहधारी होकर संसार में आ गया (कुलुस्सियों 1:15-17)।

325 ईसवी में, सम्राट काँस्टेन्टीन की अध्यक्षता में नीकिया सभा का आयोजन किया गया, जिसमें यीशु के दो स्वभाव – परमेश्वरत्व और मनुष्यत्व तथा परमेश्वर के साथ उसके सम्बन्ध के विषय में पुष्टि किया जाना था। विधर्मी एरियस की शिक्षा को खण्डित करना था और यीशु ख्रीष्ट के विषय में बाइबल पर आधारित विश्वास वचन को प्रस्तुत करना था। उस सभा में सहभागी 300 बिशपों में से एक फादर क्रिसमस (सन्त निकोलस) भी थे। इस सभा में विधर्मी एरियस भी था, जिसने यीशु के परमेश्वरत्व को नकार दिया था और झूठी शिक्षा का प्रचार-प्रसार कर रहा था। उसने (एरियस ने) इस नीकिया की सभा में भी यीशु के विषय में झूठी शिक्षा हेतु बड़े उत्साह के साथ वाद-विवाद व तर्क किया। जब सब लोग एरियस के तर्क को सुन ही रहे थे, तभी सन्त निकोलस एरियस के झूठे दृढ़-कथनों और शिक्षा से खिन्न होकर अपने स्थान से उठे और जाकर एरियस के गाल पर थप्पड़ मार दिया, इस कार्य के लिए अन्य बिशपों के द्वारा उनकी कड़ी निन्दा की गई। उन्हें बन्दीगृह में डाल दिया गया, क्योंकि यह कार्य बिशप के चरित्र व गुणों के विपरीत था। इन सब बातों के पश्चात् सन्त निकोलस ने अपने इस व्यवहार के लिए क्षमा माँगी और उन्हें क्षमा भी किया गया तथा बन्दीगृह से स्वतंत्र कर दिया गया, फिर वह मायरा के बिशप के रूप में कार्य करते रहे।

फादर क्रिसमस (सन्त निकोलस) एरियस की शिक्षा के विरुद्ध थे, क्योंकि वह यीशु के परमेश्वरत्व को नकार रहा था। वह परमेश्वर पिता के साथ यीशु के अनन्त सह-अस्तित्व को नकार रहा था। वह कह रहा था कि यीशु केवल मनुष्य था, अनन्तकाल का परमेश्वर नहीं। वह कह रहा था कि “एक समय था, जब यीशु नहींं था”। यह शिक्षा बाइबल के आधार पर झूठी है क्योंकि कभी ऐसा समय ही नहीं था, जब यीशु अस्तित्व में न रहा हो। वह तो परमेश्वर पिता के साथ अनन्त सह-अस्तित्व में सर्वदा से है। 

सन्त निकोलस ने नीकिया की सभा में बड़ी सक्रियता के साथ अपना योगदान दिया था। वह नीकिया के विश्वास वचन के कई लेखकों में से एक थे, जो इस बात की पुष्टि करते हैं कि यीशु ख्रीष्ट सच में पूर्ण परमेश्वर और सच में पूर्ण मनुष्य हैं। सन्त निकोलस यीशु के लिए दोनों स्वभाव के पक्षधर थे और उसके लिए दृढ़तापूर्वक खड़े हुए। 

मुख्य बात यह है कि, वास्तविक फादर क्रिसमस वह जन थे जिन्होंने विधर्मी एरियस के द्वारा यीशु ख्रीष्ट को छोटा करते हुए सुना, तो सहन नहीं किया। क्योंकि वह यीशु ख्रीष्ट को केवल मनुष्य तक सीमित कर रहा था। फादर क्रिसमस (सन्त निकोलस) बाइबल की खरी शिक्षा से बहुत अधिक प्रेम करते थे। उनके जीवन का मुख्य केन्द्र यीशु ख्रीष्ट ही था। यीशु के विषय में उनका विश्वास पवित्रशास्त्र की शिक्षा के अनुसार सही था कि यीशु ख्रीष्ट अपने परमेश्वरत्व में पूर्ण परमेश्वर है और अपने मनुष्यत्व में पूर्ण मनुष्य है अर्थात् वह परमेश्वर-मनुष्य है।

जब हम यह नहीं जानते हैं कि वास्तव में यीशु कौन है, तो हमारे लिए क्रिसमस का अर्थ केवल पार्टी करना, गिफ्ट का आदान-प्रदान करना, सान्ता क्लॉज बनकर लोगों का मनोरंजन करना मात्र रह जाता है। इसीलिए आज क्रिसमस में लोग यीशु को महत्व देने के स्थान पर अन्य बातों को महत्व देते हैं और ऐसा करने के द्वारा क्रिसमस के वास्तविक यीशु ख्रीष्ट को अनदेखा कर देते हैं, सीमित कर देते हैं, या ख्रीष्ट के स्थान पर सान्ता क्लॉज को महत्व देते हैं। मैं सोचता हूँ कि यदि फादर क्रिसमस (सन्त निकोलस) आज के समय में जीवित होते तो उन लोगों को अवश्य डाँटते जो यीशु को महत्व नहीं दे रहे हैं तथा ख्रीष्ट-जन्मोत्सव से ख्रीष्ट यीशु को ही हटा दे रहे हैं।

प्रिय पाठको, मैं आप से आग्रह करना चाहूँगा कि इस क्रिसमस के अवसर पर हमारे जीवन के गन्तव्य को निर्धारित करने वाले एक प्रश्न पर अवश्य ही विचार करें, कि यीशु ख्रीष्ट कौन है? क्रिसमस का केन्द्र व आकर्षण वस्तुएँ और सान्ता क्लॉज नहीं है, परन्तु स्वयं यीशु ख्रीष्ट है जो परमेश्वर-मनुष्य है। जिस पर फादर क्रिसमस (सन्त निकोलस) ने विश्वास किया और जिसके लिए मूल्य को भी चुकाया। इसलिए ख्रीष्ट-जन्मोत्सव के आनन्द का केन्द्र-बिन्दु सान्ता क्लॉज को नहीं, परन्तु यीशु को बनाइए जो फादर क्रिसमस के जीवन व विश्वास का केन्द्र था।

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