यीशु रोया

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जब वह नगर के निकट पहुंच रहा था तो वह शान्त प्रतीत हो रहा था। उसके मृतक मित्र की बहन उससे बाहर आकर मिली। उसने उसे सत्य और अनुग्रह के साथ सान्त्वना दी। परन्तु फिर उसने दूसरी बहन को देखा, जो प्रत्यक्ष रूप से अधिक भावुक थी। और फिर वह फूट-फूट कर रोने लगा।  

यीशु रोया। 

मात्र दो साधारण शब्द, परन्तु फिर भी उनका अत्याधिक महत्व है। यूहन्ना 11:35 बाइबल के सभी पदों में से सबसे छोटा है, परन्तु यह सबसे शक्तिशाली और अंतर्दृष्टि से भरा हुआ है। उचित रीति से ही इस सबसे छोटे पद को अपनी पृथक संख्या निर्धारित की गई थी। 

यहां हम संसार के परमेश्वर की महिमा की एक उल्लेखनीय झलक पाते हैं।

उसकी मानवीय भावनाएं
पुराने नियम में भविष्यवक्ता ने पहले ही बता दिया था “वह दुखी पुरुष था और पीड़ा से उसकी जान पहचान थी” (यशायाह 53:3)। हाँ, वह एक दुखी पुरुष था, परन्तु अपने लिए नहीं। “निश्चय उसने हमारी पीड़ाओं को आप सह लिया और हमारे दुखों को उठा लिया” (यशायाह 53:4)। क्योंकि उसका प्रेम महान है, उसने हमारी पीड़ा को अपनी पीड़ा बना लिया। 

यह बात स्वयं में स्वाभाविक रूप से प्रभावशाली नहीं है कि हमारे पास एक ऐसा राजा है जो कि रोता है। परन्तु यह एक बड़ी सान्त्वना की बात है हमारे पास एक ऐसा महाराजा है जो न केवल हमारी संरचना को जानता है (भजन 103:14) परन्तु उस बात को भी जानता है जो हमारे मन में है (यूहन्ना 2:25), परन्तु साथ ही वह हमारे मांस और लहू में भी सहभागी होता है (इब्रानियों 2:14)। 

स्वयं परमेश्वर ने हमारी मानवता को इस मनुष्य में होकर के ले लिया है। और इसके साथ, हमारी भावनाओं को भी धारण कर लिया है। और उनके साथ ही, यहाँ तक कि हमारे दुखों को भी ले लिया है। हम सीमित और दुर्बल हैं। किन्तु परमेश्वर ने हमें अत्याधिक भावनाएं दी हैं। हम उत्सव मनाते हैं। हम शोक करते हैं। हम आनन्दित होते हैं। हम रोते हैं। और हम ऐसा यीशु के साथ करते हैं जैसे मानो कि वह हम में से एक है। 

जॉन कैल्विन लिखते हैं, “ख्रीष्ट ने हमारी देह समेत हमारी भावनाओं को पहन लिया लिया है”। आरम्भ से अन्त तक सुसमाचारों में, यीशु स्पष्ट रूप से मानवीय भावनाओं को व्यक्त करता है। जब उसने सूबेदार के विश्वास के वचनों को सुना, “तो वह अचम्भित होता है” (मत्ती 8:10)। और वह गतसमनी के बगीचे में कहता है “मेरा मन बहुत उदास है, यहां तक कि मैं मरने पर हूँ” (मत्ती 26:38)। इब्रानियों 5:7 कहता है कि “उसने उच्च स्वर से पुकारकर और आंसू बहा बहा प्रार्थनाएं की”।

परन्तु कोई भी हमें उसके प्रिय शिष्य यूहन्ना के समान ख्रीष्ट की भावनाओं को वास्तविक रीति से नहीं दर्शाता है — चाहे वह प्रेम हो या क्रोध।

प्रेम से आंसुओं की ओर
यीशु मृतक लाज़र तथा उसकी दो बहनों से प्रेम रखता था यह बात यूहन्ना 11 अध्याय की तुलना में कहीं और अधिक स्पष्ट नहीं हो सकती है। पद 5 में लिखा है कि: “यीशु तो मार्था और उसकी बहिन और लाज़र से प्रेम रखता था”। पद 36 में: लोग यीशु के रोने के प्रतिउत्तर में कहते हैं, कि “देखो वह उस से कितना प्रेम करता था।” 

यीशु इसलिए नहीं रोया क्योंकि उसमें विश्वास की कमी थी, परन्तु इसलिए क्योंकि वह प्रेम से परिपूर्ण था। प्रेम में, वह रोने वालों के साथ रोता है। “जब यीशु ने उसे और उसके साथ आए यहूदियों को भी रोते देखा, तो वह आत्मा में अत्यन्त व्याकुल और दुखी हुआ” (यूहन्ना 11:33)। 

और यह तब भी हुआ जब वह जानता था कि लाज़र जी उठेगा। उसने अपने लोगों से यह बात कही थी, “यह बीमारी मृत्यु की नहीं, परन्तु परमेश्वर की महिमा के लिए है, कि इसके द्वारा परमेश्वर के पुत्र की महिमा हो” (यूहन्ना 11:4)। और फिर पुनः वह कहता है कि, “हमारा मित्र लाज़र सो गया है, परन्तु मैं जाता हूँ कि उसे नींद से जगाऊं” (यूहन्ना 11:11)। और इसके बाद भी, यीशु रोया।   

क्रोध से आंसुओं की ओर 
परन्तु उसके आंसू केवल उसके प्रेम के कारण ही नहीं है। वहू मृत्यु और अविश्वास पर धर्मी क्रोध भी दर्शाता है। यूहन्ना कहता है कि, “वह आत्मा में अत्यन्त व्याकुल और दुखी हुआ” —  सच में वह अशान्त और बेचैन हुआ था। वह क्रोधित और व्याकुल हुआ था। 

वही शब्द जो यहाँ “अत्यन्त दुखी” के लिए उपयोग किया गया है अन्य स्थान पर कड़ी चेतावनी के लिए उपयोग किया गया है (मत्ती 9:30, मरकुस 1:43), और डांट के लिए भी (मरकुस 14:5)। यह एक बहुत गम्भीर शब्द है। “बाइबल के बाहर उपयोग किये गये यूनानी भाषा में यह शब्द घोड़े की क्रोध में ध्वनि करने को उल्लेख कर सकता है, परन्तु जब मनुष्यों पर लागू किया जाता है, तो यह सर्वदा क्रोध, आक्रोश या भावनात्मक रोष की ओर संकेत करता है. . .। यह स्पष्ट रूप से अक्षम्य है कि इस भावनात्मक उथल पुथल को कम करके सहानुभूति, दु: ख, दर्द या इस प्रकार के प्रभावों के स्तर तक ले आऐं” (डी.ए. कॉर्सन, जॉन, 415-416)। इस प्रकार जब यीशु, लाज़र की कब्र पर पद 38 में आता है, तो वह “अत्यन्त दखी और व्याकुल हो जाता है”। 

परन्तु वह “अत्यन्त व्याकुल” भी होता है। वह विचलित तथा व्यग्र होता है। जब वह मृत्यु के आमने-सामने खड़ा होता है, तो वह जानता है कि इस शत्रु पर विजय पाने के लिए उसे क्या करना होगा। इस बार तो वह लाज़र को उसके जबड़ों से वापस ले लेगा। अगली बार वह स्वयं अपने जीवन को दे देगा। 

यहाँ समस्या उत्पन्न होती है
और वह पुन: व्याकुल होगा। जैसे स्वयं उसका समय निकट आता है तो वह प्रार्थना करता है कि, “अब मेरा जी व्याकुल  हो उठा है। क्या मैं यह कहूँ, ‘हे पिता, मुझे इस घड़ी से बचा?’ (यूहन्ना 12:27)। जब वह अपने विश्वासघाती को पहचानता है, तो इसका अर्थ क्या होगा कि, “जब यीशु यह कह चुका तो आत्मा में व्याकुल हुआ, और साक्षी देकर कहा, “मैं तुमसे सच सच कहता हूं, कि तुम में से एक मुझे पकड़वाएगा।” (यूहन्ना 13:21)। 

यह एक ऐसी व्याकुलता है जिसका सामना उसे स्वयं करना है। उसके शिष्य उसके साथ इसका सामना नहीं कर सकते हैं। वास्तव में तो, वह स्वयं उनके लिए इस व्याकुलता का सामना करता है। और इसलिए वह उनसे कहता है, “तुम्हारा हृदय व्याकुल न हो” (यूहन्ना 14:1), और वह पुन: कहता है, “तुम्हारा मन व्याकुल न हो, और न भयभीत हो” (पद 27)। वह इस भय का सामना करेगा ताकि वह बच सकें। 

परन्तु पद 5 और 36 का प्रेम, और पद 33 का आघातजन्य क्रोध, उसे पद 35 के आंसुओं की ओर ले जाता है। क्योंकि उसने प्रेम किया था, और क्योंकि उसने मृत्यु को आमने-सामने देखा था, और वह उसकी बुराई पर क्रोधित हुआ तथा इस बात के लिए उसने दृढ़ निश्चय किया कि बुराई को बने रहने नहीं दिया जाना चाहिए, तो इसलिए वह आंसुओं के साथ फूट फूटकर रोने लगा। अन्य लोग तो रो रहे थे। परन्तु यीशु  ने फूट फूटकर विलाप किया।

ऐसे आंसू विश्वास की कमी से उत्पन्न नहीं होते हैं। यह रोना तो निश्चित रूप से विश्वास का प्रतिउत्तर है। कार्सन कहते हैं कि,“वही पाप और मृत्यु तथा वही अविश्वास जिसने उसके क्रोध को बढ़ाया था, उसी ने उसके दुख को भी उत्पन्न किया था।” वे लोग जो यीशु के शिष्य के रूप में आज उसका अनुसरण करते हैं उनके लिए उसी तनाव को सीखना उत्तम बात होगी— आघातजन्य क्रोध के बिना शोक और करुणा मात्र भावना ही बन कर रह जाते हैं, जबकि आघातजन्य क्रोध बिना दुख के स्वधर्मी अहंकार और चिड़चिड़ापन में कठोर हो जाता है” (416)। 

आंसुओं से कार्य की ओर 
यीशु का रोना निराशा और हार मानने के कारण नहीं उत्पन्न होता है। यह ऐसे व्यक्ति के आंसू नहीं हैं जिसने स्वयं को शक्तिहीन समझ लिया है और वह आत्मसमर्पण करने के लिए तैयार है। किन्तु ये स्नेह और क्रोध से मिलकर बने हुए आंसू हैं, जो कार्य करने के लिए प्रेरित करता है। वह कार्य यह है कि वह लाज़र को जिला उठाएगा। 

इस मृत्यु पर विजय पा ली जाएगी, परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि इसके कारण शोक नहीं किया जाएगा। और उसकी स्वयं की मृत्यु एक महान विजय होगी, परन्तु यह यन्त्रणादायक पीड़ा के बिना नहीं होगी। वह सबसे महानतम दुखों से होकर जाएगा। वह पुकारेगा, “हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तू ने मुझे क्यों छोड़ दिया?” (मत्ती 27:46)। 

जब लाज़र को जिला दिया जाएगा, तो उसके बाद वह कलवरी के मार्ग पर लौट आएगा ताकि वह पाप और मृत्यु के साथ अपनी अन्तिम निर्णायक मुठभेड़ कर सके। 

हम देखते हैं कि परमेश्वर हमारे अस्तित्व की पीड़ाओं से दूर नहीं है।

वह आंसुओं को पोंछता है
यीशु रोया। और इन आंसुओं में हम देखते हैं कि परमेश्वर हमारे अस्तित्व की पीड़ाओं से दूर नहीं है। वह हमारे निकट खिंचा आया है। वह हमारी देह और लहू को धारण कर लिया है। उसने हमें उस मनुष्यत्व के लिए नहीं बुलाया है जिसे वह स्वयं लेने के लिए तैयार नहीं था। हमें ऐसे संसार में नहीं त्याग दिया है जिसमें वह प्रवेश करने के लिए तैयार नहीं था। हम ऐसी कोई पीड़ा सहन नहीं करते हैं जिसे वह स्वयं सहने के लिए तैयार नहीं था। 

यीशु रो पड़ा। उसने स्वयं को आपकी पीड़ाओं से ऊपर नहीं माना, परन्तु उसने हमारे स्वरूप को धारण करके अपने आप को शून्य कर दिया और हमारी समानता में उसने जन्म लिया (फिलिप्पियों 2:7)। ख्रीष्टीय सन्देश का सबसे मुख्य केन्द्र यह है कि हर्षित परमेश्वर ने हमारे रोते हुए संसार से इतना प्रेम किया कि उसने हमारे साथ रोने के लिए अपने पुत्र को, पूरी रीति से त्याग के स्थान पर दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह हमेशा के लिए न रोये, किन्तु चिरस्थायी आनन्द पाए।

और एक दिन, जब वह हमारे सब आँसू पोछेगा, तो ऐसा इसलिए नहीं होगा कि वह हमारी उदासी को दबा रहा होगा। किन्तु जो हमारे आसूंओं को पोछता है, उसने स्वयं अपने आंसुओं को बहाया है। और फिर वह विजयी हुआ। 

 इन दो शब्दों में यही हमारा सुसमाचार है। यीशु रोया।

डेविड मैथिस desiringGod.org के कार्यकारी संपादक हैं और मिनियापोलिस/सेंट में सिटीज चर्च में पासबान हैं।

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