पास्टर जॉन से पूछें
क्या परमेश्वर अपने शत्रुओं से प्रेम करता है?
<a href="" >जॉन पाइपर के साथ साक्षात्कार</a>

संस्थापक और शिक्षक, desiringGod.org

ऑडियो प्रतिलिपि

कुन्दन नाम के एक श्रोता ने एक प्रश्न पूछा है: “पास्टर जॉन, मैं कुछ समय से marjsatyajeevan.com पर अधिक से अधिक संसाधनों का लाभ उठा रहा हूँ। और उन सभी बातों में एक बात जो मेरे लिए सबसे अलग दिखाई दी है, वह है परमेश्वर द्वारा स्वयं को ऊँचा उठाना। आप चर्चा करते हैं कि परमेश्वर हमारे लिए जो सबसे प्रेमपूर्ण कार्य कर सकता है, वह है स्वयं को ऊँचा उठाना, जबकि ऐसा करना किसी और के लिए पाप होगा। 

मेरा प्रश्न लगभग इसके विपरीत है। क्या ऐसी बातें हैं जिन्हें परमेश्वर ने हमें करने की आज्ञा दी है, किन्तु यदि परमेश्वर उन्हें करता है, तो वे पाप ठहरेंगे? विशेष रूप से, जब यीशु हमें अपने शत्रुओं से प्रेम करने के लिए कहता है। क्या परमेश्वर के लिए शैतान और पतित स्वर्गदूतों जैसे गैर-मानवीय शत्रुओं से प्रेम करना पाप होगा? अथवा क्या वह उनसे प्रेम करता है? पास्टर जॉन आप कुन्दन भाई से क्या कहेंगे?

मुझे इन दोनों प्रश्नों को एक-एक करके उत्तर देने दीजिए, क्योंकि पहला प्रश्न जो मैं सुनता हूँ, मेरे विचार से पवित्रशास्त्र से उसका उत्तर देना स्पष्ट और सरल है। दूसरा प्रश्न, इतना सरल नहीं है। सबसे पहले, कुन्दन कहते हैं: क्या ऐसी बाते हैं जिन्हें परमेश्वर ने हमें करने की आज्ञा दी है, किन्तु यदि परमेश्वर उन्हें करता है, तो ये पाप होंगे? और इसका उत्तर स्पष्ट रीति से है: हाँ। मैं ऐसी कई बातों के विषय में विचार कर सकता हूँ जिसे परमेश्वर हमें करने की आज्ञा देता है जो कि परमेश्वर के लिए करना पाप होगा। याकूब 5:16 में वह हमें एक दूसरे से अपने पापों को मानने के लिए आज्ञा देता है: “तुम परस्पर अपने पापों को मान लो और एक दूसरे के लिए प्रार्थना करो।” परमेश्वर के लिए अपने पापों को मानना पाप होगा, क्योंकि उसमें कोई पाप नहीं है, और यदि वह ऐसा करता है तो यह पाखण्ड होगा। 

दूसरा, ख्रीष्ट की देह के प्रत्येक अंग से कहा गया है कि हमें कभी भी एक दूसरे से यह नहीं कहना चाहिए, कि ख्रीष्ट की देह में “मुझे तेरी आवश्यकता नहीं” (1 कुरिन्थियों 12:21)। “मुझे तेरी आवश्यकता नहीं।” दूसरे शब्दों में, सभी मनुष्यों को आज्ञा दी जाती है और उनसे अपेक्षा की जाती है कि हम दूसरों पर अपनी निर्भरता को और दूसरों के लिए अपनी आवश्यकता को स्वीकार करें। परन्तु परमेश्वर के लिए यह पाप होगा कि वह एक क्षण के लिए स्वीकार करे कि वह अपने से बाहर किसी भी वस्तु पर निर्भर है।

प्रेरितों के काम 17:25 कहता है परमेश्वर की “न ही मनुष्यों के हाथों से उसकी सेवा-टहल होती है, मानो कि उसे किसी बात की आवश्यकता हो, क्योंकि वह स्वयं सब को जीवन, श्वास और सब कुछ प्रदान करता है।” या लगभग इसी बात को कहने के लिए, हमें नीतिवचन 3:5 में आज्ञा दी गई है, “अपनी समझ का सहारा न लेना।” परन्तु परमेश्वर के लिए यह पाप होगा यदि वह अपनी समझ पर निर्भर न रहे। यह इसलिए पाप होगा है क्योंकि वह अचूक है। और अपने असीम बुद्धि पर निर्भर होने में असफल हो जाना उसे मूर्ख बना देगा, और परमेश्वर मूर्ख नहीं है। “उसकी बुद्धि अगम है” (यशायाह 40:28)।

हमें अपने सृष्टिकर्ता की आराधना करने की आज्ञा दी गई है, और परमेश्वर का कोई सृष्टिकर्ता नहीं है, इसलिए उसके लिए अपने सृष्टिकर्ता की आराधना करने का प्रयास करना पाप होगा क्योंकि उसकी सृष्टि नहीं हुई है। और हमें रोमियों 12:19 में कहा गया है कि, “अपना बदला कभी न लेना, परन्तु परमेश्वर के कोप को जगह दो।” इसलिए, परमेश्वर के लिए बदला और न्याय के अपने विशेष अधिकार को त्यागना उसके लिए पाप होगा क्योंकि ये विशिष्ट रूप से उसके ही अधिकार हैं, न कि हमारे। और यह सूची और आगे बढ़ती जा सकती है। 

“सृष्टिकर्ता के स्थान पर एक सृजित प्राणी होना एक व्यक्ति को ऐसी उत्तरदायित्वों और अपेक्षाओं की स्थिति में रखता है जो सृष्टिकर्ता के पास नहीं है।”

इसलिए, सृष्टिकर्ता के स्थान पर एक सृजित प्राणी होना एक व्यक्ति को ऐसे उत्तरदायित्वों और अपेक्षाओं की स्थिति में रखता है जो सृष्टिकर्ता के पास नहीं है। तो इसलिए पहले प्रश्न का उत्तर है: हाँ। बाइबल में ऐसी बहुत सी बातें हैं जिन्हें करने के लिए हमें परमेश्वर द्वारा आज्ञा दी गई हैं किन्तु यदि परमेश्वर ने उन्हें किया तो वे पाप होंगे।

और इसके पश्चात कुन्दन भाई विशेष रूप से पूछते हैं: यीशु हमें अपने शत्रुओं से प्रेम करने के लिए कहता है। क्या परमेश्वर के लिए शैतान और पतित स्वर्गदूतों जैसे गैर-मानवीय शत्रुओं से प्रेम करना पाप होगा? या क्या वह उनसे प्रेम करता है? और वह यहाँ एक ऐसी दिशा में चला गया जहाँ मैंने उसके जाने की अपेक्षा नहीं की थी, और उसने इसे बहुत सरल बना दिया।

उसने जो पूछा है, मैं उसका उत्तर देने जा रहा हूँ, परन्तु मैं सोचता हूँ कि वह उससे भी कठिन प्रश्न पूछना चाहता है; अर्थात, न केवल गैर-मानवीय शत्रुओं से, परन्तु मानवीय शत्रुओं से भी। यह वास्तव में एक कठिन प्रश्न है। 

“यीशु हमसे कहता है कि हमें उसके शत्रुओं के प्रति उसके प्रेम के आधार पर अपने शत्रुओं के प्रति अपने प्रेम को ढालना चाहिए।”

बाइबल में इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि परमेश्वर शैतान या दुष्टआत्माओं से प्रेम करता है, और बाइबल में इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि हमें शैतान और उसके दुष्टआत्माओं से प्रेम करने की आज्ञा दी गई है। सभी आज्ञाएँ तो विपरीत दिशा में जाती हुई प्रतीत होती हैं। परमेश्वर और शैतान तथा हमारे और शैतान के बीच कठोर विरोध है। इसलिए मैं नहीं सोचता कि हमें कभी भी शैतान से प्रेम करने की आज्ञा दी गई है और परमेश्वर कभी भी शैतान से प्रेम करने का कोई भी प्रमाण नहीं देता है। शैतान तो सभी छुटकारे से परे है और इसलिए उसे उसके विद्रोह पर छोड़ दिया गया है।

परन्तु इससे भी कठिन प्रश्न यह है कि क्या परमेश्वर अपने मानवीय शत्रुओं से उसी प्रकार से प्रेम करता है जैसे वह हमें अपने मानवीय शत्रुओं से प्रेम करने की आज्ञा देता है। और एक स्तर पर इसका उत्तर है: हाँ, परन्तु प्रत्येक स्तर पर नहीं। वास्तव में, यीशु हमसे कहता है कि हमें उसके शत्रुओं के प्रति उसके प्रेम के आधार पर अपने शत्रुओं के प्रति अपने प्रेम को ढालना चाहिए। मत्ती 5:44-45, “मैं तुम से कहता हूँ, अपने शत्रुओं से प्रेम करो और जो तुम्हें सताते हैं, उनके लिए प्रार्थना करो जिस से कि तुम अपने स्वर्गीय पिता की सन्तान बन सको, क्योंकि वह अपना सूर्य भलों और बुरों दोनों पर उदय करता है।” दूसरे शब्दों में, वह अपने शत्रुओं से प्रेम करता है और धर्मी और अधर्मी दोनों पर वर्षा करता है। इसलिए, आप अपने शत्रुओं के साथ भी इसी प्रकार से व्यवहार कीजिए।

“बाइबल में इस बात का प्रमाण नहीं है कि परमेश्वर शैतान से प्रेम करता है, और हमें उससे प्रेम करने की आज्ञा नहीं दी गई है।”

परन्तु एक भिन्नता है, है न? हम सीमित हैं और हम अपने शत्रुओं के हृदय की गहरी स्थिति को नहीं जानते हैं। हम उनके अविश्वास और उनके हृदय की कठोरता के अन्तिम पथ को नहीं जानते हैं। 

हमारी सीमाओं को देखते हुए, हमारे लिए सर्वदा उचित होता है कि हम उनकी मृत्यु तक उनके अस्थायी तथा अनन्त भलाई के लिए प्रार्थना करें और कार्य करें। परन्तु परमेश्वर तो हमारे शत्रुओं के हृदय की गहराईयों को जानता है। वह उनके अविश्वास और उनकी कठोरता के अन्तिम पथ को जानता है। वह जानता है कि क्या वह उनके जीवनों में सर्वसामर्थी, बचाने वाला प्रभाव डालेगा कि नहीं।

इसलिए, वह हमसे हमारी अज्ञानता और सीमितता में जो अपेक्षा करता है, वह वही बात नहीं है जिसे वह अपने असीमित बुद्धि और ज्ञान तथा सामर्थ्य में करता है। वह हमसे अपेक्षा करता है कि हम उनकी मृत्यु तक उनके उद्धार के लिए प्रार्थना करें और उनके उद्धार के लिए कार्य करें। परन्तु वह सर्वदा उस उद्धार को प्रदान नहीं करता है (प्रेरितों के काम 13:48; इफिसियों 2:5; 2 तीमुथियुस 2:25-26)।

“हमारी अज्ञानता में परमेश्वर हमसे जो अपेक्षा करता है, वह वही बात नहीं है जो वह अपने असीमित ज्ञान और सामर्थ्य में प्रयोग करता है।”

इसलिए, मैं सोचता हूँ कि कुन्दन के दूसरे प्रश्न का उत्तर है: पहला, न तो परमेश्वर और न ही परमेश्वर के लोगों से शैतान से प्रेम करने की अपेक्षा की जाती है। और, दूसरा, परमेश्वर और उसके लोग दोनों अपने मानवीय शत्रुओं से प्रेम करते हैं, परन्तु एक ही प्रकार से नहीं, क्योंकि परमेश्वर सर्व-बुद्धिमान और सर्व-शासक है, और हम अपनी समझ और बुद्धि में सीमित और बहुत संकुचित हैं।

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