पवित्रता क्या है और क्या नहीं है?

“पवित्रता” का विचार लगभग प्रत्येक धर्म में उपयोग होता है। यहाँ तक कि बहुत से विज्ञापनों में भी किसी खाद्य पदार्थ की शुद्धता को “पवित्रता” के द्वारा समझाया जाता है। परन्तु वास्तव में पवित्रता का अर्थ क्या है? परमेश्वर का वचन पवित्रता के बारे में क्या कहता है? इससे पहिले कि हम इन बातों पर ध्यान दे हम पवित्रता के बारे में कुछ भ्रान्तियों पर ध्यान देना चाहते हैं और नकारना चाहते हैं कि पवित्रता क्या नहीं है।  

पवित्रता के बारे में भ्रन्तियाँ: 

पवित्रता के बारे में बहुत सी भ्रन्तियाँ है जिन्हें हम अपने अनुभवों से लोगों के विचारों के आधार पर अपना लेते हैं। 

साफ-सफाई पवित्रता नहीं है।  मैं एक गन्ने की जूस की दुकान देखी है जिसके ऊपर एक विज्ञापन लगा था कि यहाँ पर साफ शुद्ध एवं पवित्र गन्ने का जूस मिलता है। बहुत से लोग श्वेत कपड़े पहिने वालों या किसी विशेष रंग के पकड़े धारण करने वालों को पवित्र मानते हैं। यीशु ने भी इस विषय पर कुछ टिप्पणी की। उन्होंने फरीसियों के लम्बे तथा विशेष प्रकार के वस्त्रों की आलोचना की जो कि समाज में उन्हें विशेष या पवित्र लोग करके दिखाता था। तो स्पष्ट है कि यह बाइबलीय समझ नहीं है।

शाकाहारी भोजन का सेवन करना पवित्रता नहीं है। मैंने कई बार इस बात सुना है जो केवल शाकाहारी भोजन का सेवन करते हैं उन्हें अधिक शुद्ध या पवित्र करके देखा जाता है। बहुत से लोग जो लहसुन और प्याज भी नहीं खाते हैं यह धारणा रखते हैं कि वे अधिक पवित्र हैं। 

पवित्रता का मूल उद्गम 

तो फिर आखिरकार पवित्रता क्या है?

किसी विशेष वस्तु या स्थान पर जाने से लोग अपवित्र या पवित्र नहीं होते हैं। मैंने कई बार समाचार पत्र में, यह सन्देश पढ़ा कि एक व्यक्ति किसी हमारे समाज में अधिकतर इस बात पर बल दिया जाता है कि यदि कोई नीची जाति का व्यक्ति किसी ऊँची जाति के मन्दिर में चला जाए तो वह जगह अपवित्र हो जायेगी। 

पुराने नियम में, पवित्रता के लिए इब्रानी शब्द कादोश है जिसका आधारभूत अर्थ होता है, अलग, भिन्न। 

“किसी चीज या किसी व्यक्ति के पास विशेष उपयोग के लिए अलग किया गया गुण। जब इसे परमेश्वर पर लागू किया जाता है, तो यह उसकी पूर्ण पूर्णता और सृष्टि पर पूर्ण सर्वोपरिता को सन्दर्भित करता है। परमेश्वर के लोगों को उसकी पवित्रता का अनुकरण करने के लिए बुलाया गया है (लैव्य. 19:2), जिसका अर्थ है पाप से अलग किया जाना और अपने उद्देश्यों के लिए नियुक्त होना”।

इस विचार को हम एक उदाहरण के द्वारा अधिक समझ सकते हैं। उत्पत्ति 2:3 में, सर्वप्रथम परमेश्वर के वचन में यह शब्द-“पवित्र” आया है जहाँ परमेश्वर सातवें दिन को पवित्र ठहराते हैं। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि सातवाँ दिन स्वयं में या अपने स्वभाव में बाकी दिनों से भिन्न नहीं था परन्तु क्योंकि वह परमेश्वर के लिए अलग कर दिया गया था इसलिए वह अब भिन्न था। इसी प्रकार से हम निर्गमन 3 में, भूमि के बारे में, निर्गमन 26 में महायाजक के बारे में, समझ सकते हैं जब परमेश्वर कहता है कि वह पवित्र है। वह व्यक्ति अपने तत्व में भिन्न नहीं है परन्तु वह परमेश्वर द्वारा अगल किया गया है। 

मसीही होने के नाते, इस सत्य का हम पर बहुत बड़ा प्रभाव डालता है। परमेश्वर का वचन, विशेष रीति से नया नियम, विश्वासियों को पवित्र लोग करके सम्बोधित करता है (रोमियों 1:7; 1 कुरि. 1:3; 2 कुरि. 1:1; इफि. 1:1; फिलि. 1:1; कुलु. 1:2; 1 पत. 1:2; )। इसका अर्थ हुआ है हम अभी भी अन्य लोगों के समान हड्डी-मांस के ही व्यक्ति है परन्तु हमारी आत्मिक स्थिति बदल गई है। हम यीशु मसीह में पवित्र ठहरा दिए गए हैं।

इसका अर्थ यह हुआ कि हम किसी वस्तु को छूने से, खाने से, विशेष रंग के कपड़े पहिनने या साफ सफाई से अपवित्र या पवित्र नहीं होते हैं परन्तु परमेश्वर के द्वारा किसी वस्तु या व्यक्ति को किसी विशेष कार्य के लिए अलग करना पवित्रता है। 


1 ESV Global Study Bible: English Standard Version (Wheaton, Ill: Crossway, 2012), 1914.

2 Abrahms John, “पवित्रता की परिभाषा: शुद्धिकरण – The Definition of Holiness: Sanctification,”

SermonAudio, September 19, 2012, pt. middle,

https://www.sermonaudio.com/sermoninfo.asp?m=t&s=66197911441.