धर्मीकरण (धर्मी ठहराया जाना)

सुधारवाद ईश्वरविज्ञान में धर्मीकरण (धर्मी ठहराया जाना) के सिद्धान्त को एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त के रूप में देखा जाता है। कलवरी  क्रूस पर, हमारे स्थान पर यीशु के प्रतिस्थापक रुपी कार्य को समझने के लिए धर्मीकरण के सिद्धांत की शिक्षा हमारी सहायता करता है। यदि हम धर्मीकरण को नहीं समझेंगे तो हम सुसमाचार को भी सटीक रीति से नहीं जान सकेंगे। कई लोग धर्मीकरण को गंभीरता से नहीं लेते हैं और सोचते हैं कि वह अपने स्वयं की धार्मिकता के द्वारा स्वर्ग के राज्य में ग्रहण कर लिए जाएंगे क्योंकि उन्हें अपने भले कार्यों अर्थात उनकी अपनी धार्मिकता पर भरोसा होता है। सामान्य शब्दों में, “एक पापी मनुष्य का पवित्र और न्यायी परमेश्वर के सन्मुख निर्दोष ठहराया जाना” धर्मीकरण कहलाता है। इस लेख में हम धर्मीकरण के विषय में जानेंगे कि यह क्यों सुसमाचार को समझने के लिए आवश्यक है। 

धर्मीकरण (धर्मी ठहराये जाने) को प्राप्त करने में मनुष्य की विफलता 

मनुष्य का कोई भी कार्य उसे परमेश्वर के सन्मुख धर्मी नहीं ठहरा सकता है, वह अपने परिश्रम से धर्मीकरण को प्राप्त नहीं कर सकता है।  

बाइबल इस विषय में बहुत स्पष्ट है की पाप के कारण, परमेश्वर के साथ मनुष्य का सम्बन्ध नष्ट और भ्रष्ट हो चुका है और मनुष्य परमेश्वर की महिमा से रहित है (रोमियों 5:12, 3:23ब)। पाप का और भ्रष्टता का यह प्रभाव मनुष्य के जीवन के हर क्षेत्र को प्रभाववित कर चुका है। मनुष्य अब परमेश्वर के सामने पापी, दोषी और दण्ड के योग्य पाया जाता है; वह अब क्रोध की सन्तान है (इफिसियों 2:3ब)। इस कारण मनुष्य परमेश्वर के सामने निर्दोष नहीं है। मनुष्य अब चाहे कितनी भी मेहनत कर ले, कितना भी परिश्रम कर ले, कितने ही भले-अच्छे-धार्मिकता के काम कर ले, कितना भी विद्वान् और धनवान बन जाए; फिर भी किसी भी बात के आधार पर मनुष्य अब परमेश्वर का सामना नहीं कर सकता है। मनुष्य का कोई कार्य उसे परमेश्वर के सन्मुख धर्मी नहीं ठहरा सकता है, वह अपने परिश्रम से धर्मीकरण को प्राप्त नहीं कर सकता है।  

धर्मीकरण (धर्मी ठहराये जाने) में यीशु ख्रीष्ट हमारा प्रावधान 

यह बात अब स्पष्ट है कि मनुष्य अपने आप को परमेश्वर के सामने धर्मी ठहराने में सम्पूर्ण रूप से विफल है। तो प्रश्न यह है कि पापी मनुष्य कैसे परमेश्वर के सामने धर्मी ठहराया जाएगा? मनुष्य के पाप और उसका विद्रोह इतना बड़ा है कि पवित्र – न्यायी – सिद्ध परमेश्वर को एक सिद्ध बलिदान की आवश्यकता है। मनुष्य के लिए यह असंभव था; इसीलिए दयालु परमेश्वर ने मनुष्य के लिए यह प्रावधान किया और अपने पुत्र यीशु ख्रीष्ट को इस संसार में भेजा और यीशु ने अपने सिद्ध, आज्ञाकारी जीवन के द्वारा परमेश्वर के क्रोध को संतुष्ट कर दिया (रोमियों 5:8-9, 1 यूहन्ना 4:9-10, 2 कुरिन्थियों 5:21)। परमेश्वर के क्रोध से यीशु ख्रीष्ट ने हमें छुटकारा दिया, उसने हमें बचाया और यह सब उस समय हुआ जब हम अपने पापों में मरे हुए थे। परमेश्वर के क्रोध से बचने में, उसके दण्ड से बचने में, अनन्त मृत्यु से बचने में हमारा कोई भी योगदान नहीं है। हमारा उसमे कोई भी श्रेय नहीं है। यह तो केवल परमेश्वर पिता की करुणा, दया, कृपा है कि उसने हमारे लिए इस प्रावधान को यीशु ख्रीष्ट के माध्यम से पूरा किया है। 

यीशु ख्रीष्ट के द्वारा हमारा धर्मीकरण (धर्मी ठहराये जाने)

कलवरी पर किए गए यीशु के प्रतिस्थापक रुपी कार्य पर विश्वास करने के द्वारा अब हम धर्मी ठहराए गए हैं।

अब यीशु ख्रीष्ट के सिद्ध बलिदान के द्वारा परमेश्वर ने हमारे लिए उपाय कर दिया है। जिस प्रकार आदम के पाप के कारण हम सब पापी गिने गए, उसी तरह यीशु ख्रीष्ट के सिद्ध जीवन और कार्य का प्रतिफल हमारे लिए धार्मिकता लेकर आया (रोमियों 5:18)। कलवरी पर किए गए यीशु के प्रतिस्थापक रुपी कार्य पर विश्वास करने के द्वारा अब हम धर्मी ठहराए गए हैं, परमेश्वर अब हमें धर्मी ठहराता है (रोमियों 3:26)। परमेश्वर का क्रोध अब हम पर नहीं है क्योंकि यीशु ख्रीष्ट ने उस क्रोध को संतुष्ट कर दिया है। उसने हमारे सब पापों को उठा लिया, वह हमारे लिए पाप ठहराया गया और हमारे स्थान में क्रूस पर चढ़ गया (2 कुरिन्थियों 5:21)। अपने बलिदान और मृत्यु के द्वारा उसने हमें अपनी धार्मिकता दे दिया (रोमियों 3:21-22)। सुधारवादी विद्वान् इसे अध्यारोपित धर्मीकरण कहते हैं। हमारे सब अधर्म के कामों का लेखा यीशु ख्रीष्ट पर रख दिया गया और यीशु ख्रीष्ट की धार्मिकता हमें दे दिया गया जब हमने उस पर विश्वास किया। यीशु की यह धार्मिकता अब हमारी पहचान है। पिता परमेश्वर अब इस धार्मिकता (जो यीशु ख्रीष्ट की धार्मिकता है) से प्रसन्न है और हमें अब अपने लेपालक संतान के रूप में ग्रहण करता है (गलातियों 4:5)। 

अतः आज हम आनन्दित हो सकते हैं और धन्यवादी हो सकते हैं कि परमेश्वर ने हमारे लिए यीशु ख्रीष्ट के द्वारा धर्मीकरण का प्रावधान किया है। हम अपने आप में इस योग्य तो नहीं थे कि परमेश्वर के सन्मुख खड़े हो सकें; हम तो दण्ड और क्रोध के योग्य थे। परन्तु आज हमारे लिए जो प्रावधान किया गया है, जो अवसर मिला है उसे हम तुच्छ न समझें। यीशु ख्रीष्ट के जीवन और कार्य पर विश्वास करने के द्वारा आज हम भी उस धार्मिकता को प्राप्त कर सकते हैं जिसके द्वारा हम परमेश्वर के लेपालक संतान बन सकते हैं।     

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