क्या आप अविश्वासी के समान बाइबल पढ़ते हैं?

सबसे आधारभूत प्रार्थना, जो हम बाइबल पढ़ने के लिए कर सकते हैं, वह यह है कि परमेश्वर हमें इस पुस्तक को पढ़ने की अभिलाषा दे। केवल इच्छा  ही नहीं — यह तो द्वितीय उत्तम बात है — परन्तु अभिलाषा  प्रथम उत्तम बात है। 

यही  प्रेरित पतरस ने कहा कि हमारे पास होना चाहिए: “नवजात शिशुओं के समान शुद्ध आत्मिक दूध के लिए लालायित [अभिलाषा ] रहो” (1 पतरस 2:2)। इसी प्रकार से, भजनकार भी कहता है कि एक धर्मी व्यक्ति प्रभु की व्यवस्था से आनन्दित होता है (भजन 1:2)। और हम ऐसा क्यों नहीं करेंगे, “क्योंकि परमेश्वर का वचन सोने से भी अधिक मनभावने  हैं”, और “टपकने वाले छत्ते से भी मधुर हैं” (भजन 19:10)? तो हम क्यों नहीं ऐसा करते हैं? क्योंकि हमारे हृदय ठण्डे और सुस्त और कठोर और अन्धे हो गये हैं।

हम सभी लोग जानते हैं कि “आश्चर्यजनक वस्तुओं” को देखे बिना पढ़ना कैसा प्रतीत होता है। हमने सर्वाधिक महिमामय वस्तुओं को निहारा है, उन्हें महिमामय देखे बिना। हमने अचम्भों को बिना अचम्भित हुए देखा है। हमने परमेश्वर की मधुर दयालुता को अपने प्राण के जीभ पर रखा है बिना मधुरता का स्वाद चखे। हमने अवर्णनीय प्रेम को बिना प्रेम की अनुभूति के  देखा है। हमने सर्वाधिक महान सामर्थ्य को देखा है और कोई श्रद्धायुक्त भय का अनुभव नहीं किया है। हमने अगाध बुद्धि को देखा है किन्तु विस्मय को अनुभव नहीं किया है। हमने प्रकोप की पवित्रता को देखा है, और फिर भी किसी कम्पन का अनुभव नहीं किया है। इसका अर्थ यह है कि हम “देखते हुए भी नहीं देख पा रहे हैं” (मत्ती 13:13)। यही कारण है कि हमें अपने वचन के पढ़ने में परमेश्वर-निर्भर प्रार्थना के धागे को बुनते रहना चाहिए: ताकि वह “मुझे अपनी महिमा दिखा [सके] (निर्गमन 33:18)।

यही सबसे आधारभूत कारण है जिसके लिए हमें अपने बाइबल पठन हेतु प्रार्थना करना चाहिए। हम ऐसा करने की अभिलाषा से भटक जाते हैं। कुछ ही प्रार्थनाएं है जिन्हें मैंने इस प्रार्थना से अधिक की हैं: हे प्रभु , मुझे अपने वचन से दूर जाने से रोक! [तथा] “मेरे मन को अपनी चेतावनियों की ओर लगा” (भजन 119:36)।

नास्तिकों की नाई पठन
मेरी पास्टरीय सेवकाई के अन्तराल, अनेक लोगों ने मुझसे असन्तोष व्यक्त किया है कि उनमें बाइबल पढ़ने के लिए कोई प्रेरणा नहीं है। उनमें उत्तरदायित्व की एक भावना है कि उन्हें करना चाहिए, किन्तु इसके लिए उनमें अभिलाषा नहीं है। यह उल्लेखनीय है कि उनमें से कितनों को यह आभास होता है कि अभिलाषा की अनुपस्थिति परमेश्वर के वचन पर आनन्दपूर्ण मनन की शवपेटी पर अन्तिम कील है।

“सबसे आधारभूत प्रार्थना, जो हम बाइबल पढ़ने के लिए कर सकते हैं, वह यह है कि परमेश्वर हमें इस पुस्तक को पढ़ने की अभिलाषा दे।”

जब मैं उनसे कहता हूँ कि वे मुझे बताएं कि इसके विषय में वे क्या कर रहे हैं, तब वे मुझे ऐसे देखते हैं मानो कि मैंने समस्या को ठीक से समझा नहीं है। वे आश्चर्यचकित होते हैं कि भला “अभिलाषा की अनुपस्थिति के विषय में आप कर भी क्या सकते हैं?” वे विरोध करते हुए कहते हैं कि “यह कार्य करने  के विषय में नहीं है। यह आभास  करने विषय में है।” इस प्रतिउत्तर के साथ समस्या यह है कि इन लोगों ने परमेश्वर के वचन के लिए केवल अभिलाषा को ही नहीं खोया है, परन्तु उन्होंने परमेश्वर की सम्प्रभु सामर्थ्य से अपने नेत्रों को हटा लिया है, वह सामर्थ्य जो उस अभिलाषा को जाग्रत करती है। वे अपना जीवन व्यावहारिक रीति से नास्तिकों के समान व्यतीत करते हैं। उन्होंने एक प्रकार के भाग्यवाद को अपना लिया है, जो भजनकार के प्रार्थना की रीति को नकारता है।

स्पष्ट रूप से, भजनकार ने भी परमेश्वर के वचन से भटक जाने की इस भयानक प्रवृत्ति का आभास किया था। स्पष्ट रूप से, उसने भी अभिलाषा के ठंडेपन और उसके हृदय की प्रवृत्ति को अन्य वस्तुओं की ओर अधिक उन्मुख होने को जान लिया था — विशेष रूप से धन की ओर। अन्यथा, उसने क्यों पुकारा होगा, “कि मेरे मन को अनुचित लाभ की ओर नहीं, परन्तु अपनी चेतावनियों की ओर लगा”? वह परमेश्वर से प्रार्थना कर रहा है कि परमेश्वर उसे वचन की अभिलाषा दे। वह जानता है कि अन्ततः परमेश्वर ही हृदय की अभिलाषाओं पर सम्प्रभु है। इसलिए, वह परमेश्वर को उस कार्य को करवाने हेतु पुकारता है जिसे वह अपने आप नहीं कर सकता है। भाग्यवाद के प्रति यही उत्तर है। यही उत्तर है नास्तिक के समान कार्य करने के प्रति — जो यह सोचता है मानो कि कोई परमेश्वर है ही नहीं जो हृदय पर शासन करता है, और जो हमने खो दिया है उसे पुनः स्थापित कर सकता है।

अपने जीवन के लिए लड़ना
मैं इस बात पर पर्याप्त बल नहीं दे सकता हूँ कि कैसे हमारी वास्तविक आत्मिक असहायता को जुड़ा होना चाहिए, प्रतिदिन परमेश्वर को पुकारने के संग ही, कि वह उसके वचन को पढ़ने के लिए, हमारी अभिलाषा को बनाए रखे तथा जागृत करे। हम में से बहुत से लोग निष्क्रिय पाए जाते हैं जब बात हमारे आत्मिक स्नेहों की आती है। हम व्यावहारिक रीति से भाग्यवादी हैं। हम सोचते हैं कि ऐसा कुछ भी नहीं है जो हम कर सकते हैं। ओह, आज मुझे पढ़ने की कोई अभिलाषा नहीं है। हो सकता है यह अभिलाषा कल हो। चलो, देखा जाएगा। और हम अपने कार्य के लिए चले जाते हैं।

“परमेश्वर हृदय की अभिलाषाओं पर सम्प्रभु है।”

इस रीति से भजनकार ने न ही सोचा था और न ही कार्य किया था। और न ही इस रीति से कलीसिया इतिहास के महान सन्तों ने कार्य किया है। जीवन एक युद्ध है। और प्रमुख युद्ध अभिलाषाओं के स्तर पर लड़े जाते हैं, न की कार्यों पर। जब पौलुस ने कहा, “इसलिए अपनी पार्थिव देह के अंगों को मृतक समझो,” तो “उसने अभिलाषा, बुरी लालसा और लोभ को” इस सूची में सम्मिलित किया है (कुलुस्सियों 3:5)। ये परमेश्वर के वचन हेतु अभिलाषा के बड़े विनाशक हैं। यीशु के अनुसार वचन हेतु हमारी अभिलाषा को क्या कम करता है? “संसार की चिन्ताएं और धन का धोखा और अन्य वस्तुओं का लोभ उनमें समाकर वचन को दबा देता है ” (मरकुस 4:19)। पौलुस हम से कहता है कि “अन्य वस्तुओं के लिए उन अभिलाषाओं” का घात करो, इससे पहले कि वे हमारा घात करें। वह हमें निष्क्रिय या भाग्यवादी होने के लिए प्रोत्साहित नहीं करता है। वह हमें अपने जीवन हेतु लड़ने के लिए प्रोत्साहित करता है। अर्थात, परमेश्वर के वचन हेतु अपनी अभिलाषा के लिए लड़ो।

और पहला और सबसे निर्णायक प्रहार, जो हम “अन्य वस्तुओं के प्रति अभिलाषाओं” के विरुद्ध कर सकते हैं जो  “वचन को दबा देती है” और परमेश्वर के वचन के प्रति हमारी अभिलाषा को दूर करता है, वह प्रहार है प्रतिदिन परमेश्वर को पुकारना, कि परमेश्वर हमारे हृदयों को अपने वचन की ओर उन्मुख करे और न कि स्वार्थमय लाभ के प्रति। अपनी अभिलाषा को खो देने तक प्रतीक्षा मत करिए इससे पहले ही आप इस अभिलाषा के लिए प्रार्थना करना आरम्भ कीजिए। यदि अभिलाषा अभी भी विद्यमान है, तो धन्यवाद दें और उसे सुरक्षित रखने और तीव्र करने के लिए उससे प्रार्थना करें। यदि आपको अनुभूति होती है कि यह ठंडी पड़ रही है, तो विनती करें कि वह इसे प्रज्वलित करे।

और यदि वह (अभिलाषा) चली गई है, और आप प्रार्थना करने की किसी अभिलाषा की अनुभूति नहीं करते हैं, तो इसके लिए आप जो कुछ भी कर सकते हैं वह कीजिए। पश्चाताप करिए। आप उसे बताइए कि आप दुखी हैं क्योंकि उसके वचन के प्रति आपकी अभिलाषा  मर गई है। उसको बताइए कि आप कैसा आभास करते हैं। वह पहले से ही जानता है। और उससे माँगिए —ऐसा बिना पाखण्ड के सम्भव है उस “अविनाशी बीज” के कारण (1 पतरस 1:23) जो उसके बच्चों में बना रहता है — आप उससे माँगिए कि वह आपको अभिलाषा दे जिसके लिए इस समय तो आप बड़ी कठिनाई से मांगने के लिए इच्छा जुटा पा रहे हैं। वह दयालु है।

मसीह आपकी अभिलाषाओं  के लिए मरा
जिस कारण से हम इस प्रकार आत्मविश्वास के साथ दया की अपेक्षा करते हुए प्रार्थना कर सकते हैं, वह यह है कि परमेश्वर के वचन के लिए इस अभिलाषा को क्रय करने हेतु ही मसीह मरा। वह आपके लिए मरा ताकि इस प्रार्थना का उत्तर दिया जाए। अन्तिम भोज में उसने  स्पष्ट किया  “यह प्याला जो तुम्हारे लिए उण्डेला गया है मेरे लहू में एक नई वाचा है ” (लूका 22:20)। उसके अपने लहू बहाए जाने के द्वारा, यीशु ने अपने लोगों के लिए नई वाचा स्थापित किया। प्रत्येक जो उस पर विश्वास करता है, उसके नाम के द्वारा पापों की क्षमा पाता है (प्रेरितों के काम 10:43)।

इस क्षमा के आधार पर, नई वाचा की अन्य आशीषें परमेश्वर के लोगों की ओर प्रवाहित होती हैं। और ये आशीषें मुख्यतः हमारी अभिलाषाओं के परिवर्तन से सम्बन्धित हैं — विशेष रूप से  परमेश्वर और उसके वचन के लिए हमारी अभिलाषाएंं। “जो वाचा मैं उन दिनों के बाद इस्राएल के घराने के साथ बाँधूंगा वह यह है, यहोवा कहता है, मैं अपनी व्यवस्था उनके मनों में डालूंगा और उसे उनके हृदयों पर लिखूंगा; तथा मैं उनका परमेश्वर ठहरूंगा तथा वे मेरी प्रजा ठहरेंगे” (यिर्मयाह 31:33,  व्यवस्थाविवरण 30:6, यहेजकेल 11:19-20, 36:26-27 भी देखें)

“यीशु मरा ताकि उसके और उसके वचन के प्रति हमारे प्रेम के नये किए जाने के लिए हमारी प्रार्थनाओं का दयापूर्वक उत्तर दिया जा सके।”

यीशु मरा ताकि उसके और उसके वचन के प्रति हमारे प्रेम के नये किए जाने के लिए हमारी प्रार्थनाओं का दयापूर्वक उत्तर दिया जा सके। हम उसे अपनी योग्यता के आधार पर उसके वचन के लिए नई अभिलाषाओं की मांग नहीं कर रहें हैं। हम मसीह के लहू और उसकी धार्मिकता के आधार पर उससे माँग रहे हैं। हम परमेश्वर से तर्क नहीं करते हैं कि वह हमारे स्वयं के कारण हमारा ऋणी है। वह ऋणी नहीं है। जो कुछ भी हम पाते हैं वह अनुग्रह का मुफ्त उपहार है।

जब हम प्रार्थना करते हैं, “मेरे मन को अपनी चेतावनियों की ओर लगा” (भजन 119:36), तो हम स्वीकार करते हैं कि हम किसी भी बात के सुपात्र नहीं हैं — असीमित सुन्दरता की ओर एक ठंडा मन एक असीमित पाप है। हम अपनी असहायता और पाप को स्वीकार कर रहे हैं। और हम स्वयं से दूर मसीह की ओर देख रहे हैं।

हमारा विनती यह  है:  हे परमेश्वर, मसीह के कारण, अपने प्रिय पुत्र के कारण, उसके असीमित रूप से बहुमूल्य लहू के कारण (1 पतरस 1:19), मेरा कराहना सुन और अपने उद्धार का आनन्द मुझे फिर से दे (भजन 51:12) और एक बार फिर से वह आनन्द दे जो तेरे वचन में मिला था (भजन 1:2)। मुझ में अपने लिए प्रेम की परिपूर्णता को पुनः स्थापित कर (व्यवस्थाविवरण 30:6)। मुझे इस योग्य बना कि मैं अपने हृदय की गहराइयों से पुनः कहने पाऊँ, “अहा मैं तेरी व्यवस्था से कितनी प्रीति रखता हूं” (भजन 119:97)।

जॉन पाइपर (@जॉन पाइपर) desiringGod.org के संस्थापक और शिक्षक हैं और बेथलेहम कॉलेज और सेमिनरी के चाँसलर हैं। 33 वर्षों तक, उन्होंने बेथलहम बैपटिस्ट चर्च, मिनियापोलिस, मिनेसोटा में एक पास्टर के रूप में सेवा की। वह 50 से अधिक पुस्तकों के लेखक हैं, जिसमें डिज़ायरिंग गॉड: मेडिटेशन ऑफ ए क्रिश्चियन हेडोनिस्ट और हाल ही में प्रोविडेन्स सम्मिलित हैं।
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