मृत्यु तक यीशु के पीछे चलते रहिए।

‘प्राण देने तक विश्वासी रह’ (प्रकाशितवाक्य 2:10)

‘यीशु के पीछे मैं चलने लगा, न लौटूँगा, न लौटूँगा…’ यह ख्रीष्टीय लोगों के मध्य एक प्रसिद्ध गीत है जिससे हम बहुत सुपरिचित होंगे। यह गीत विश्वास की एक सत्य घटना पर आधारित है। यह गीत विश्वास के लिए सताव के मध्य परमेश्वर की असीम सामर्थ्य और अद्भुत कार्य का वर्णन करता है। इसके पीछे की रोंगटे खड़े कर देने वाली सच्ची घटना है जो हमें मृत्यु तक यीशु के पीछे चलने के लिए नित्य प्रेरित करती है। यह घटना परमेश्वर के अद्भुत योजना और बचाने की सामर्थ्य को प्रतिबिम्बित करती है। आइए हम संक्षेप में इस गीत के पीछे की सत्य घटना को जानें –

इंग्लैण्ड के पास एक छोटा सा देश वेल्स है। लगभग 150 वर्ष पहले, वेल्स में एक महान आत्मिक जागृति हुई थी। इसके परिणामस्वरूप, सुसमाचार प्रचार-प्रसार के लिए कई सुसमाचार-प्रचारक उत्तर-पूर्व भारत आए। उसमें से कुछ असम क्षेत्र में जनजातियों के मध्य गए।

असम का यह क्षेत्र सैकड़ों खतरनाक जनजातियों से भरा हुआ था, जो असभ्य और आक्रामक सिर-शिकारी (Head Hunter) थे। वहाँ की स्थिति यह थी कि यदि कोई पुरुष विवाह करना चाहता था, तो जितना अधिक वह सिर के कंकाल इकट्ठे कर लेता था, उसे उतना ही अधिक विवाह योग्य समझा जाता था।

इन आक्रामक और भयंकर लोंगो के मध्य में, अमेरिकी बैपटिस्ट सुसमाचार-प्रचारकों का एक समूह उनके मध्य पहुँचा। उन्होंने इस समुदाय को यीशु के विषय में बताया। ऐसे लोगों के मध्य सुसमाचार प्रचार करना बहुत ही मुश्किल था, और वहाँ पर उन लोगों को विरोध का सामना करना पड़ा। उनके सुसमाचार प्रचार के प्रतिउत्तर में उनका बहुत विरोध हुआ। किन्तु इन परिस्थितियों के मध्य में प्रभु जी ने दया दिखाई और एक व्यक्ति (नोकसेंग) को बचा लिया। 

इस व्यक्ति के बारे में ऐसा बताया जाता है कि उसने विश्वास किया और उसने सुसमाचार दूसरों को बताना आरम्भ किया। उसके सुसमाचार प्रचार के कारण उसकी पूरी जाति के लोग तथा गाँव उसके विरोध में हो गए। 

एक दिन ऐसा हुआ कि यीशु के पीछे चलने के कारण उसे उसकी पत्नी एवं दो बच्चों समेत पकड़ा गया और गाँव में सबके सामने उन्हें खड़ा किया गया। उस गाँव का जो मुखिया था, उसने कहा, “तुम जो इस विदेशी परमेश्वर के पीछे चल रहे हो, उसकी आराधना बन्द करो।, यदि तुम उसकी आराधना करना बन्द नहीं करोगे तो तुम्हारे जो जवान बेटे हैं उनको अभी तीर से मार दिया जायेगा।” उसके बच्चों को जान से मारने की धमकी वास्तव में भयभीत करने वाली रही होगी, क्योंकि उन लोगों के लिए किसी की जान लेना बहुत ही सामान्य बात थी।

किन्तु उस व्यक्ति ने ऐसी स्थिति में अपनी भाषा में बोला –

“यीशु के पीछे मैं चलने लगा, न लौटूँगा, न लौटूँगा” 

उस व्यक्ति के मना करने पर क्रोधित होकर, मुखिया ने अपने धनुर्धारियों को दोनों बच्चों पर तीर चलाने का आदेश दिया। दोनो तीर के प्रहार से भूमि पर गिर गए और उनकी मृत्यु हो गई। 

कबीले का जो मुखिया है, उसने कहा, “तुम्हारे दो बच्चे मारे जा चुके हैं, अब तुम्हारी पत्नी बची है, बताओ क्या किया जाए? अभी तुमने अपने दोनों बच्चों को खोया है। यदि तुम अपने विश्वास का इनकार नहीं करोगे तो तुम्हारी पत्नी को भी मार दिया जाएगा।” 

किन्तु उस व्यक्ति ने उत्तर दिया:

“गर कोई मेरे साथ न आए, न लौटूँगा, न लौटूँगा”

मुखिया ने उसकी पत्नी पर भी दया नहीं दिखाई और रोष के साथ उसने उसकी पत्नी पर तीर चलाने का आदेश दिया। एक क्षण में अपने दो बच्चों के साथ वह भी मार दी गई। मुखिया ने उस व्यक्ति से कहा, “तुम्हारे बच्चे मर चुके हैं, तुम्हारी पत्नी भी मार दी गई है। अब तुम्हारी बारी है।” अब उसने अन्तिम बार पूछा कि सम्भवत: बच्चे और पत्नी के मरने के बाद तो वह विश्वास से मुकरेगा। इसलिए उसने कहा, “मैं तुम्हें विश्वास को नकारने और जीवित रहने का एक और अवसर दूँगा।” 

किन्तु अपने बच्चों और अपनी पत्नी की लाश देखते हुए भी उस व्यक्ति ने यीशु का इनकार नहीं किया और कहा:

“संसार को छोड़कर, सलीब को लेकर, न लौटूँगा, न लौटूँगा।”

यीशु का इनकार न करने के कारण उसे भी उसके परिवार के बाकी लोगों के समान मार डाला गया। 

किन्तु कहानी यहीं पर समाप्त नहीं हुई। उसकी मौत के बाद ऐसा हुआ जिसकी कल्पना उन लोगों ने नहीं की होगी। वह मुखिया, जिसने हत्या करने का आदेश दिया था, प्रभु ने उसके हृदय में कुछ किया। वह उस व्यक्ति के विश्वास से हिल गया था। उसने सोचा, “यह व्यक्ति, उसकी पत्नी और दो बच्चों को एक ऐसे व्यक्ति के लिए क्यों मरना चाहिए जो एक दूसरे देश में रहता था? प्रभु ने उसके हृदय में काम किया और उसने यीशु पर विश्वास किया। उस व्यक्ति के परिवार के बलिदान स्वरुप वहाँ का मुखिया और गाँव वालों ने यीशु के पीछे चलना आरम्भ किया। 

नोकसेंग के मरने से पहले जो उसने अपने विश्वास का अंगीकार किया तथा यीशु के पीछे चलने के अपने निर्णय को कहा, उन शब्दों को भारतीय मिशनरी साधु सुन्दर सिंह ने गीत में ढ़ाला। और इस गीत को हम तथा संसार भर में विभिन्न भाषाओं में लोग अभी भी गाते हैं। 

यह सच्ची घटना हमें स्मरण दिलाती है कि यीशु के पीछे चलना स्वयं का इनकार करना है। यह हमें यीशु के पीछे प्रत्येक परिस्थिति में चलने के लिए उत्साहित करता है, चाहे हमारे परिवार को हमसे छीन लिया जाए या हमें भी क्यों न मार दिया जाए। 

आइये हम भी इस गीत के द्वारा स्वयं को स्मरण दिलाएँ, और यीशु के पीछे समर्पित होकर चलें। चाहे कोई हमारे साथ आए या न आए, हम अपना क्रूस उठाएँ और यीशु का अनुसरण करें। हडसन टेलर ने ऐसा कहा है, “क्रूस उठाकर चलने का अर्थ यीशु के पदचिन्हों का अनुसरण करना है। और उसके पदचिन्हों पर, तिरस्कार, हृदय का टूटना, सताव और मृत्यु है… क्या आप उसके पदचिन्हों पर चलना चाहते हैं?”

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नीरज मैथ्यू
नीरज मैथ्यू
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