हम परमेश्वर को क्या दे सकते हैं?

“प्रभु यीशु के ये वचन स्मरण रखो जो उसने स्वयं कहे: ‘लेने से देना धन्य है’।” (प्रेरितों के काम 20:35)

प्रायः हमारे जीवनों में जिनकी अहम भूमिका रही है, हम उन्हें उपहार देकर अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। परमेश्वर ने भी हमें इस संसार में जीवन जीने के लिए सब कुछ दिया है। हवा, पानी, धूप जैसी अनेक आधारभूत वस्तुएँ जिन्हें हम अपने आप नहीं प्राप्त कर सकते हैं। हम सृष्टिकर्ता परमेश्वर से जीवन के लिए सभी आवश्यक वस्तुओं को प्राप्त करना चाहते हैं, परन्तु इसके बदले में उसे हम क्या देते हैं इसके विषय में प्रायः विचार नहीं करते हैं। 

यद्यपि परमेश्वर को हमसे कुछ भी नहीं चाहिए, फिर भी हम धन्यवाद और कृतज्ञता में होकर उसे बहुत कुछ दे सकते हैं। क्योंकि परमेश्वर इस योग्य है कि हम उसे अपने सम्पूर्ण जीवन से महिमा दें। अतः आइए हम विचार करें कि हम परमेश्वर को क्या दें?  

धन्यवाद और स्तुति दें

सबसे पहले अपने जीवन का अवलोकन करते हुए देखें कि परमेश्वर ने हम सबके जीवन में अनगिनत उपकार किए हैं। बचपन से लेकर आज तक परमेश्वर ने हमें जीवन दिया और सम्भालकर रखा है। यद्यपि यह हो सकता है कि हमारे जीवनों में अनेक बार कठिनाईयाँ आयी हों। हो सकता है आप बीमार हुए हों या नौकरी अथवा व्यवसाय में आपने हानि उठाई हो, परन्तु स्मरण करें कि आप अभी भी जीवित हैं और परमेश्वर आपके लिए उपाय कर रहा है। परमेश्वर ने ही चिकित्सकों और औषधियों के द्वारा लाखों लोगों को स्वस्थ किया और आर्थिक हानि के बाद भी भोजन उपलब्ध कराया है। 

इतना ही नहीं यदि आप यीशु के पीछे चलते हैं तो आपको परमेश्वर ने वह अनन्त जीवन दिया है जिसे कोई छीन नहीं सकता है। इसलिए सबसे पहले परमेश्वर को धन्यवाद और स्तुति के बलिदान चढ़ाएं, क्योंकि ऐसे बलिदानों से परमेश्वर प्रसन्न होता है (इब्रानियों 13:15-16)।

अपने आपको दें

परमेश्वर ने हमें अपने स्वरूप और समानता में रचा है और हमें अपना आत्मा दिया है (उत्पत्ति 1:27)। वह कहता है कि “सब प्राण मेरे हैं, जैसे पिता का प्राण वैसे ही पुत्र का प्राण दोनों मेरे हैं” (यहेजकेल 18:4)। इसीलिए परमेश्वर चाहता है कि हम अपने शरीरों को जीवित, पवित्र और ग्रहणयोग्य बलिदान करके परमेश्वर को समर्पित कर दें (रोमियों 12:1)। हम अपने शरीर और मन दोनों परमेश्वर को देते हुए उसकी इच्छा पूरी करें, व्यवहारिक रीति से अपने आप को परमेश्वर को देने में – हमारी भावनाएं, समय, योग्यताएं और धन सम्मिलित हैं। 

यद्यपि परमेश्वर को हमसे कुछ भी नहीं चाहिए, फिर भी हम धन्यवाद और कृतज्ञता में होकर उसे बहुत कुछ दे सकते हैं। क्योंकि परमेश्वर इस योग्य है कि हम उसे अपने सम्पूर्ण जीवन से महिमा दें।

अपने समय को दें

सर्वप्रथम अपने समय का पुनरावलोकन करें कि आप अपने समय का कितना भाग परमेश्वर को देते हैं। सम्भवतः हममें से प्रत्येक जन परमेश्वर से अधिक समय अपने आपको देते हैं। समय हमारे जीवन का बहुत मूल्यवान भाग है जिसका हमें सही से प्रबन्धन करना चाहिए। सोचिए परमेश्वर प्रतिदिन हमें 24 घण्टे देता है, जिन्हें हम अगले दिन के लिए नहीं बचा सकते हैं। इसलिए “समय का पूरा पूरा उपयोग करें, क्योंकि दिन बुरे हैं” (इफिसियों 5:16)। अतः व्यक्तिगत रीति से परमेश्वर के साथ तथा उसके लोगों के साथ समय व्यतीत करें। साथ ही प्रतिदिन परमेश्वर के लिए एक निश्चित समय निर्धारित करें और योजना बनाएं कि इस समय को कैसे परमेश्वर के लिए फलदायक रीति से उपयोग करेंगे।

अपने वरदानों को दें

परमेश्वर ने प्रत्येक विश्वासी को वरदान दिए हैं, जिससे कि हम उनका उपयोग परमेश्वर की महिमा और कलीसिया की उन्नति के लिए कर सकें। अपने जीवन के बारे में सोचे कि परमेश्वर ने आपको कौन सा विशेष वरदान दिया है। समीक्षा कीजिए कि आपने पिछले वर्ष परमेश्वर की महिमा के लिए उसका उपयोग कैसे किया है? यह न सोचे कि आपके पास कोई वरदान नहीं है, परमेश्वर ने हम सबको प्रेम और भलाई करने का दान दिया है। आप परमेश्वर तथा उसके लोगों से अपनी शक्ति भर प्रेम कीजिए तथा अपनी योग्यताओं को उसकी सेवा के लिए प्रतिदिन के जीवन में उपयोग कीजिए। 

अपने धन को दें

“पृथ्वी और जो कुछ उसमें है सब यहोवा का ही है” (भजन 89:1)। भले ही हम सोचते हों कि धन सम्पत्ति हमने अपने परिश्रम से कमाया है, परन्तु हमें स्मरण रखना है कि परमेश्वर ही हमें सम्पत्ति प्राप्त करने की सामर्थ्य देता है (व्यवस्थाविवरण 8:18)। इतना ही नहीं उसने हमारे लिए अपने एकलौते पुत्र को दिया जिसमें हम नया जीवन पाते हैं। उपर्युक्त दोनों बातें हमें अपने धन देने के सन्दर्भ में उदार होने लिए प्रेरित करती हैं कि हम अपने धन को परमेश्वर के सुसमाचार कार्य हेतु और दूसरे विश्वासियों की सहायता हेतु देने के लिए सर्वदा तैयार रहें। इन सबके बाद भी यदि हमारा मन परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता और धन्यवाद से भरा नहीं है, तो हमें अपने हृदय को जाँचने की आवश्यकता है। 

अतः आप नियमित रूप से परमेश्वर की महिमा के लिए, अपने आपको, अपने समय को, अपनी योग्यताओं को और अपने धन को देने के लिए तैयार रहें। परमेश्वर का वचन कहता है कि, “… तेरे पास ऐसा क्या है जो तुझे नहीं मिला?” (1 कुरिन्थियों 4:7)। इसलिए क्यों न हम परमेश्वर को सम्पूर्ण मन और हृदय से महिमा दें। 

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