आप वास्तव में सबसे अधिक किससे प्रेम करते हैं?

आप क्या खोज रहे हैं? मैं अमूर्त दार्शनिक अर्थ में बात नहीं कर रहा हूँ, जैसे कि “मैं सत्य की खोज करने वाला हूँ” या “मैं तो केवल प्रसन्नता को ढूँढ़ रहा हूँ।” मेरी आशा है कि आप सत्य को खोजते हैं और मैं जानता हूँ  कि आप प्रसन्नता अवश्य ही ढूँढ़ते हैं। परन्तु नहीं, मैं यहाँ के विषय में पूछ रहा हूँ, कि आप इस धरातल पर, जहाँ आप वास्तव में प्रतिदिन का जीवन व्यतीत करते हैं। आप वास्तव में क्या खोज रहे हैं?

इस प्रश्न को अन्य रीतियों से भी व्यक्त किया जा सकता है:

आप वास्तव में क्या चाहते हैं?

आप क्या प्राप्त करने के विषय में स्वप्न देख रहे हैं?

भविष्य के लिए आपकी आशा को क्या बढ़ावा दे रहा है? 

सबसे अधिक आपका ध्यान क्या खींच रहा है?

आप कौन सी बातों को पढ़ने के लिए अपना ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं?

आप इन्टरनेट पर क्या ढूँढ रहे हैं? 

आप अपना समय और पैसा किस बात पर व्यय कर रहे हैं?

आप क्या अर्जित करने के लिए क्या योजना बना रहे हैं?

या हम इसे नकारात्मक रीति से पूछ सकते हैं: कौन सा अभिलाषित व्यक्ति या वस्तु आपके अवसाद और निराशावाद को बढ़ावा दे रही है, क्योंकि जितना आप उसे या उस वस्तु को चाहते हैं, वे आप की पहुँच से बाहर प्रतीत होते हैं?

आप क्या खोज रहे हैं? आपके उत्तर आपको बताएँगे कि आप किससे प्रेम करते हैं।

प्रेम सदैव खोजता है

अपने प्रिय की खोज करना प्रेम का वास्तविक स्वभाव ही है, भले ही हमारा प्रिय मानव प्रेमी हो (श्रेष्ठगीत 7:10) या धन (1 तीमुथियुस 6:10) या कोई अन्य सांसारिक वस्तु (1 यूहन्ना 2:15) अथवा परमेश्वर (व्यवस्थाविवरण 4:29; 6:5)। जिस से हम प्रेम करते हैं, हम बिना उसकी खोज किए रह ही नहीं सकते हैं। और यदि हम विश्वास न करें कि हम उसे प्राप्त कर सकते हैं जिससे हम प्रेम करते हैं, हम न चाहते हुए भी मोहभंग, कड़वाहट, और यहाँ तक कि निराशा में चले जाते हैं।

खोज करना ही वास्तविक उत्साह का चिन्ह है। इसलिए दाऊद ने ऐसी बातें लिखीं, जैसे, “मैंने यहोवा से एक वर माँगा है, मैं उसी के यत्न में लगा रहूँगा” (भजन संहिता 27:4), और “हे परमेश्वर, तू ही मेरा परमेश्वर है; मैं तुझे यत्न से ढूँढूँगा” (भजन संहिता 63:1)। जब उसने इन भजनों को लिखा, वह परमेश्वर के लिए प्रेम (या उसके लिए चाहत) से प्रभावित था। और प्रेम ने उसे अपने प्रिय की खोज करने के लिए बाध्य किया।

और इसीलिए पौलुस ने ऐसी बातें लिखी, “क्योंकि ख्रीष्ट का प्रेम हमें विवश करता है” (2 कुरिन्थियों 5:14)। यूनानी शब्द सुनेखो (synechō) को एक हिन्दी बाइबल ने जैसे “नियन्त्रण” के रूप में अनुवाद किया गया है,” दूसरे अनुवादों में “विवश” या “बाध्य” के रूप में अनुवाद किया है। पौलुस का जो अर्थ था वह यह है कि ख्रीष्ट के प्रेम ने उससे आग्रह किया, यहाँ तक कि उसे कार्य करने के लिए बाध्य किया, उस बात की खोज करने के लिए जिसने उसके ह्रदय को इस प्रकार से प्रभावित कर लिया था कि इसके कारण कुछ लोगों ने उस पर बेसुध होने का आरोप लगाया (2 कुरिन्थियों 5:13)।

प्रेम हमें नियन्त्रित, विवश और बाध्य करता है। प्रेम पीछा करता है। प्रेम को अवश्य कार्य करना चाहिए क्योंकि केवल  शब्दों में प्रेम सच्चा प्रेम नहीं है; क्योंकि सच्चा प्रेम सर्वदा कार्य उत्पन्न करता है (1 यूहन्ना 3:18)।

क्या हमने अपना पहला प्रेम खो दिया है?

परमेश्वर के लिए अपनी धुन को खो देने का पहला संकेत यह नहीं है कि हम झूठी शिक्षा को ग्रहण कर रहे हैं, या अनैतिकता में जीवन जी रहे हैं या प्रत्यक्ष रूप से धर्म त्याग कर रहे हैं, परन्तु पहला संकेत यह है कि परमेश्वर अब हमारा सर्वश्रेष्ठ प्रेम नहीं रहा। वास्तव में, सम्भवतः हम अभी भी ख्रीष्ट की सेवा कर रहे हैं और कुछ सीमा तक विश्वासयोग्यता के साथ कठिनाइयों को सहन कर रहे होंगे जिसकी देखने वाले लोग सराहना भी करेंगे। नहीं, यीशु के शब्दों में पहली चेतावनी चिन्ह इफिसियों की कलीसिया में देखा जा सकता है:

मैं जानता हूँ, “तुझ में धैर्य है और तू मेरे नाम के कारण दुख उठाते-उठाते थका नहीं। पर मुझे तेरे विरुद्ध यह कहना है कि तू ने अपना पहला-सा प्रेम छोड़ दिया है। इसलिए स्मरण कर कि तू कहाँ से गिरा है और मन फिरा और पहिले के समान कार्य कर – अन्यथा मैं तेरे पास आता हूँ और यदि तू मन न फिराए तो तेरे दीपदान को उसके स्थान से हटा दूँगा” (प्रकाशितवाक्य 2:3-5)।

यद्यपि इफिसुस के ख्रीष्टीय परिश्रम कर रहे थे, और धैर्यपूर्वक बुरी विपत्ति को सहन कर रहे थे (प्रकाशितवाक्य 2:2), अब उनके जीवन में ख्रीष्ट के प्रति धुन नहीं था और इसलिए वे अब गम्भीरता से ख्रीष्ट की खोज नहीं कर रहे थे। ख्रीष्ट का प्रेम अब उन्हें नियन्त्रित और विवश नहीं कर रहा था जैसा कि वह उन्हें पहले करता था। और वे “कार्य” जो उन्होंने अब नहीं किए, वे ख्रीष्ट के प्रति उनके स्नेह को खो जाने के सूचक थे। यीशु ने इस समस्या को गम्भीर समझा और उसकी चेतावनी को तुरन्त माना जाना चाहिए था। 

यह एक गम्भीर समस्या है, क्योंकि यदि हमारे लक्ष्य उस बात से प्रेरित होंगे जिससे हम सर्वाधिक प्रेम करते हैं, और यदि सर्वाधिक यीशु से हम प्रेम नहीं करते हैं, तो हम अपनी ऊर्जा और संसाधनों को कहीं और व्यय कर रहे होंगे, भले ही हम विश्वास वचन के स्तर पर अभी भी शास्त्रसम्मत बने रह सकते हैं।

वास्तव में आप क्या खोज रहे हैं?

तो आप क्या खोज कर रहे हैं? जब हमें विकल्प दिया जाता है, जिस बात का पीछा करने का चुनाव करते हैं, तथा जिन बातों की हम खोज करते हैं, ये संकेत देते हैं कि हमारा स्नेह किसके वश में हैं।

क्या ख्रीष्ट का प्रेम हमें नियन्त्रित कर रहा है, विवश कर रहा है, और बाध्य कर रहा है या कुछ कुछ और बात है? क्या हम ख्रीष्ट की सेवा उसके लिए उस स्नेह के कारण कर रहे हैं जो उसे न करना कठिन बना देता है, या एक प्रकार के थके हुए, नीरस दायित्व से? या क्या हम अब पहले के जैसे विश्वास के कार्य नहीं करते हैं — इसलिए नहीं कि हमारी बुलाहट का ध्यान परवर्तित हो गया है, परन्तु इसलिए कि अब पहले के जैसे हममें क्षमता नहीं है?

इफिसियों को पश्चात्ताप करने के लिए यीशु की बुलाहट मात्र चेतावनी नहीं थी, परन्तु सुसमाचार था। पश्चात्ताप पाप के बन्धन से छुटकारा है, वह कुछ भी हो। यह तथ्य कि पश्चात्ताप सम्भव है, हमारे लिए यीशु द्वारा क्रूस पर किये कार्य के कारण, आश्चर्यजनक रूप से अद्भुत सन्देश है! पश्चाताप की बुलाहट इस बात के लिए बुलाहट नहीं है कि हमारी लज्जा को प्रकट किया जाए और परमेश्वर क्रोध भरी दृष्टि से हमें देखे। यह परमेश्वर के अनुग्रह के द्वारा सबसे महान आशा और सबसे पूर्ण आनन्द के स्थान पर लौटने की बुलाहट है।

प्रश्न यह नहीं है कि हम जिन बातों से प्रेम करते हैं उनकी खोज करेंगे या नहीं। किन्तु प्रश्न यह है कि हम वास्तव में किन बातों की खोज कर रहे हैं? हमारे कार्य हमारे वास्तविकता के सूचक हैं, क्योंकि वे हमें बताते हैं कि हम क्या प्रेम करते हैं। और यदि हम उस रीति से प्रेम नहीं करते हैं जैसा हमें करना चाहिए, तो परमेश्वर ने हमें दासत्व से बचने और आनन्द की ओर लौटने का मार्ग प्रदान किया है।

तो आइए हम वास्तविक धन की खोज करें: “परन्तु वहाँ तुम अपने परमेश्वर यहोवा की खोज करोगे, और यदि तुम अपने सारे मन और अपने सारे प्राण से उसकी खोज करो तो वह तुम को मिल जाएगा” (व्यवस्थाविवरण 4:29)।

शिक्षक और डिज़ायरिंग गॉड के सह-संस्थापक के रूप में सेवा करते हैं। वह तीन पुस्तकों अर्थात- Not by Sight, Things Not Seen, और Don’t Follow Your Heart के लेखक हैं। इनके पाँच बच्चे हैं और वे मिनियापुलिस में रहते हैं।

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