यीशु ख्रीष्ट क्रूस पर बलिदान होने के द्वारा एक नया परिवार बनाता है।

तो जब यीशु ने अपनी माता, और उस चेले को जिस से वह प्रेम करता था, पास खड़े हुए देखा तो अपनी माता से कहा, “हे नारी ! देख, तेरा पुत्र !” तब उसने चेले से कहा, “देख, तेरी माता !” और उस समय से वह चेला उसे अपने घर ले गया (यूहन्ना 19: 26-27)।

वास्तव में यीशु का जीवन अद्भुत है। वह सबसे अनोखा परमेश्वर है। उसके जैसा कोई नहीं। वह क्रूस पर रहते हुए भी दूसरों के लिए तथा अन्य केन्द्रित जीवन को जिया। हम देखते हैं कि पहली वाणी में, वह अपने सताने वालों के बारे में यह कहते हुए प्रार्थना करते हैं, “हे पिता, इन्हें क्षमा कर।” दूसरी वाणी में वह अपने दाहिने ओर डाकू से प्रतिज्ञा करते हैं “आज ही तू मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा।” तीसरी वाणी में भी देखते हैं कि उसने अपना ध्यान अपनी माँ की चिन्ता करते हुये वह प्रिय शिष्य यूहन्ना को देखभाल करने के कार्य के साथ सौंप देते हैं । क्रूस के द्वारा यीशु  एक नया परिवार बनाता है। इसलिए, इस लेख में हम तीसरी वाणी से एक मुख्य बात को देखने का प्रयास करेंगे कि यीशु ख्रीष्ट क्रूस पर बलिदान होने के द्वारा एक नया परिवार बनाता है। 

यीशु ख्रीष्ट एक नया परिवार बनाता है।

हम यूहन्ना 19: 23-27 के संदर्भ में देखते हैं, सैनिकों ने यीशु को क्रूस पर चढ़ा कर और उसके ऊपरी वस्त्रों को उतार कर आपस में चिट्ठी ड़ालते हैं। यह भी देखते हैं कि यीशु मसीह का परिवार क्रूस के ठीक सामने खड़ा है, उसकी माँ, उसके रिश्तेदार हैं, जिनसे यीशु उन शब्दों के साथ बात करते हैं जो उन सभी का पारिवारिक शब्दों में वर्णन करते हैं। यीशु खून से लथपथ हैं और मरने के कगार पर है और उसकी माता इस दर्दनाक स्थिति को देख रही है। ऐसी स्थिति में यीशु मसीह यह नहीं कह रहे है कि मैं मर रहा हूँ मुझे बचाओं, बल्कि अपनी माता की चिन्ता कर रहे हैं। यीशु ने अपनी माता से कहा, हे नारी देख तेरा पुत्र।

यहाँ पर ध्यान देने वाली बात यह है कि, यीशु मसीह अपनी माता को माता कहकर नहीं, बल्कि हे नारी’ कहकर पुकारते हैं। यीशु ने क्यों कहा, हे नारी ? यहाँ पर जब यीशु मसीह अपनी माता को नारी कहकर पुकारते है, तो वह अनादर नहीं कर रहे है। बाइबल में हम अपने उद्धारकर्ता के बारे में देखते हैं, वह हमेशा चाहे अपनी माता हो या चाहे कोई अन्य महिला हो, उसके साथ आदर के साथ व्यवहार करते हैं। 

कुछ लोग कहते हैं कि यीशु ने उसकी माँ को इसलिए माता करके नहीं बुलाया क्योंकि वह उसके दु:ख को और बढ़ाना नहीं चाहता था। लेकिन वास्तव में, इसका कारण कहीं अधिक गहरा है। जैसे-जैसे यीशु छुटकारे के कार्य के निकट आया, मरियम के साथ एक नया सम्बन्ध विकसित होने लगा था। यीशु मसीह एक नये परिवार को स्थापित करने जा रहे थे। यीशु अपनी मृत्यु से पहले अपने पारिवारिक सम्बन्धो को खारिज नहीं करता है, लेकिन अपनी मृत्यु के द्वारा परिवार के नए सम्बन्धो के साथ एक नए परिवार का निर्माण करता है, जिसका प्रतिनिधित्व उन दो लोगों द्वारा किया जाता है जिनके साथ वह निकट था।

ध्यान दीजिए, यीशु मसीह अपने दूसरे भाइयों के हाथ में अपनी माता को नहीं सौंप रहे हैं। जब यीशु मसीह अपने प्रिय चेले यूहन्ना से कहते है कि “देख, तेरी माता !” यहाँ पर यीशु मसीह अपनी माता की देखभाल करने के लिए, अपने चेले यूहन्ना को पुत्र के रूप में ज़िम्मेदारी सौंपते है, ताकि यूहन्ना के द्वारा उसकी माता की देखभाल हो सके। ऐसा प्रतीत होता है कि मरियम के पति का देहान्त हो चुका है और सारे घर की ज़िम्मेदारी यीशु मसीह के ऊपर थी। इस कारण से यीशु मसीह अपनी ज़िम्मेदारी को निभा रहे है। यीशु मसीह ने जान-बूझकर इस समय को चुना जब वह क्रूस पर लटका हुआ है अपनी माता के लिए किसी को प्रबन्ध करे कि वह उसकी देखभाल कर सके। यहाँ पर यीशु की माता और यूहन्ना के बीच में हम नये सम्बन्ध तथा नये परिवार को देखते हैं। यह नया परिवार वह कैसे बनाता है? नये परिवार का आधार क्या है?

यीशु ख्रीष्ट क्रूस पर बलिदान होने के द्वारा एक नया परिवार बनाता है । 

27 पद में लिखा है, और उस समय से वह चेला उसे अपने घर ले गया। हम इस बात को देखते हैं कि क्रूस पर से एक नया परिवार का निर्माण हुआ है और इस नये परिवार की नींव यीशु के बलिदान से जुड़ी हुई है। उसकी माँ, विश्वास का एक आदर्श, और वह शिष्य जिसे यीशु ने प्रेम किया और अपने करीब रखा, दोनों एक हैं, जैसे माँ शिष्य को स्वीकार करती है और शिष्य माँ को स्वीकार करता है। 

यह हमारे विश्वास के लिए एक बड़ा प्रोत्साहन है, जब यीशु मरियम से कहते हैं “यूहन्ना को अपने पुत्र के रूप में देखो” और यूहन्ना को कहते हैं “मरियम को अपनी माँ के रूप में देखो” यीशु ने हमें क्रूस से नया परिवार तथा कलीसिया उपहार दिया है। यीशु का क्रूस यहूदियों और रोमी के लिए शाप था परन्तु यह हमारे लिए आशिष है। क्रूस के द्वारा यीशु ने एक नया परिवार बनाया है। यह परिवार हमारे शारीरिक परिवार से बढ़कर प्रेम करने वाला, देखभाल करने वाला, निवेश करने वाला, प्रोत्साहित करने वाला परिवार है। यीशु मसीह ने क्रूस पर बलिदान होने के द्वारा हमारा उद्धार कर दिया तो उसने हमें अकेला नहीं छोड़ा है। बल्कि हमें एक आत्मिक परिवार तथा स्थानीय कलीसिया में जोड़ा है। कलीसिया हमारा आत्मिक परिवार है। 

यह परिवार जाति, बिरादरी के आधार पर निर्मित नहीं हुआ है, न ही यह परिवार मनुष्य की इच्छा से,  या खून के सम्बन्ध पर आधारित है, बल्कि क्रूस के द्वारा नये परिवार का निर्माण हुआ है। इसी बात को हम मरकुस में देखते हैं, भीड़ ने यीशु से कहा कि उसकी माता और भाई बाहर उसे ढूँढ़ रहे हैं। उसका उत्तर चकित कर देने वाला था, यीशु ने कहा, मेरी माता और मेरे भाई कौन है? और अपने चारों ओर बैठे हुए लोगों से कहा, देखो, मेरी माता और मेरे भाई! क्योंकि जो कोई परमेश्वर की इच्छा पर चलता है, वही मेरा भाई, मेरी बहन और माता है (मरकुस 3: 32-35)। 

इसलिए आज हम कलीसिया में देखते हैं कि लोग अलग-2 पृष्टभूमि से, अलग अलग जातियों से, अलग-अलग रंग के लोग, पढ़े लिखे या अनपढ़ के लोग एक साथ जमा होते हैं। क्योंकि हम सब मसीह में एक हैं। इस कारण से हम ख्रीष्टीय एक दूसरे को “भाई और बहन” कहते हैं। क्योंकि हम आपस में सगे सम्बन्धी है। यह कलीसिया की सुन्दरता है। क्या आप जानते हैं कि हमको किसने एक किया? यीशु के क्रूस ने हमें एक बनाया।यीशु ख्रीष्ट के बिना, हम अन्यजाति थे, वाचा की आशीषों के लिए परदेशी थे और केवल परमेश्वर के न्याय के योग्य थे। बाइबल बताती है कि हम आशाहीन थे। परन्तु परमेश्वर का धन्यवाद हो, अभी यीशु के क्रूस के द्वारा सबकुछ बदल जाता है। पौलुस इफिसुस के विश्वासियों से कहता है कि अत: तुम अब विदेशी और अजनबी न रहे परन्तु पवित्र लोगों के संगी स्वदेशी और परमेश्वर के कुटुम्ब के बन गये हो (इफिसियों 2:19)। हम पहले बाहर थे पर अब हम उसके लोग बन गए हैं। एक समय हम तो उसकी प्रजा न थे पर अब हम परमेश्वर की प्रजा हैं। हम परमेश्वर के कुटुम्ब के बन गए हैं। इसलिए हमें एक दूसरे से प्रेम करना है। एक दूसरे के जीवन में निवेश करना है। देखिए, मसीह ने हमारे लिए क्या किया है। हम कौन थे और अब हम क्या बन गए हैं। यह हमारे लिए अदभुत है। वह अद्भुत परमेश्वर है, उसने हमें अपने घर का सदस्य बनाया। आइये इस बात से हम आश्चर्यचकित हों और उसकी आराधना करें।

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