पवित्रता में, हम परमेश्वर की सहायता से निरन्तर बढ़ते जाते हैं।

हमारे ख्रीष्टीय जीवन में, पवित्रीकरण के विषय में सन्देश – शिक्षा  – प्रचार इत्यादि को कलीसिया में या ख्रीष्टीय सभाओं में हमने सुना है। हम लोग इस सत्य से परिचित हैं कि परमेश्वर हमें पवित्र प्रजा के रूप में सम्बोधित करता है; हम उसकी पवित्र प्रजा हैं (1पतरस 2:9)। यह प्रकट है कि हमारे पवित्रीकरण / पवित्र ठहराए जाने के द्वारा हम परमेश्वर के लिए अलग किए गए हैं। अब, अपवित्रता / पाप के साथ हमारा कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता है। इसके साथ यह भी सत्य है कि हम अभी भी पाप के स्वभाव से ग्रसित हैं, पाप का स्वभाव अभी भी हमारे भीतर सक्रीय है और हम अभी भी पाप के साथ संघर्ष करते हैं। परमेश्वर के लिए पवित्र ठहराया जाना, पाप के साथ हमारा संघर्ष, पवित्रता में प्रगतिशीलता; यह हमारे ख्रीष्टीय जीवन का सत्य है। इस लेख के द्वारा हम इस विषय को समझने का प्रयास करेंगे।

पवित्रीकरण 

जब हम अपने पापों में मरे हुए थे तब हमारी वास्तविकता यह थी की हम परमेश्वर के क्रोध के संतान थे। यह हमारी वास्तविक अवस्था थी (इफिसियों 2:1-3)। लेकिन परमेश्वर ने अपनी दया और करुणा में होकर हमें एक नई पहचान को दिया है; हमारी वास्तविक अवस्था को बदल दिया है। हमारे पापों को क्षमा करके उसने हमें अन्धकार के राज्य से छुड़ा लिया और अपने प्रिय पुत्र के राज्य में प्रवेश कराया है (कुलुस्सियों 1:13-14)। हमारे इस अवस्था को बदलने में हमारा कोई भी योगदान नहीं है; यह सम्पूर्ण रूप से परमेश्वर का कार्य है जिसे उसने अपने पुत्र के द्वारा पूरा किया है। इस नई अवस्था और पहचान को प्राप्त करने के द्वारा अब हमारे ऊपर न तो दण्ड की आज्ञा है, न ही अनन्त मृत्यु का न्याय ठहरा है। अब हम परमेश्वर के संतान कहलाये जाते हैं, उसकी पवित्र और निज प्रजा कहलाये जाते हैं और एक नई सृष्टि बन जाते हैं (यूहन्ना 1:12, 1 पतरस 2:9, 2 कुरिन्थियों 5:17)। अब इस नयी पहचान और अवस्था को परमेश्वर की और से प्राप्त करने के बाद परमेश्वर हमें उसके ईश्वरीय स्वभाव में सहभागी होने के लिए बुलाहट देता है। संसार की अभिलाषाओं और प्रेम से अब हमारा कोई सम्बन्ध नहीं होना चाहिए। इस ईश्वरीय स्वभाव में अब हमें बढ़ना चाहिए, पवित्रता में बढ़ना चाहिए। 

कई बार हम विफल होंगे, हमसे पाप होगा, परन्तु  हम लगातार पाप के साथ लड़ेंगे, उसका सामना करेंगे और परमेश्वर की सहायता से प्रलोभनों पर जय प्राप्त करेंगे।

पवित्रता में प्रगतिशीलता 

प्रगति – इस शब्द से संसार अत्यंत प्रेम रखता है। संसार की विचारधारा हमें प्रोत्साहित  करती है कि  हम धन, वैभव और सुनाम की प्राप्ति में प्रगति करते रहें। भौतिक वस्तुओं में प्रगति करना समाज में नाम और सम्मान लेकर आती है। बाइबल  इससे भिन्न शिक्षा देती है; बाइबल  हमें सक्रियता सहित पवित्रता में प्रगति करने के लिए प्रोत्साहित करती है (1 पतरस 1:14-16, 2 कुरिन्थियों 7:1)। 

जब तक हम इस संसार में जीवित हैं, हम नित दिन प्रलोभनों का सामना करते रहेंगे। पवित्र ठहराए जाने का अर्थ यह कदापि नहीं है की अब हमारे सामने कभी भी प्रलोभन नहीं आएंगे। इसका अर्थ यह भी नहीं कि यदि हम पाप करें तो यह कोई गंभीर बात नहीं है क्योंकि परमेश्वर ने तो हमें पवित्र ठहरा दिया है। प्रलोभनों का हमारे जीवन में आना हमें यह छूट नहीं देता कि हम पवित्रता में प्रगति न करें; वरन परमेश्वर यह चाहते हैं कि हम इन प्रलोभनों का सामना करते हुए, उस पर जय पाते हुए अपनी पवित्रता में प्रगति करें। कई बार हम विफल होंगे, हमसे पाप होगा, परन्तु  हम लगातार पाप के साथ लड़ेंगे, उसका सामना करेंगे और परमेश्वर की सहायता से प्रलोभनों पर जय प्राप्त करेंगे। यह पवित्रता में हमारी प्रगति को दर्शाता है और इस प्रगति को परमेश्वर हमारे ख्रीष्टीय जीवन में देखना चाहते हैं। 

प्रगतिशील पवित्रीकरण में परमेश्वर की सहायता

प्राय:  लोग  पवित्रता में प्रगति के विषय को लेकर भयभीत हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि  यह तो असम्भव है और उनसे यह हो नहीं पाएगा; वह विफल हो जाएंगे। परमेश्वर हमारे पतन की अवस्था को जानते हैं। वह जानते हैं की हम किन बातों – विषयों से प्रलोभित होते हैं। वह जानते हैं कि हमारा पापमय शरीर और स्वभाव शारीरिक बातों पर मन लगाने के लिए प्रलोभित होता रहता है। हमारे संघर्ष को परमेश्वर जानते हैं। क्योंकि  परमेश्वर इन बातों को जानते हैं, वह हमारी सहायता भी करते हैं। 

परमेश्वर ने हमें पवित्रशास्त्र  को और अपना पवित्र आत्मा दिया है जो हमें पवित्रता में प्रगति करने के लिए सहायता  करते हैं। जब हम अपने पापों में मरे हुए थे तब हम अपने शारीरिक लालसाओं में लिप्त रहते थे परन्तु, अब पवित्र आत्मा वचन के द्वारा हमें लालसाओं के ऊपर जय प्राप्त करने के लिए सहायता करता है। वह हमारे अन्दर अपने शारीरिक लालसाओं और प्रलोभनों के प्रति घृणा को उत्पन्न करता है। इन अभिलाषाओं को त्यागने के लिए इच्छा उत्पन्न करता है। शारीरिक प्रलोभन और अभिलाषा को अप्रिय जानने और परमेश्वर को प्रसन्न करने की इच्छा को उत्पन्न करता है। परमेश्वर हमें उसके ईश्वरीय सामर्थ के द्वारा उसके स्वभाव में सहभागी होने के लिए सहायता करता है (2 पतरस 1:3-4)।  

प्रगतिशील पवित्रीकरण में परमेश्वर की सहायता के साथ-साथ हमारा उत्तरदायित्व

पवित्रीकरण के इस प्रगतिशील यात्रा में परमेश्वर की सहायता  के साथ हमारा उत्तरदायित्व भी जुड़ा हुआ है। बाइबल के विभिन्न खंड हमें यह स्मरण दिलाते हैं कि  हमें अपने प्रगतिशील पवित्रता के लिए परिश्रम करना होगा (रोमियो 6:19, 1 थिस्सलुनीकियों 4:3-5, फिलिप्पियों 2:12-13, गलातियों 5:16-17)। नए जन्म के द्वारा परमेश्वर ने हमारे ह्रदय में उसके लिए प्रेम को दिया है और उसे प्रसन्न करने हेतु इच्छा को भी दिया है। यह सब केवल शब्दों में ही नहीं पर कार्यों के द्वारा भी प्रदर्शित करना हमारा उत्तरदायित्व है। अपवित्रता, शारीरिक अभिलाषा से घृणा, पापमय इच्छाओं को त्यागना, शरीर की चाल न चलना इत्यादि दर्शाते हैं कि  हम वास्तव में सक्रिय रूप से परिश्रम कर रहे हैं ताकि हम पवित्रता में प्रगति करें। इन बातों में हमारा परिश्रम यह दर्शाता है कि  हम उस नए मनुषत्व की चाल में प्रगति कर रहे हैं। यह सत्य है कि  हमारा पुराना  पापमय मनुष्यत्व हमें शरीर की चाल में चलने के लिए प्रलोभित करता है पर अब हम धार्मिकता के दास बनकर जीना चाहते हैं। हम परमेश्वर को प्रसन्न करना चाहते हैं। 

अतः हम इस सत्य को जानें  की शरीर की चाल और आत्मा की चाल एक दूसरे से विपरीत है और हमारे ख्रीष्टीय जीवन में हम इस संघर्ष का सामना करते रहेंगे। इस कष्टपूर्ण संघर्ष के कारण हम कराहेंगे पर हम परिश्रम भी करेंगे और परमेश्वर हमारी सहायता करेगा कि हम अपनी पवित्रता में प्रगतिशील हों। पवित्रीकरण की इस प्रगतिशील यात्रा  में परमेश्वर का वचन हमारे पांव के लिए दीपक और हमारे मार्ग के लिए उजियाला बनकर हमारी सहायता  करेगा। 

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