आलस्य का ख्रीष्टीय जीवन में दुष्परिणाम

परमेश्वर ने मनुष्य को बनाया कि वह परमेश्वर द्वारा ठहराए गए कार्यों को करे, और ऐसा करने के द्वारा उसको महिमा दे (उत्पत्ति 2)। हमारा परमेश्वर कार्य करने वाला परमेश्वर है और वह चाहता है कि उसके लोग भी परिश्रम करें और उसके लिए जीवन जियें। परमेश्वर ने सृष्टि का कार्य किया। यीशु ख्रीष्ट ने भी कार्य करने का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण रखा है। परमेश्वर ने जैसा आदम को कार्य सौंपा था वैसा ही परमेश्वर ने हमें याजक और राजा का कार्य सौंपा है ताकि हम कार्य करने के द्वारा उसको सही रीति से प्रतिनिधित्व करें और उसके राज्य के प्रसार में उसके महिमा के लिए उपयोग किए जाएं। किन्तु ख्रीष्टीय जीवन में हम प्राय: अपने उत्तरदायित्व को पूरा न करने से संघर्ष करते हैं। ‘आलस्य’ को बहुत बार अनदेखा किया जाता या हल्के में लिया जाता है। परन्तु आलस्य का परिणाम हमारे जीवन में बहुत भयंकर पड़ता है।

आईये हम देखें कि आलस्य कैसे हमारे जीवन को बुरे परिणामों की ओर ले जाता है और हमारे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र पर हानिकारक प्रभाव डालता है। 

व्यक्तिगत जीवन में आलस्य का प्रभाव: यदि हम वास्तव में अपने जीवन का ईमानदारी से अवलोकन करें तो पाएंगे कि प्राय: हम आलस्य के कारण प्रतिदिन परमेश्वर के साथ अपने व्यक्तिगत सम्बन्ध में कम पाए जाते हैं। इसका यह परिणाम होता है कि धीरे-धीरे हम परमेश्वर के वचन का नियमित अध्ययन करने, व्यक्तिगत रीति से प्रार्थना में समय व्यतीत करने में आलस्य करने करते हैं। यदि वचन पढ़ते भी हैं, तो कई बार केवल रीति-रिवाज समझते हुए या दूसरों द्वारा पूछे जाने पर झूठ न बोलना पड़े, इसलिए जल्दी में पढ़ लेते हैं। परमेश्वर के वचन को पढ़ने में आलसी होने का परिणाम यह होता है कि जो हम सही से वचन पर मनन नहीं करते हैं। प्रार्थना बहुत ही हड़बड़ी में, केवल नाममात्र के लिए कर लेते हैं। 

इसके साथ ही आलस्य न केवल हमारे आत्मिक वरन शारीरिक, मानसिक स्थिति पर भी प्रभाव डालता है। हमारे प्रतिदिन के जीवन शैली को प्रभावित करता है- आलस्य का प्रभाव हमारे स्वास्थ्य पर पड़ता है। यह बिमारियों की ओर हमें ले जाता है। यह हमारे कार्य करने की क्षमता को कम करता है। आलस्य हमारे भविष्य के जीवन पर बुरा प्रभाव डालता है। यह हमारे जीवन के लक्ष्यों की ओर बढ़ने से हमें रोकता है। अधिकतर लोग यह शिकायत करते हैं कि उनकी दिनचर्या बहुत व्यस्त है इसलिए वे कई महत्वपूर्ण कार्य नहीं कर सकते, लेकिन वास्तव में यह उनके आलस्य के कारण होता है। यह अनुशासित न होने, सही योजनाएं न बनाने, और कार्य करने की इच्छा न होने के कारण होता है। 

आलस्य हमें बिमारी, कार्य कुशलता की कमी तथा निर्धनता की ओर ले जाता है। आलस्य कभी- कभी व्यक्ति को तनाव की ओर भी ले जाता है। जब व्यक्ति जीवन में बरबादी की कगार पर रहता है तो वह किसी अन्य पर दोष लगाता है, यह परमेश्वर को कोसता है, अवसर न मिलने की कमी या योग्यता न होने को दोष देता है लेकिन वास्तव में यह उसके आलस्य के कारण होता है। आलस्य के कारण व्यक्ति अभाव में रहता है। ‘आलस्य व्यक्ति को निर्धनता की ओर ले जाता है, जो परिश्रम करने में ढ़िलाई करता है वह कंगाल हो जाता है तथा नींद से प्रेम करने वाला दरिद्र हो जाता है (नीतिवचन 6:6-11, 10:4; 19:15)।’

पारिवारिक जीवन में आलस्य का प्रभाव: आलस्य इतना भयंकर परिणामों को लेकर आता है कि केवल व्यक्ति स्वयं के जीवन को ही नहीं वरन अन्य लोगों के जीवन पर भी बुरा प्रभाव डालता है। इसके कारण कई बार पति/पत्नी अपने उत्तरदायित्व को सही से पूरा नही कर पाते हैं। वे अपने बच्चों का सही रीति से पालन-पोषण नहीं कर पाते। पुरूष अपने परिवार को आत्मिक रीति से नहीं बढ़ा पाते। पुरूष आलस के कारण जो परिवार में आत्मिक अगुवाई का उत्तरदायित्व है उसको पूरा करने में ढ़ीले हो जाते हैं और इसका प्रभाव उस परिवार में स्पष्ट रूप से पढ़ता है।

केवल इतना ही नहीं वरन आलस्य के कारण पारिवर में टूटापन, सम्बन्धों में बिखराव, स्नेह एवं एकता की कमी होती है। यह जीवनसाथी, बच्चे, एवं परिवार के सब लोगों को भी चपेट में लेता है। यदि महिलाएँ घर पर बच्चों की सही रीति से देखभाल नहीं करती, वे टीवी, मोबाईल में अपना समय बरबाद करती हैं तो घर के प्रतिदिन के कार्य अस्त-व्यस्त हो जाते हैं। यदि पति आलसी हैं तो वह घर की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पाता हैं। इसका प्रभाव बच्चों पर भी पड़ता है क्योंकि वे परिवार में अपने-माता पिता को देखते हैं और उनके जैसे ही उनकी जीवन शैली होने लगती है। 

कलीसियाई जीवन में आलस्य का प्रभाव: आलस्य के कारण कलीसिया में हम अपनी भूमिका को गम्भीरता से नहीं लेते हैं। हम भूल जाते हैं कि सब विश्वासी कलीसिया की उन्नति के लिए कार्य करने के लिए बुलाये गए हैं। प्रत्येक विश्वासी जो किसी स्थानीय कलीसिया का भाग है, उसे अवश्य ही कलीसिया में विश्वासियों के साथ निरन्तर संगति रखने, पहुँनाई करने, एक -दूसरे के जीवनों में निवेश करना चाहिए। कई बार ऐसा भी होता है कि हमें कलीसिया में सेवा करने हेतु जो भूमिका या उत्तरदायित्व मिला है उसको हम पूरे मन से या अच्छी रीति से न करके आलस्य दिखाते हैं। कलीसिया के दूसरे भाई/बहन के जीवन की चिन्ता नहीं करते हैं। आलस्य के कारण सबसे पहले तो हम अपने आत्मिक स्वास्थ्य की परवाह नहीं करते और साथ ही अन्य भाई/बहन जो कलीसिया में विभिन्न परीक्षाओं, प्रलोभनों एवं संघर्षों में हैं, हम उनकी सहायता भी करने में स्वयं को दूर कर लेते हैं। आलस्य के कारण व्यक्ति ख्रीष्टीय भाई बहनो के साथ संगति में निरूत्साहित होने लगते हैं। अकेलापन और स्वार्थ के शिकार होने लगते हैं। वचन में मन नहीं लगता है, वचन की बात होने पर वहाँ से हटने का प्रयास करने लगते हैं। कलीसिया जाने के लिए रूचि, आनन्द, उत्साह में कमी आने लगती है। और इसका हमारे मित्रों एवं संगति सब पर प्रभाव पड़ता है। 

आलस्य अन्य गम्भीर पापों की ओर ले जाता है। आलस्य निष्क्रियता की ओर जाता है। आलस्य व्यक्ति को काम करने की अपेक्षा उसको निष्क्रिय रखने, अधिक आराम करने की चाहत, मनोरंजक की ओर ले जाता है। लोग घण्टों मोबाइल में, कम्प्यूटर पर इंटरनेट में फिल्में, सीरियल, रियलिटी शो देखने में समय बिताते हैं। वर्तमान में सस्ते इंटरनेट की उपलब्धता के कारण लोग आलस्य में अश्लील चित्रों, छोटे विडियों एवं वासना के लत के शिकार भी हो रहे हैं। इसके साथ ही आलस्य में बैठे रहना हमारे खाली दिमाग में और अधिक पाप करने की चाहत को बढ़ाती है। इस प्रकार यह हमें झूठ, लालच, पेटूपन तथा अन्य पाप में गिरा देता है। आलस्य हमारे भावी जीवन को गलत दिशा में ले जाता है। जब हम आलस्य करते हैं तो हम बहुत से पाप की ओर बढ़ जाते हैं।

कार्य क्षेत्र में आलस्य का प्रभाव: आलस के कारण कई बार लोग ना काम करने के सरल तरीके निकालते हैं और जल्दी निपटाना चाहते हैं। इसके लिए वे गलत साधनों का सहारा लेने से भी नहीं कतराते हैं। सेवकाई में आलसी पासबान कई बार दूसरों का प्रचार इंटरनेट से चोरी करते हैं, ताकि उन्हें अपने प्रचार पर स्वयं अधिक मेहनत न करना पड़े। कई बार आलस्य के कारण विद्यार्थी काम अपने मित्रों से कराते हैं, या नकल करते हैं और किसी दूसरे के काम को स्वयं का काम बना लेते हैं, जो वास्तव में सही नहीं है। चाहे हम विद्यार्थी हों, ऑफिस में कार्य करते हों, पासबान हो, या सेमिनरी के छात्र हों, व्यवसायी हों, माताएं हों, या चाहे हम जो भी कार्य करते हैं, चाहे जो भी हमारे पास उत्तरदायित्व हों, यदि हम आलस करते हैं जो हमअपने जीवन से ख्रीष्ट को सही रीति से प्रस्तुत नहीं करते हैं।

     उपरोक्त बातें स्पष्ट करती हैं कि आलस्य वास्तव में हम जीवन में प्रत्येक क्षेत्र में आगे बढ़ने में बाधक है। यह हमारे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपना बुरा प्रभाव डालता है। यह ऐसा पाप है जो हमें इस संसार में परमेश्वर द्वारा ठहराए गए कार्य को करने में निरूत्साहन लाता है। यदि हम और आप इस पाप से संघर्ष करते हैं, तो हमें अवश्य ही यीशु ख्रीष्ट के पास आने की आवश्यकता है। परमेश्वर की स्तुति हो कि उसका पुत्र यीशु हमारे सब पापों के लिए क्रूस पर बलिदान हुआ है। उसके कारण हमारे पास आशा है। वह सब प्रकार के पापों, दुष्टता, शैतान की शक्तियों पर विजयी हुआ है। इसलिए वह हमारे आलस्य पर भी विजयी है। उसने हमें पाप से तथा हमारे आलस से छुड़ाने के लिए अपना लहू बहाया है। इसलिए उसका वचन हमें अवसर देता है कि यदि हम अपने पापों को मान लें तो वह हमें हमारे सब पापों को क्षमा करने और सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है (1 यूहन्ना 1:9)।

आइये हम अपने आलस्य के पाप से पश्चाताप करें। इस पाप से लड़ने के लिए परमेश्वर से सामर्थ्य माँगे। परमेश्वर के वचन को पढ़ें, प्रार्थना करें और कलीसिया में एक-दूसरे से सहायता प्राप्त करें। ख्रीष्टीय यीशु ख्रीष्ट से जुड़े हुए हैं, उनका जीवन ख्रीष्ट में छिपा हुआ है। यीशु ख्रीष्ट आलसी नहीं थे। उसका जीवन बहुत सारे कार्यों में व्यस्त था। ख्रीष्ट यीशु में हम काम करने के आदर्श को देखते हैं। यहाँ तक कि उनकी सेवा के दौरान उनके पास खाने तथा विश्राम करने के लिए भी पर्याप्त नहीं मिलता था। उन्होंने उन सब कार्यों को सिद्ध रीति से पूरा किया, जिस कार्य को करने के लिए वह इस संसार में देहधारण करके आए। इसलिए यदि हम उसके सच्चे शिष्य हैं तो हम भी यीशु का अनुसरण करेंगे।  

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