परमेश्वर नीचे उतर आया

ख्रीष्ट जन्मोत्सव के आकर्षण का हमारे ऊपर एक विचित्र प्रभाव है, यहां तक कि अविश्वसियों और धर्मनिरपेक्ष प्रतीत होते हुए लोगों पर भी। इस उत्सव काल में एक प्रकार का आकर्षण पाया जाता है, एक प्रकार की “भावना” या “मोह” जो शीतकालीन संक्रांति उत्सव को आज भी पाश्चात्य देशों में तीव्रता से बढ़ते हुए उत्तर-ख्रीष्टीय समाज में उतना ही बड़ा बना देता है, जितना कि 1950 के दशक में था। 

ख्रीष्ट जन्मोत्सव में यह चुम्बकीय आकर्षण क्यों है, यहां तक कि ऐसे समाज में भी जिसने ख्रीष्ट में अपने उद्गम को समाप्त करने का प्रयास किया है? ख्रीष्ट जन्मोत्सव का वास्तविक मोह, उपहार और मिठाइयों, नए खिलौने और प्रचलित परम्पराओं, तथा घर के अन्दर गर्मी और बाहर हिमपात में नहीं है। ख्रीष्ट जन्मोत्सव के मुख्य केन्द्र में जो पाया जाता है, और जो “सत्य को दबाने” का प्रयास करने वाले प्राणों से भी फुसफुसाता है (रोमियों 1:18), वह संसार के इतिहास का सबसे आश्चर्यजनक और महत्वपूर्ण तथ्य है: कि स्वयं परमेश्वर हमारे समान बन गया। वह परमेश्वर जिसने हमारे संसार को बनाया और हम मनुष्यों को अपनी रचना के शीर्ष पर रखा, वह हमारे संसार में मनुष्य बनकर आया मात्र दिखावा करने के लिए नहीं, परन्तु हमारे उद्धार के लिए।

ख्रीष्ट जन्मोत्सव अलौकिक है। और हमारा प्रकृतिवादी समाज भीतर ही भीतर प्रकृति से परे अन्य बात के लिए लालायित है, किन्तु विरले ही इस बात को स्वीकार करता है, बिना इस बात को जाने कि अन्ततः ऐसा क्यों है। ख्रीष्ट जन्मोत्सव मानव प्राण में कुछ रहस्यमयी बात को स्पर्श करता है और हमें लुभाता है, ऐसा तब भी जब यह अविश्वास का अंगीकार करने वाले मस्तिष्क से असंगत होता है।

वह स्वर्ग से आया 

हम में से जो ख्रीष्ट जन्मोत्सव के ख्रीष्ट को आनन्दपूर्वक स्वीकार करते हैं — अपने प्रभु, उद्धारकर्ता, और महानतम कोष के रूप में — हम जानते हैं वास्तव में ख्रीष्ट जन्मोत्सव इतना मन्त्रमुग्ध करने वाला क्यों है। क्योंकि इसके केन्द्र में अलौकिक(ता) का सार पाया जाता है: परमेश्वर स्वयं हमारे जगत में प्रवेश कर रहे हैं। ख्रीष्ट जन्मोत्सव में परमेश्वर नीचे “उतर आया” (उत्पत्ति 11:5), न केवल मनुष्य के पाप से निर्मित बाबेल को देखने के लिए, और न ही केवल बाहर से धर्मी न्याय को कार्यविन्त करने के लिए नहीं, परन्तु मानव होने और भीतर से अपनी दया का कार्य करने के लिए।

ख्रीष्ट जन्मोत्सव की महिमा यह नहीं है कि यह किसी महान धार्मिक अगुवे के जन्म का प्रतीक है, परन्तु यह कि यह स्वयं परमेश्वर के दीर्घ-प्रतीक्षित आगमन का उत्सव मनाता है — वह आगमन जिसके लिए परमेश्वर ने हमारे प्राणों को आरम्भ से ही लालायित रहने के लिए बनाया था। “हे बैतलहम… तुझ में से एक पुरुष निकलेगा जो इस्राएल पर प्रभुता करेगा। उसका निकलना प्राचीनकाल से वरन् अनादिकाल से है” (मीका 5:2)।

आकाश मग्न और पृथ्वी आनन्दित हो,

 समुद्र और उसमें की सब वस्तुएं हर्षनाद करें;

 मैदान और जो कुछ उसमें है सब प्रफुल्लित हों। 

तब वन के सब वृक्ष आनन्द से जयजयकार करेंगे

यह यहोवा के सामने हो, क्योंकि वह आ रहा है, 

क्योंकि वह जगत का न्याय करने के लिए आ रहा हैं।

 वह धार्मिकता से जगत का न्याय करेगा,

 और सच्चाई से देश देश के लोगों का न्याय करेगा। (भजन संहिता 96:11-13)

परमेश्वर ने जो पहले ख्रीष्ट जन्मोत्सव पर तेजस्वी रूप से प्रकट किया, वह यह है कि जब वह अन्ततः स्वयं आता है, तो वह बादल या हवा या आग या भूकम्प में नहीं या यहां तक एक शान्त, छोटी वाणी में भी नहीं। परन्तु वह अपनी रचना की पूर्णता में आता है: एक मानव के रूप में। वह हम में से एक के नाई आता है, और ऐसा करने के द्वारा हमारी प्रजाति को प्रतिष्ठित करता है। वह आकाश के पक्षी, मैदान के पशु, या बड़े समुद्री जीव के रूप में नहीं आता है। बात करने वाले सिंह से भी अधिक प्रभावशाली बात है कि परमेश्वर स्वयं पूर्ण मानव के रूप में है। ख्रीष्ट जन्मोत्सव उसके “मनुष्यों की समानता में जन्म लेने” का प्रतीक है — वही परमेश्वर जिसने मनुष्य को बनाया, और हमारे पापों को बड़े धैर्य के साथ सहन किया, अब लज्जाजनक रीति से “मानव रूप में पाया गया” (फिलिप्पियों 2:7-8)।

वह दास के रूप में आया

यह बहुत ही आश्चर्य की बात है कि वह वास्तव में “नीचे आया”। परन्तु जब उसने यह किया, तो वह मानवीय महिमा और आराम और प्रतिष्ठा में नहीं आया, परन्तु उसने “अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया कि दास का स्वरूप धारण कर लिया” (फिलिप्पियों 2:7)। वह न केवल एक प्राणी के रूप में आया, परन्तु दरिद्रता, निर्बलता, नम्रता में आया। वह एक ऐसे जन के रूप में आया जो रात्रि भोजन से उठा,

और अपने वस्त्र उतार कर एक तरफ रख दिए और तौलिया लेकर अपनी कमर बाँधी। तब उसने एक बर्तन में पानी भरा और चेलों के पैर धोए तथा जिस तौलिए से उसने अपनी कमर बाँध रखी थी उस से उनके पैर पोंछने लगा। (यूहन्ना 13:4-5)

कुछ क्षणों के लिए, रूपांतरण पर्वत पर, उसके तीन चेलों ने उस ईश्वरीय-मानवीय महिमा की एक झलक देखी जिसके लिए वह ठहराया गया था। “उनके सामने उसका रूपान्तर हुआ। और उसका मुख सूर्य के समान चमक उठा, और उसके वस्त्र प्रकाश के समान स्वेत हो गए।” (मत्ती 17:2)। परन्तु जिस यीशु को वे जानते थे, दिन प्रतिदिन गलील के पिछड़े हुए क्षेत्र की सड़कों पर चलते हुए, वह कोई गणमान्य व्यक्ति नहीं था। “लोमड़ियों के भट और आकाश के पक्षियों के घोंसले होते हैं, पर मनुष्य के पुत्र के लिए सिर छिपाने के लिए भी कोई स्थान नहीं” (लूका 9:58)। उनके शिष्यों ने पहली बार सीखा कि “यहाँ तक कि मनुष्य का पुत्र भी सेवा कराने नहीं वरन् सेवा करने आया था” (मरकुस 10:45)।

मृत्यु की सीमा तक

इस प्रकार की सेवा, जीवन की मात्र असुविधाओं से बढ़कर कहीं गहराई से, अमूल्य आत्म-त्याग से भरकर, अंतिम बलिदान में प्रवाहित हुई। वह केवल सेवा करने ही नहीं परन्तु “बहुतों की फिरौती के मूल्य में प्राण देने” आया (मरकुस 10:45)।

अपने लोगों के पैर धोना तो एक बात थी। यह घटना अविस्मरणीय थी, किन्तु यह उसकी सच्ची सेवा का मात्र एक छोटा सा पूर्वानुभव था। मगर भोज पर से उठना, उनको बगीचे में ले जाना, व्यथा में अपने बंदीकर्ताओं की प्रतीक्षा करना, और वास्तव में यन्त्रणादायक मार्ग पर अकेले चलना जिसकी ओर पैर धोने की घटना एक संकेत कर रही थी, यह तो अलग ही बात थी: “उसने स्वयं को दीन किया और यहां तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु वरन् क्रूस की मृत्यु भी सह ली” (फिलिप्पियों 2:8)।

अपने लोगों को बचाने के लिए

परन्तु यह केवल स्वर्ग से उतरना ही नहीं था, एक सेवक के रूप में, मृत्यु की सीमा तक। यह किसी उद्देश्य हेतु उतरना था। यह नम्रता का एक उद्देश्यपूर्ण कार्य था। जिस मृत्यु के लिए स्वयं परमेश्वर मरने आया था वह इतिहास की कोई दुर्घटना नहीं थी। वह मरने के लिए आया था, और फिर से जीने के लिए। उसके लोगों के विद्रोह की व्यापकता की तुलना, जिसको कि अन्ततः परास्त किया गया, केवल उसके अंतिम बलिदान की व्यापकता के द्वारा ही किया जा सकता है। ऐसा करने के द्वारा उसने हमें प्रेम के हृदय को दर्शाया — अर्थात स्वयं अपना और अपने पिता के हृदय को।  “परमेश्वर अपने प्रेम को हमारे प्रति इस प्रकार प्रदर्शित करता है कि जब हम पापी ही थे मसीह हमारे लिए मरा” (रोमियों 5:8)।

लोगों के विद्रोह की व्यापकता की तुलना, जिसको कि अन्ततः परास्त किया गया, केवल उसके अंतिम बलिदान की व्यापकता के द्वारा ही किया जा सकता है।

ख्रीष्ट जन्मोत्सव का मोह केवल इतना नहीं है कि स्वयं परमेश्वर मनुष्य के रूप में स्वर्ग से आया। और केवल इतना नहीं कि उसने दूसरों की आवश्यकता को पूरा करने के लिए स्वयं को दास के जैसे दीन किया। और केवल यह भी नहीं कि वह मरने के लिए आया था, मृत्यु तक अपनी सेवा को प्रकट करने हेतु। मोह इस बात में है यह है कि वह नीचे आया, और वह सब उसने हमें बचाने के लिए किया। उस घोषणा के समय से ही परमेश्वर के दूत की यही प्रतिज्ञा थी: “तू उसका नाम यीशु रखना, क्योंकि वह अपने लोगों का उनके पापों से उद्धार करेगा।” (मत्ती 1:21)।

वह हमें पाप से बचाने और हमें उस अन्तिम आनन्द में पुनः स्थापित करने के लिए आया, जिसके लिए हम बनाये गये थे: उसको जानने और उसका आनन्द लेने के लिए। वह हमें “अपने साथ” मेल कराने के लिए आया था। (कुलुस्सियों 1:20)। वह हमें व्यावसायिक ख्रीष्ट जन्मोत्सव के बाहरी आकर्षणों को प्रदान करने के लिए नहीं आया था, परन्तु वह “पापों के लिए एक ही बार मर गया, अर्थात अधर्मियों के लिए धर्मी, जिस से वह हमें परमेश्वर के समीप ले आए” (1 पतरस 3:18)।

डेविड मैथिस desiringGod.org के कार्यकारी संपादक हैं और मिनियापोलिस/सेंट में सिटीज चर्च में पासबान हैं।
Share on facebook
Share on twitter
Share on whatsapp
Share on email
Share on facebook
Share on twitter