आप प्रसन्नता का पीछा कर रहे हैं या पवित्रता का?

इस प्रकार का प्रश्न वास्तव में, पवित्रता  और प्रसन्नता  को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने की एक सामान्य त्रुटि दिखाता है। “परमेश्वर आपके प्रसन्न होने से अधिक आपके पवित्र होने में रुचि रखता है,” और इस प्रकार यह विचार आगे बढ़ता है।  

मेरे कुछ प्रिय ईश्वरवैज्ञानिक इन दो सूक्ष्म विचारों में विभाजन करने के शिकार हो जाते हैं। और इसमें सबसे अच्छे विचारकों में एक मेरे प्रिय (डेविड वेल्स) भी हैं। दया-भाव में, और उनके लेखन से जो कुछ मैंने सीखा है उसके लिए मैं उनका बहुत आभारी हूँ, मैं उनके द्वारा लिखित 2014 की पुस्तक के कुछ भाग को प्रकाशित करूँगा जहाँ यह तनाव उभरता है, और मैं सहायक संशोधन बाद में करूँगा।

किन्तु पवित्रता को प्रसन्नता से दूर करते हुए हम  त्रुटिपूर्ण रीति से दो भागों में विभाजन कर देते हैं।

कई सारे प्रचार मंचों से मन को बहलाने वाली विश्वास की परिभाषा की आलोचना करने के प्रयास में, वह लिखते हैं:

इस मनोवैज्ञानिक संसार में, प्रेम का परमेश्वर निश्चित रूप से प्रेम का परमेश्वर है और केवल इसलिए वह हमें आँतरिक पीड़ाहरण औषधि प्रदान करता है। हम खाली हृदय के साथ, विचलित मन से, शोकग्रस्त और असन्तुष्ट मन से परमेश्वर के पास सहायता के लिए आते हैं। हम उससे परिपूर्णता की भावना से माँगते हैं‍ कि वह हमें सन्तुष्ट करे! हमारे खालीपन को भरे! हमें आधुनिक संसार में प्रतिस्पर्धा की और आवाज़ों के मध्य दिशा की भावना दें! पीड़ा से भरे हुए खालीपन को भर दे!

इसी प्रकार आज की कलीसिया में, विशेषकर सुसमाचार प्रचार करने वाले समूह की कलीसिया में इस प्रकार के लोग हैं जो इस रीति सोचते हैं। वे इस प्रकार प्रार्थना करते हैं। वे स्वयं के अन्दर कुछ और अधिक वास्तविकता के लिए तड़प रहे हैं उसके अतिरिक्त जो वर्तमान में उनके पास है। यह वयस्कों और किशोरों की भी सच्चाई है। हाँ, हम आग्रहपूर्वक,आशापूर्ण रीति से, संभवतः थोड़ी आकांक्षा के साथ कहते हैं, कि हमारे लिए प्रेम का परमेश्वर का होइए!

जो लोग इस मनोवैज्ञानिक संसार में रहते हैं, वे उन लोगों से अलग सोचते हैं जो नैतिक संसार में रहते हैं। एक मनोवैज्ञानिक संसार में, हम चंगाई  चाहते हैं; एक नैतिक संसार में, सही और गलत तथा अच्छे और बुरे के संसार में, हम छुटकारा चाहते हैं। एक मनोवैज्ञानिक संसार में, हम खुश  रहना चाहते हैं। एक नैतिक संसार में, हम पवित्र होना चाहते हैं। एक में हम अच्छा अनुभव करना चाहते हैं परन्तु दूसरे में हम अच्छा होना चाहते है। . . .

परमेश्वर हमारे सामने न ही मन को बहलाने वाला और न ही द्वारपाल के रूप में खड़ा है। वह हमारे सामने सम्पूर्ण रीति से पवित्रता के परमेश्वर के रूप में खड़ा है, जिसके प्रति हम नैतिक रीति से उत्तरदायी हैं। वह हमारा उद्देश्य है और वह हमारे आन्तरिक संसार की धुंधली समझ के भी भीतर नहीं खोया है। उसका वचन हमारे स्वयं के बाहर से हमारे पास आता है क्योंकि यह उसके सत्य का वचन है। यह हमें सम्पूर्ण जगत के परमेश्वर के समक्ष खड़े होने के लिए बुलाता है, उसकी आज्ञाओं को सुनने के लिए अवश्य है कि हम उससे प्रेम करें और अपने समान अपने पड़ोसियों से प्रेम करें। वह हमारे द्वारा उपयोग किए जाने के लिए हमारे सामने नहीं है। वह हमारे आन्तरिक संसार में प्रवेश करने और हमारे मन बहलाने वाली आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विनती नहीं कर रहा है। हम उसकी आज्ञा को सुनने के लिए उसके समक्ष हैं। और उसकी आज्ञा यह है कि हमें पवित्र होना चाहिए, जो प्रसन्न रहने की तुलना में बहुत बड़ी बात है।. . .

यह सच है कि ख्रीष्ट का अनुसरण करने के मानसिक लाभ हैं, और प्रसन्नता इसका प्रतिफल हो सकता है। ये, यद्यपि मूल रूप से वे नहीं हैं जो ख्रीष्टीय विश्वास में पायी जाती हैं। यह उस परमेश्वर के बारे में है जो हम लोगों से भिन्न है, जो अनन्त और अनुग्रहकारी परमेश्वर है। 

अब सांस्कृतिक रूप से परिभाषित प्रसन्नता का (जैसे, उपभोक्ता-केन्द्रित भौतिकवाद, यौन मुक्ति और अपने सभी रूपों में आत्म-केन्द्रित) विरोध करना निश्चित रूप से उचित है। और इस विचार का विरोध करना कि ख्रीष्टीय जीवन में पवित्रता अनावश्यक है, निश्चित रूप से सही है। और इस विचार पर आक्रमण करना कि परमेश्वर हमारे द्वारा अनुभव की जाने वाली आवश्यकताओं को पूरा करने वाले सैन्टा क्लॉज से अधिक कुछ नहीं है, निश्चय ही उचित है। परमेश्वर हम से बाहर अपने आप में अस्तित्व में है। वह पूर्णतः पवित्र सृष्टिकर्ता है जिसके प्रति सभी प्राणी उत्तरदायी हैं। 

किन्तु पवित्रता को प्रसन्नता से दूर करते हुए हम  त्रुटिपूर्ण रीति से दो भागों में विभाजन कर देते हैं।

प्रसन्न या पवित्र? 
जब आपको सन्देह होता है तो कलीसिया के दृढ़ (मजबूत) लोगों अर्थात्  प्युरिटंस पर दृष्टि डालें। विशेष रूप से इनमें से दो लोग बड़ी स्पष्टत रीति से पवित्रता से प्रसन्नता को अलग करने के आधुनिक प्रयास के प्रतिउत्तर देने में हमारी सहायता कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, थॉमस ब्रूक्स (1608-1680) ने उपयुक्त शीर्षक के अन्तर्गत 450 पृष्ठ की पुस्तक लिखी: क्राउन एंड ग्लोरी ऑफ क्रिश्चियनिटी: या, पवित्रता, द ओनली वे टू हैप्पीनेस (1662)। यह मानवीय प्रसन्नता और पवित्रता के अन्तर-सम्बन्ध का एक व्यापक बचाव है जो इस विचार को पवित्रशास्त्र से अकाट्य रूप से स्पष्ट करने हेतु एक के बाद एक, बिन्दु से उपबिन्दु तक चलता रहता है। 

प्राणों की सच्ची प्रसन्नता पवित्रता का कोई आकस्मिक प्रतिफल नहीं है। सच्ची प्रसन्नता ही सच्ची पवित्रता है । 

“पवित्रता नाम के अतिरिक्त किसी अन्य बात में प्रसन्नता से भिन्न नहीं है”, ब्रूक्स साहसपूर्वक अपनी पुस्तक के आरम्भ में लिखते हैं। “पवित्रता आरम्भ में प्रसन्नता है, और प्रसन्नता अपनी पूर्णता में पवित्रता है। प्रसन्नता और कुछ नहीं किन्तु पवित्रता का एक सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है।”

लगभक पुस्तक के अन्त में, वह इस बात को दोहराते हैं कि “पवित्रता की सम्पूर्ण परिपूर्णता प्रसन्नता की एक सम्पूर्ण परिपूर्णता बना देगी। जब हमारी पवित्रता सिद्ध होगी, तो हमारी प्रसन्नता भी सिद्ध होगी; और यदि यह पृथ्वी पर प्राप्त करने योग्य होता, तो मनुष्यों के स्वर्ग में रहने हेतु लालसा करने का बहुत कम कारण होगा।”

या हम प्रभावशाली मैथ्यू हेनरी (1662-1714) का उल्लेख कर सकते हैं, जो एक प्रसिद्ध विद्वान थे, जिन्होंने समान विचार को देखा। उन्होंने भजन 1:1-3 के बारे में लिखा, “केवल वही लोग प्रसन्न हैं जो वास्तव में प्रसन्न हैं तथा वही पवित्र हैं जो वास्तव में पवित्र हैं”, आगे लिखते हुए, “भलाई और पवित्रता केवल प्रसन्नता का एकमात्र मार्ग  ही नहीं हैं परन्तु स्वयं  में प्रसन्नता हैं।” 

ये प्युरिटंस इसे अच्छी रीति से जानते थे। प्राणों की सच्ची प्रसन्नता पवित्रता का कोई आकस्मिक प्रतिफल नहीं है। सच्ची प्रसन्नता ही सच्ची पवित्रता है । 

कुछ दिन पहले ही, जॉन पाइपर ने आस्क पास्टर जॉन एपिसोड में एक भी बेहतर समायोजन के साथ इस बिंदु पर विचार किया: उन्होंने कहा, “प्रसन्नता पवित्रता का भाग है”। “यदि आपने मेरे लिए यह वर्णन करने का प्रयास किया कि एक पवित्र व्यक्ति होने का क्या अर्थ है, तो परमेश्वर में प्रसन्नता को छोड़कर आप ऐसा नहीं कर सकते हैं। ऐसी कोई पवित्रता नहीं है जो परमेश्वर में प्रसन्न रहने के बिना है। परमेश्वर में पवित्रता के बिना कोई प्रसन्नता नहीं है। परमेश्वर में प्रसन्न होने का अर्थ — मैं इसे जोखिम में डालूंगा — पवित्रता का सार  है।”

परन्तु क्या पवित्रशास्त्र ऐसे दृढ़ कथनों का समर्थन करता है कि पवित्रता प्रसन्नता के साथ कितनी अटूट रूप से जुड़ी हुई है?

सच्ची प्रसन्न-पवित्रता 
भजन यहाँ अविश्वसनीय रूप से सहायक हैं। भजनकार प्रायः उन लोगों को सम्बोधित करते हैं जो धन्य  हैं — और धन्य  होने से उनका तात्पर्य है, वे लोग जो वास्तव में  प्रसन्न  हैं। 

तो कौन हैं जो धन्य या सच में प्रसन्न हैं?

“आत्मा की सच्ची प्रसन्नता पवित्रता का कोई आकस्मिक प्रतिफल नहीं है। सच्ची प्रसन्नता ही सच्ची पवित्रता है।”

सच में प्रसन्न वे हैं जो किसी न किसी रूप में सच में पवित्र हैं, और यह एक ऐसा विषय है जो इन भजनों में दिखाई देता है, भजन 1:1-2, 19:8, 32:8-11, 34:8-14, 40:4, 106:3, 112: 1, 119: 1-2, 22-4, 69-70, 143-4, 128: 1-6। 

परन्तु न केवल पवित्रता और प्रसन्नता (या आशीषित होना) भजनों में जुडे़ हैं; वे नीतिवचन में भी एक साथ जुड़े हुए हैं, और यीशु के द्वारा धन्य वाणियों में दृढ़ता से जुड़े हुए हैं (मत्ती 5:2-12)। 

और सच्ची प्रसन्न-पवित्रता पाने की किसी भी सम्भावना से पहले यह गहन वास्तविकता है कि हमारे पापों को एक पवित्र परमेश्वर के सम्मुख स्थायी रूप से और सदा के लिए अवश्य ही हटा दिया जाना चाहिए। ख्रीष्ट में धर्मी ठहराए जाने की एक सुन्दर वास्तविकता केवल विश्वास के द्वारा भजनकार की वास्तविक पवित्रता तथा ख्रीष्ट में हमारे पापों की क्षमा के लिए एक सेतु का निर्माण करती है (भजन 32:1-2, रोमियों 4:7-8)। 

यद्यपि अधूरेपन से, ख्रीष्टियों ने इस सच्ची प्रसन्न-पवित्रता का स्वाद चखा है, जैसा कि हम ख्रीष्ट में मिलन का जीवन जीते हैं। उस में, हम अपने आनन्द और आज्ञाकारिता के मध्य में, तथा सच्ची पवित्रता की हमारी खोज और सच्ची प्रसन्नता के हमारे अनुभव के मध्य में अलग न करने वाले स्वाभाविक सम्बन्ध को पाते हैं (यूहन्ना 15:1-17)। 

प्रसन्न-पवित्र परमेश्वर 
इसलिए, अपने अस्तित्व के मुख्य केन्द्र में हम प्रसन्न या पवित्र होना चाहते हैं। हम परमेश्वर के जैसे प्रसन्न-पवित्र होना चाहते हैं। परमेश्वर हर्ष तथा आनन्द का सोता है; वह एक प्रसन्न परमेश्वर है, जो अपने अनन्त आत्म-आनन्द में सन्तुष्ट है, और यह प्रसन्नता उसकी महिमा का भाग है (1 तीमुथियुस 1:11)। और हमारा महिमामय परमेश्वर एक ही समय में, अदूषित पवित्रता की अद्भुत लौ है, जो सभी मनुष्यों की भ्रष्टता के द्वारा विरोध किया गया है (1 तीमुथियुस 1:8-10)। 

इसलिए, जिसे परमेश्वर ने एक साथ जोड़ा है, उसे कोई भी ईश्वरविज्ञानी अलग न करे। 

चुनाव, जिसका आज हम सामना करते हैं
वास्तव में, प्रसन्नता की हमारी खोज एक मौलिक आग्रह, प्रथम पुरुष और स्त्री के रूप में प्राचीन के रूप में एक आग्रह है, जो उत्तर-आधुनिकतावाद, आधुनिकतावाद, प्रबोधन (जागृति) तथा दर्शनशास्त्री फ्रायड से पहले की इच्छा से प्रेरित है। 

पहले की प्रत्येक पीढ़ी के समान, हम एक ही प्राचीन चुनाव का सामना करते हैं, और यह प्रसन्नता और पवित्रता के मध्य चुनाव नहीं है, परन्तु प्रसन्नता के लिए दो भिन्न खोजों (एक बुरा, एक पवित्र) के मध्य में है। 

“इसलिए, जिसे परमेश्वर ने एक साथ जोड़ा है, उसे कोई भी ईश्वरविज्ञानी अलग न करे।”

खोज #1 ऐसी प्रसन्नता का पीछा करना है जो संसार की प्रतिमाओं तथा झूठी सुरक्षाओं तथा सुख-सुविधाओं द्वारा प्रतिज्ञा की गई हैं, परन्तु यह झूठ में बदल जाता है जो अन्त में हमें केवल शोकित ही कर सकता है। 

खोज #2 सच्ची प्रसन्नता है जो परमेश्वर में पाई जाती है, उसमें एक वास्तविक आनन्द है, उसकी महिमा और पवित्रता का एक अनन्त और अन्तहीन कोष जो सबसे ऊपर है।

लोग प्रसन्नता को प्राप्त करने के लिए पवित्रता को अनदेखा करते हैं यह जाने बिना कि दोनों एक ही हैं। इसलिए, यह एक कुंजी है। सच्ची पवित्र-प्रसन्नता हेतु युद्ध सही प्रसन्नता चुनने के लिए विश्वास हेतु एक दैनिक आत्मिक युद्ध है। 

उसी पॉडकास्ट एपिसोड पर वापस लौटने पर, पाइपर ने इस प्रसन्न-पवित्रता के दैनिक विश्वास-युद्ध को अच्छी रीति से संक्षेप में प्रस्तुत किया: “जब हम कहते हैं कि परमेश्वर आप में सबसे अधिक महिमान्वित होता है जब आप उस में सबसे अधिक सन्तुष्ट होते हैं, तो हम यह कहते हैं कि पवित्रता का अतिआवश्यक युद्ध, या पवित्रीकरण, परमेश्वर में सन्तुष्ट होने के लिए युद्ध है।” 

उस कथन में सच्चाई का भार है जो गहरे और लम्बे विचार के योग्य है।

टोनी रेंकी desiringgod.org के वरिष्ठ शिक्षक हैं, वह Ask Pastor John पॉडकास्ट के आयोजनकर्ता तथा परमेश्वर, तकनीकि और ख्रीष्टीय जीवन (2022) के लेखक हैं। वह अपनी पत्नी और तीन बच्चों के साथ फीनिक्स क्षेत्र में रहते हैं।

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