पुनरुत्थान के मौलिक प्रभाव
<a href="" >जॉन पाइपर द्वारा भक्तिमय अध्ययन</a>

संस्थापक और शिक्षक, desiringGod.org

यदि हमने केवल इसी जीवन में ख्रीष्ट पर आशा रखी है तो हमारी दशा सब मनुष्यों से अधिक दयनीय है। (1 कुरिन्थियों 15:19)

पौलुस अपने जीवन में नियमित जोखिम, और प्रतिदिन घात किये जाने, और वन-पशुओं के साथ अपने युद्ध से यह निष्कर्ष निकालता है कि यीशु के पीछे चलने का जो जीवन उसने चुना है वह मूर्खतापूर्ण और दयनीय होगा यदि वह मृतकों में से नहीं जिलाया जाएगा।

वह कहता है, यदि मृत्यु इस बात का अन्त होता, “तो आओ, खाएँ और पीएँ, क्योंकि कल तो मरना ही है” (1 कुरिन्थियों 15:32)। इसका अर्थ यह नहीं है कि यदि पुनरुत्थान नहीं है तो आओ हम सब पेटू और पियक्कड़ बन जाएँ। पियक्कड़ों की स्थिति भी दयनीय है — चाहे पुनरुत्थान हो या न हो। उसका अर्थ है: यदि पुनरुत्थान है ही नहीं, तो पृथ्वी के सुखों को बहुतायत से भोगने के लिए सन्तुलित मध्यम-वर्गीय जीवनशैली समझ में आती है।

परन्तु पौलुस ने उस बात का चुनाव नहीं किया। उसने दु:ख उठाने का चुनाव किया क्योंकि उसने आज्ञाकारिता चुनी। पौलुस का दमिश्क के मार्ग पर ख्रीष्ट के साथ सामना होने के पश्चात, हनन्याह प्रभु यीशु की ओर से शब्दों को लेकर उसके पास आया, “मैं उसे बताऊँगा कि मेरे नाम के लिए उसे कितना दुख सहना पड़ेगा” (प्रेरितों के काम 9:16)। पौलुस ने इस दु:ख उठाने को अपनी बुलाहट के भाग के रूप में स्वीकार किया।

पौलुस यह कैसे कर सकता था? इस मौलिक और कष्टदायी आज्ञाकारिता का स्रोत क्या था? इसका उत्तर 1 कुरिन्थियों 15:20 में दिया गया है: “पर अब ख्रीष्ट तो मृतकों में से जिलाया गया है, और जो सोए हुए हैं उनमें वह पहला फल है”। दूसरे शब्दों में, ख्रीष्ट जी उठा था, और मैं उसके साथ जी उठूँगा। इसलिए, यीशु के लिए किसी भी प्रकार का दु:ख उठाना व्यर्थ नहीं है (1 कुरिन्थियों 15:58)।

पुनरुत्थान की आशा ने पौलुस के जीने के ढंग को मौलिक रीति से परिवर्तित कर दिया था। इसने उसे भौतिकवाद और उपभोक्तावाद से स्वतन्त्र कर दिया है। इसने उसे बिना आराम और सुखों के लगे रहने की सामर्थ्य दी है, जिसके विषय में अधिकतर लोग यह मानते हैं कि उनके पास इस जीवन में वह होना ही चाहिए। उदाहरण के लिए, यद्यपि उसे विवाह करने का अधिकार था (1 कुरिन्थियों 9:5), किन्तु उसने उस सुख को त्याग दिया क्योंकि उसे अत्यन्त दु:ख उठाने के लिए बुलाया गया था।

यीशु ने कहा इसी रीति से पुनरुत्थान की आशा द्वारा हमारे व्यवहार को परिवर्तित हो जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, उसने हमें अपने घरों में ऐसे लोगों को आमन्त्रित करने के लिए कहा है जो इस जीवन में हमारे साथ पलट कर वैसा व्यवहार करने में असक्षम हैं। परन्तु ऐसा करने के लिए हमें कैसे प्रेरित किया जा सकता है? “धर्मियों के जी उठने पर तुझे प्रतिफल मिलेगा” (लूका14:14)।

यह हमारे लिए मौलिक बुलाहट है कि हम अपने वर्तमान जीवन की दृढ़ता से जाँच करें कि क्या वे पुनरुत्थान की आशा के द्वारा ढाले जा रहे हैं। क्या हम इस संसार में प्राप्त होने वाले लाभ के आधार पर निर्णय लेते हैं या आने वाले संसार में लाभ के आधार पर? क्या हम प्रेम के लिए उन जोखिमों को उठाते हैं जिन्हें केवल तभी ज्ञानपूर्ण समझा जा सकता है यदि पुनरुत्थान वास्तव में होगा? 

परमेश्वर हमारी सहायता करे कि हम जीवन भर के लिए स्वयं को पुन: समर्पित करने पाएँ कि हमारे ऊपर पुनरुत्थान के मौलिक प्रभाव होते रहें। 

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