महिमान्वीकरण को ध्यान में रखते हुए जीवन जीओ।

मुझे नहीं मालूम कि आपने “महिमान्वीकरण” शब्द को पहिले पढ़ा है कि नहीं किन्तु मैं बड़े ही दृढ़ता से यह कह सकता हूँ कि यदि आप ख्रीष्टीय हैं तो आप महिमान्वीकरण पर विश्वास करते हैं और उसकी आशा में जीवन जीते हैं। 

इस लेख में जब आप आगे पढ़ते जाएंँगे तो आप विचार करेंगे कि मैं तो इस बात को जानता हूँ। आप यह कहने पाएँगे कि यह शब्द भले ही दिखने में बड़ा है परन्तु इसकी शिक्षा सरल है और आप इस पर विश्वास करते हैं और जीवन जीते हैं। इसलिए आज के इस लेख के द्वारा हम सीखेंगे कि महिमान्वीकरण क्या है और इसके अनुसार कैसे हमें जीवन जीना है। 

 महिमान्वीकरण क्या है?

“महिमान्वीकरण भविष्य की ओर संकेत करती है जिसमें हर समय के विश्वासियों को महिमान्वित (पापरहित, रोगरहित, परमेश्वर को पूर्ण रीति से महिमा देने वाला) देह प्रदान किया जाएगा। जो मर गए हैं वे महिमान्वित देह में पुनरुत्थित होगें और जो जीवित है वे महिमान्वित देह में यीशु ख्रीष्ट के द्वितीय आगमन में उठा लिए जाएँगे, और सदा के लिए त्रिएक परमेश्वर की आराधना करेंगे।”  

यदि आप ख्रीष्टीय हैं तो आप इन बातों पर विश्वास करते हैं और उसके लिए लालायित रहते हैं। हम नीचे तीन बातों को देखेंगे जिसके लिए ख्रीष्टीय लोग लालायित रहते हैं। 

  1. ख्रीष्टीय लोग नई देह के लिए लालायित रहते हैं। 

हम और आप इस बात को जानते हैं कि पाप सामर्थी है और हम उस से खिलवाड़ नहीं कर सकते हैं। हम आत्मा के द्वारा चलाए जाने के लिए बुलाए गए हैं किन्तु हम कई बार जानते हुए भी अपनी देह की इच्छा को पूरी करते हैं। जब हम पाप कर बैठते हैं तो सोचते हैं कि मैंने ऐसा क्यों किया? कब मैं पाप करना बन्द करूँगा, कब मैं पूर्ण रीति से परमेश्वर को महिमा देने पाउँगा।

हम बीमारी, व्यक्तिगत, पारिवारिक, और सामाजिक परेशानियों से निराश हो जाते हैं और अन्त में  हमारे हृदय से और कई बार हमारे मुँह से वाणी आती है कि कब तक मैं इस सहता रहूँगा, कब तक मुझे पीड़ा में रहना पड़ेगा। हम ख्रीष्टीय लोग नई देह के लिए लालायित रहते हैं कि हम चाहते हैं कि इस पापमय देह से छूट कर ख्रीष्टीय के समान देह को प्राप्त करें। हम चाहते हैं कि हम पाप को नकारे किन्तु हम बार बार पाप करते हैं और क्षमा प्राप्त करते हैं। हम लालायति हैं एक महिमामय देह के लिए। हम लालायति हैं पाप की सामर्थ्य और उपस्थिति से छुटाकार प्राप्त करने के लिए।

पौलुस कहता कि क्योंकि हम नई देह के लिए करहाते और लालसा रखते हैं (2 कुरिन्थियों 5:2), कि जब उद्धारकर्ता आएगा तो अपनी सामर्थ्य के द्वारा हमारी दीन-हीन देह का रूप बदल कर, अपनी महिमामय देह के अनुरूप बना देगा (फिलिप्पियों 3:20-21)। 

  1. ख्रीष्टीय लोग त्रिएक परमेश्वर की उपस्थित के लालायित रहते हैं?

एक गीत हैं जिसके बोल हैं कि

 “जायेंगे उत्तम एक देश में जरूर,

रहेंगे प्रभु के साथ हम जरूर

स्वर्गीय देश, उत्तम भी वह है,

हमारा वह देश जो अद्भुत है

यह गीत ख्रीष्टियों की इच्छा को प्रकट करती है कि जैसे आदम और हव्वा परमेश्वर की उपस्थिति में रहते थे वैसे हम भी परमेश्वर की उपस्थिति में रहेंगे। हम इस विकृत देश से निकल कर उत्तम देश में जाएंगे। हम त्रिएक परमेश्वर के अनन्तकाल की सहभागिता में सम्मलित होना चाहते हैं। हम स्वर्ग को देखे, जो हमारा नगर है। हम उसकी उपस्थिति में रहना चाहते हैं क्योंकि वहाँ संसार का राजा और हमारे हृदय का प्रिय है। प्रश्न उठता है कि हम उसकी उपस्थिति में क्या करेंगे?

  1. हर समय के विश्वासियों के साथ त्रिएक परमेश्वर की आराधना के लिए लालायित रहते हैं? 

मसीही जब त्रिएक परमेश्वर की उपस्थिति में होगों तो उसकी आराधना करेंगे। प्रत्येक विश्वासी कहेगा कि “हे हमारे प्रभु और परमेश्वर, तू ही महिमा, आदर और समार्थ्य के योग्य है, क्योंकि तू ने ही सब वस्तुओं को सृजा, और उनका अस्तित्व और उनकी सृष्टि तेरी ही इच्छा से हुई (प्रकाशितवाक्य 4:11)।” हम केवल सन्तों के साथ ही नहीं परन्तु स्वर्गदूतों के साथ उँची आवाज़ में परमेश्वर की महिमा करेंगे। वहाँ हमें किसी पास्टर और आराधना में अगुवाई करने वाले व्यक्ति की आवश्यकता नहीं होगी किन्तु जब हम उसके पराक्रम को देखेंगे तो आनन्द से भर कर, पूरे उत्साह के साथ गाएँगे। हम वध किए गए मेमने को देखेंगे जो  सिंहासन पर विराजमान है।

यदि अभी तक जब आप उपरोक्त बातों को पढ़ रहें हैं तो मैंने आपको कोई नई बात नहीं बताई हैं किन्तु वहीं बात जो अपने सुना है और विश्वास करते हैं। ये वे ही बातें हैं जिसके लिए आप यीशु मसीह के पीछे चल रहे हैं। यदि आपने पहली बार सुना है तो मैं आप से निवेदन करूँगा कि इन बातों पर विश्वास करें क्योंकि ये वास्तविक बाते हैं और ये परमेश्वर के वचन पर आधारित हैं।  

तो हम क्या करें?

यह तीनों बातें बहुत आनन्द और उत्साह प्रदान करती हैं। परन्तु प्रश्न यह है कि अभी, जब हमने महिमा में प्रवेश नहीं किया है तो हम क्या करें? कैसे महिमान्विकरण को ध्यान में रखकर अपना जीवन जीएँ?

अ. पवित्रीकरण में बढ़ते जाएँ और दुख में आशा रखें।

इस बात की हमें पूर्ण निश्चयता है कि हम प्रत्येक विश्वासियों को महिमामय देह मिलेगी। इसका अर्थ यह नहीं कि हम जैसा जीवन जीना चाहे वैसे जीएँ परन्तु जब संसार में हैं तो हम निरन्तर इस देह की इच्छा को मारते रहें, उससे लड़े, पाप के परीक्षा से भागे और सहायता मांगते रहें। क्योंकि हमें पापरहित देह मिलेंगी, हम पवित्र आत्मा, वचन और लोगों की सहायता से पापरहित जीवन जीने के लिए उत्साहित रहेंगे। जब बीमार में और सताव में है तो हमारी आशा महिमामय देह की ओर होना चाहिए। हम प्रार्थना करें और अपनी आशा महिमान्विकरण की ओर लगाएं रहें। त्रिएक परमेश्वर की उपस्थिति में पाप का प्रभाव समाप्त हो जाएगा। हमारे दुख  मिट जाएंगे और हम पूर्ण रीति से पवित्र और दुखमुक्त हो जाएंगे।   

ब. परमेश्वर की उपस्थिति में आए।

एक दिन मसीह लोग परमेश्वर की उपस्थिति में होगें। उसके ऐश्वर्य को देखेंगे। उसके तेज़ और सामर्थ्य को और अनुभव करेंगे। परन्तु जब हम अभी महिमामय देह में उसकी उपस्थिति में नहीं हैं तो उसके उपस्थिति में आत्मा में आते हैं। हम वचन से उसके ऐश्वर्य को देखतें हैं। वह उसकी उपस्थिति में प्रार्थना करते हैं कि हम उसके अनुसार जीवन जीएँ। जब हम पाप में हैं तो उसकी उपस्थिति में आकर हे पिता, हे अब्बा कह सकते हैं। हम प्रत्येक दिन उसकी उपस्थिति में रहना चाहते हैं। हम उसके आत्मा की अनुसार चलाए जाने की इच्छा रखते हैं। 

स.   सन्तों के साथ सहभागिता रखे और आराधना के लिए मिलते रहें।

महिमान्वीकरण में हर समय के विश्वासी त्रिएक परमेश्वर की आराधना अनन्तकाल तक करते रहेंगे। हम सब जो सुसमाचार पर विश्वास करते हैं- एक दिन सर्वदा के लिए अपने अनन्तकाल के परमेश्वर की आराधना करेंगे। वहाँ पर “प्रत्येक जाति, समस्त कुल, लोग और भाषा में से लोगों की एक विशाल भीड़ जिसे कोई गिन नहीं सकता…उंची आवाज़ से पुकारते हुए कहेंगे, “सिंहासन पर विराजमान हमारे परमेश्वर और मेमने से ही उद्धार है।” यदि हम वहाँ एक साथ परमेश्वर की आराधना करेंगे तो क्यों न हम अभी कलीसिया में निरन्तर आते रहें, एक साथ मिलकर, अलग-अलग जाति, अलग भाषा के लोग मिलकर उसकी आराधना करे। इसी बात के लिए पौलुस इब्रानियों 10: 25 में कहता है कि “और एक दूसरे के साथ इकट्ठा होना न छोड़ो, जैसे कि कितनों की रीति है, वरन् एक दूसरे को प्रोत्साहित करते रहो, और उस दिन को निकट आते देख कर और भी अधिक इन बातों को किया करो।” 

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