कलीसियाई आराधना में खरी शिक्षा क्यों आवश्यक है?

किसी भी कलीसिया में आराधना एक सबसे महत्वपूर्ण भाग है। जब विश्वासी सप्ताह में एक साथ इकट्ठे होते हैं तो सब इस बात को ध्यान में रखते हुए आते हैं कि वे जीवित सच्चे, उद्धारकर्ता प्रभु की आराधना करने के लिए साथ आए हैं। सब कलीसियाएँ आराधना को महत्व देती हैं। बहुत ख्रीष्टीय आराधना में भिन्न प्रकार के अनुभव को चाहते हैं, परन्तु एक बात जिस पर हम ध्यान देने की आवश्यकता है वह यह है कि हमें कलीसियाई आराधना के लिए क्या चाहिए? खरी शिक्षा! 

परमेश्वर जो है और जो वह करता है, उसके लिए अवश्य ही उसकी आराधना की जानी चाहिए।

आइए हम ध्यान दें कि खरी शिक्षा कैसे हमारी कलीसियाई आराधना पर प्रभाव डालती है या क्यों कलीसिया को खरी शिक्षा की अत्यन्त आवश्यकता है!

खरी शिक्षा हमें बताती है कि हमें क्यों परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए: खरी शिक्षा आराधना की सामग्री है। खरी शिक्षा परमेश्वर के चरित्र की सिद्धता को प्रकट करती है। भजन 23, 95, 100 को यदि हम देखें तो हम पाएँगे कि भजनकार वहाँ पर परमेश्वर की आराधना करने के लिए आह्वाहन दे रहा है किन्तु वह आराधना करने के लिए निर्देश ही नहीं दे रहा बल्कि कारण भी देता है कि परमेश्वर कौन है कि उसकी आराधना कैसे की जाए। खरी शिक्षा हमें परमेश्वर के विषय में सत्यों को प्रकट करती है। परमेश्वर के वचन अर्थात पवित्रशास्त्र में परमेश्वर अपने लोगों को आराधना सम्बन्धित बातों को बताता है। पवित्रशास्त्र वर्णन करता है कि परमेश्वर जो है और जो वह करता है, उसके लिए अवश्य ही उसकी आराधना की जानी चाहिए। आराधना हमारे विषय में नहीं है। आराधना परमेश्वर के विषय में है। आराधना परमेश्वर को वह महिमा देना है जिसके वह योग्य है जो वह और जो उसने ख्रीष्ट के द्वारा हमारे जीवन में किया है। आराधना परमेश्वर को हृदय से सराहना, स्तुति करना और आज्ञाकारिता में जीवन जीना है। खरी शिक्षा इस प्रकार हमें वह परमेश्वर की आराधना करने हेतु तथ्य, कारण, उसके गुण, उसके अद्भुत कार्यों को सही रीति से प्रस्तुत करता है, जो हमें उसकी स्तुति आराधना करने के लिए बाध्य करती है।

आराधना परमेश्वर को हृदय से सराहना, स्तुति करना और आज्ञाकारिता में जीवन जीना है।

खरी शिक्षा हमें बताती है कि हमें कैसे परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए: खरी शिक्षा विशेष रीति से  हमें परमेश्वर को प्रसन्न करने वाली आराधना करने में सक्षम करती है, जिसके लिए हम बनाये गए हैं।  परमेश्वर इस बात के लिए गम्भीर है कि हम उसकी आराधना कैसे करते हैं। इसलिए हम पूरी बाइबल में देखते हैं कि परमेश्वर अपनी आराधना के विषय में पुराने नियम एवं नये नियम में बहुत गम्भीर है। जब परमेश्वर ने इस्राएल को बुलाया तब उसने उन्हें उसे छोड़ अन्य किसी भी वस्तु की आराधना करने के लिए मना किया। एक प्रभु के सेवक लिगन डंकन ने कुछ इस प्रकार से कहा कि, दो प्रकार से मूर्तिपूजा होती है: सच्चे परमेश्वर को छोड़ किसी अन्य वस्तु की आराधना करना या सच्चे परमेश्वर के गलत रीति से आराधना करना। परमेश्वर आरम्भ से ही अपने आराधना के विषय में गम्भीर है। 

नया नियम के अनुसार हम सीखते हैं कि जब हम कलीसियाई रीति से इकट्ठे होते हैं तो हमें बाइबल को पढ़ना एवं प्रचार करना चाहिए (1 तीमु 4:13; 2 तीमु 4:2) हमें प्रार्थना करना चाहिए (1 तीमु 2:8) भजन गाना, आत्मिक गीत गाना (इफिसियों 5:18-19 कुलु 3:16-17) एव कलीसियाई विधियों प्रभु भोज एंव बपतिस्मा को पालन करना (मत्ती 20:19; 1 कुरि 11:23-26)। खरी शिक्षा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जो हम विश्वास करते हैं, वह हमारे कार्य को प्रभावित करता है। इसके साथ ही खरी शिक्षा हमारी सहायता करती है कि हम इन बातों को जानें कि हमें धन्यवादी, कृतज्ञ हृदय के साथ परमेश्वर की आराधना करनी है (कुलु 3:17), एकता में (रोमियों 15:6), आत्मा और सच्चाई से (यूहन्ना 4:24) करें। 

खरी शिक्षा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जो हम विश्वास करते हैं, वह हमारे कार्य को प्रभावित करता है।

खरी शिक्षा हमारी आराधना को सही संरचना प्रदान करती है: खरी शिक्षा कलीसियाई आराधना को सही रीति से करने के लिए प्रेरित करती है। हमें कलीसिया में सिद्धान्तों से भरे गीत और भजन गाने चाहिए। सामूहिक रीति से बाइबल को पढ़ना चाहिए। प्रार्थनाएं बाइबल पर आधारित होनी चाहिए, जो हमें यह स्मरण दिलाए कि परमेश्वर कौन है और उसने ख्रीष्ट में हमारे लिए क्या किया है। इसलिए आवश्यक है कि हमारी कलीसियाओं की आराधना खरी शिक्षा से भरी हुई होनी चाहिए। खरी शिक्षा हमें आराधना करने के लिए प्रोत्साहित करती है। वाद्य यन्त्र हमें उसकी आराधना के लिए प्रेरित नहीं करती वरन ये केवल गीत गाते हुए आराधना करने का साधन है। किन्तु यदि हमारे हृदय और मस्तिष्क परमेश्वर के वैभव एवं उसकी महानता के लिए प्रतिउत्तर नहीं देते हैं तो वास्तव में हम आराधना नहीं कर रहे हैं, भले ही हम कितने भी जोश एवं उत्साह के साथ संगीत का आनन्द उठाते हुए गीत क्यों न गा रहे हों!

वाद्य यन्त्र पर हमें आराधना के लिए इतना आश्रित नहीं होना चाहिए; इसे कलीसियाई रीति से गाते समय केवल सहायता के लिए उपयोग करना चाहिए। मुख्य बात यह नहीं होनी चाहिए कि संगीत कितना अच्छा है, बल्कि यह होना चाहिए कि हम परमेश्वर की महिमा सब लोगों के साथ कैसे कर रहे हैं।  

खरी शिक्षा हमें सच्चे परमेश्वर की आराधना करने के लिए मार्गदर्शन करती है: भजन 29:2 स्पष्ट करता है कि, “यहोवा की ऐसी महिमा करो जो उसके नाम के योग्य हो, पवित्रता से शोभायमान होकर यहोवा को दण्डवत करो।” आराधना केवल वह नहीं है जो हम केवल कलीसिया में करते हैं, वरन पौलुस हमें उत्साहित करता है कि हमारा सम्पूर्ण जीवन परमेश्वर की आराधना के लिए जीवित बलिदान है (रोमियों 12:1-2)। परमेश्वर की सही रीति से आराधना करने के लिए हमें यह जानने की अत्यन्त आवश्यकता है कि, परमेश्वर ने इस बात को अपने वचन के द्वारा प्रकाशित किया है। इसलिए खरी शिक्षा हमें प्रशिक्षित करती है कि हम पवित्रशास्त्र का पालन करें और जैसा परमेश्वर चाहता है वैसा ही उसकी आराधना करें।  

इसलिए यह आवश्यक है कि कलीसियाएं सच्चे पवित्रशास्त्र की खरी शिक्षा के आधार पर आराधना करें। यह कलीसिया में गीत, प्रार्थना एवं प्रचार में खरी शिक्षा होना चाहिए। कलीसियाई आराधना में खरी शिक्षा ही हमारी सहायता करेगी कि हम परमेश्वर की आराधना परमेश्वर के अनुसार करें। 

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