क्यों परमेश्वर पुत्र को ही देहधारी होना पड़ा?

सम्पूर्ण संसार में यह एक बहुत ही अद्भुत घटना हुई कि इस संसार में परमेश्वर पुत्र ख्रीष्ट यीशु का जन्म आज से लगभग दो हज़ार वर्ष पूर्व बैतलहम में जन्म हुआ। यह वास्तव में एक ही बार हुआ कि परमेश्वर पुत्र देहधारण करके इस जगत में एक बच्चे के रूप में जन्म लिया। और पूरा संसार क्रिसमस के नाम से उसके जन्म दिन को स्मरण करता है और हर्षोल्लास के साथ ख्रीष्टजन्मोत्सव को मनाता है। 

किन्तु आइए ध्यान दें कि ऐसा क्या कारण था कि इस संसार में परमेश्वर पिता को अपने एकलौते पुत्र को भेजना पड़ा? 

यीशु का कुंवारी मरियम के गर्भ से जन्म लेने का उद्देश्य यह था कि वह लोगों को पापों की दासता से छुड़ाए।

हमारे स्थान पर व्यवस्था की समस्त माँगो पूरा करे (मत्ती 5:17)। 

सम्पूर्ण मानव इतिहास में, सम्पूर्ण इस्राएली लोगों में कोई भी ऐसा नहीं था, जो परमेश्वर द्वारा दिए गए व्यवस्था के प्रत्येक माँगों को पूरा किया हो। यीशु ने व्यवस्था के अनुसार पवित्र जीवन जिया। उसने अपने सोचने, बोलने एवं कार्यों द्वारा कोई कुछ भी पाप नहीं किया। वह व्यवस्था की समस्त माँगों को पूरा करने के लिए आया, “यह न समझो कि मैं व्यवस्था या नबियों की पुस्तकों को नष्ट करने आया हूँ, नष्ट करने नहीं, परन्तु पूर्ण करने आया हूँ”(मत्ती 5:17)। हम अपने पाप के कारण वैसा जीवन नहीं जी सकते थे, जैसा हमसे माँग की गई थी। इसलिए केवल ख्रीष्ट यीशु ने परमेश्वर पिता की आज्ञाकारिता में जीवन जिया और उद्धार सम्बन्धित समस्त माँगों को पूरा करते हुए उद्धार का कार्य पूर्ण किया। 

ताकि हमारे लिए सिद्ध बलिदान बने (इब्रानियों 9:11-14):

हम सब अपने पाप के कारण परमेश्वर की उपस्थिति में जा नहीं सकते थे। पुराने नियम में व्यवस्था के अनुसार बार-बार पापों के प्रायश्चित के रूप में बलिदान की आवश्यकता होती थी। किन्तु यीशु ने अपने लहू द्वारा सदा के लिए एक ही बार में पवित्रस्थान में प्रवेश कर हमारे लिए अनन्त छुटकारा प्राप्त किया। वह परमेश्वर की पूर्व नियोजित योजना के अनुसार मरा और जी उठा’ (प्रेरितों 2:22-24)। उसने स्वयं के पापों के लिए बलिदान नहीं चढ़ाया किन्तु हमारे लिए वह स्वयं सदा का, एक बार में ही अपने आप को परमेश्वर के सम्मुख हमारे पापों के बदले में चढ़ा दिया। इसलिए अब कोई भी यीशु के बलिदान से बढ़कर अन्य कोई उत्तम बलिदान नहीं चढ़ा सकता था। अब यीशु ही एकमात्र सर्वश्रेष्ठ, सिद्ध बलिदान है, अब हमें किसी और की आवश्यकता नहीं है। उसका बलिदान हमारे पापों का दाम चुकाने के लिए पर्याप्त है।

यीशु ख्रीष्ट ने चरनी में एक बालक के रूप में जन्म लिया ताकि वह अपने पिता की उद्धार की योजना को पूरी करने के लिए मर सके।

ताकि वह शैतान के सिर को कुचले (उत्पत्ति 3:15):

जब आदम हव्वा ने परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करते हुए पाप किया तो उसने उन्हें दण्ड दिया। उसने सर्प और स्त्री के वंश के विषय में सर्प से कहा, “मैं तेरे और इस स्त्री के बीच में, तथा तेरे वंश और इसके वंश के बीच में, बैर उत्पन्न करूँगा; वह तेरे सिर को कुचलेगा, और तू उसकी एड़ी को डसेगा” (उत्पत्ति 3:15)। यहाँ पर सर्प के सिर को कुचलने की प्रतिज्ञा की गई थी जो स्त्री के वंश से आएगा, जो अन्तत: यीशु में आकर पूरी होती है जो वास्तव में शैतान के सिर को क्रूस पर कुचलता है अर्थात उसे पराजित करता है। और आदम ने जब पाप किया तो इस प्रतिज्ञा के बाद बहुत से लोग हुए जिनको देख के ऐसा लगा कि सम्भवत: वे प्रतिज्ञात स्त्री का वंश हैं, किन्तु सब असफल हुए। और अन्ततोगत्वा, यह प्रतिज्ञा केवल ख्रीष्ट यीशु में पूरी होती है। वह देहधारी हुआ ताकि शैतान का सिर कुचले अर्थात शैतान को परास्त करे। यीशु ने जन्म लिया ताकि वह अन्धकार की शक्तियों एवं मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु मृत्यु की ही मृत्यु कर दे। वह आया ताकि शैतान के कार्यों को नष्ट करे(1 यूहन्ना 3:8)। ख्रीष्ट ने अपनी मृत्यु के द्वारा हमारे विरुद्ध लिखे गए सभी अभिलेखों को मिटा डाला (कुलुस्सियों 2:14-15)। अब हम परमेश्वर के राज्य में ख्रीष्ट के कारण हैं। 

यीशु ने जन्म लिया ताकि वह अन्धकार की शक्तियों एवं मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु मृत्यु की ही मृत्यु कर दे।

ताकि मृत्यु के भय से हमें स्वतन्त्र करे- (1 कुरिन्थियों 15:55) 

यीशु देहधारण करके आया ताकि जो मृत्यु के भय में हैं, वह उनको मृत्यु के भय से छुड़ाए। उसने मृत्यु को निगल लिया। वह क्रूस पर मारा गया, गाड़ा गया और तीसरे दिन मृतको में से जी उठा। संसार में सब मृत्यु से भयभीत थे, मृत्यु जो सबसे बड़ा शत्रु है, उसको उसने पराजित कर दिया। उसने शैतान के सबसे बड़े हथियार मृत्यु की ही मृत्यु कर दी। एक प्रभु के सेवक जॉन ओवेन ने ऐसा कहा कि- “यीशु की मृत्यु में मृत्यु की मृत्यु हो गई।” इसलिए अब कोई भय नहीं, कोई दासता नहीं। अब केवल ख्रीष्ट में भयरहित जीवन है। 

ताकि हमारे पापों से हमारा उद्धार करे (मत्ती 1:21)

यीशु के विषय में सम्पूर्ण बाइबल बात करती है। यीशु के जन्म लेने के हज़ारो वर्ष पूर्ण परमेश्वर की ओर से भविष्यवक्ताओं ने उसके जन्म के विषय में भविष्यवाणी की थी। और यही नहीं, किन्तु यीशु के माता-पिता को भी उसके जन्म के विषय में स्वर्गदूत द्वारा सन्देश मिला। इसके साथ ही उन्हें यीशु के इस संसार में जन्म लेने का उद्देश्य भी पता चला कि “ वह अपने लोगों का उनके पापों से उद्धार करेगा” (मत्ती 1:21) यीशु का कुंवारी मरियम के गर्भ से जन्म लेने का उद्देश्य यह था कि वह लोगों को पापों की दासता से छुड़ाए। पापी केवल परमेश्वर पुत्र के लहू से ही बचाए जा सकते हैं। इसलिए ख्रीष्ट यीशु इस संसार में पापियों का उद्धार करने के लिए आया (1 तीमुथियुस 1:15)। 

यीशु देहधारण करके आया ताकि जो मृत्यु के भय में हैं, वह उनको मृत्यु के भय से छुड़ाए।

ताकि उद्धार का कार्य पूर्ण कर परमेश्वर की महिमा करे (यूहन्ना 8:49,17:4-5)

यीशु ख्रीष्ट ने चरनी में एक बालक के रूप में जन्म लिया ताकि वह अपने पिता की उद्धार की योजना को पूरी करने के लिए मर सके। परमेश्वर अपने ईश्वरत्व में मर नहीं सकता, किन्तु परमेश्वर-मनुष्य ख्रीष्ट यीशु मनुष्यत्व में मर सकता था। यह बहुत ही अद्भुत बात है कि ‘यीशु ख्रीष्ट जो आदि से पिता के साथ था और वह देहधारण कर इस संसार में आया’ (1 यूहन्ना 1:1-2)। उसने पुराने नियम में हुई अपने सम्बन्धित सभी भविष्यवाणियों को अपने जीवन, कार्य, मृत्यु द्वारा पूर्ण किया। परमेश्वर ने यशायाह के द्वारा अपने पुत्र के दुख उठाने और उसके लोगों के लिए बलिदान होने और महिमान्वित किए जाने की भविष्यवाणी की थी (यशायाह 53:3-12)। और अब यीशु ने उद्धार के कार्य को पूर्ण कर, हमारे पापों को धोकर ऊंचे पर महामहिमन् की दाहिनी ओर बैठा है(इब्रानियों 1:3)।

अत: जब हम इस वर्ष पुन: ख्रीष्टजन्मोत्सव को मनाने की तैयारी कर रहे हैं। आइए हम ख्रीष्ट के इस संसार में देहधारण के उद्देश्य को स्मरण रखें। हम दूसरों के साथ ख्रीष्ट के देहधारण के उद्देश्य को स्मरण दिलायें। यह सन्देश सबको सुनाएं कि हमारे प्रभु यीशु ख्रीष्ट को छोड़ “किसी दूसरे के द्वारा उद्धार नहीं, क्योंकि स्वर्ग के नीचे मनुष्यों में कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया है जिसके द्वारा हम उद्धार पाएं” (प्रेरित 4:12)। 

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