भविष्य के लिए विश्वास 
जॉन पाइपर द्वारा भक्तिमय अध्ययन

जॉन पाइपर द्वारा भक्तिमय अध्ययन

संस्थापक और शिक्षक, desiringGod.org

क्योंकि परमेश्वर की जितनी भी प्रतिज्ञाएँ हैं यीशु में ‘हाँ’ ही ‘हाँ’ हैं। (2 कुरिन्थियों 1:20)

यदि “परमेश्वर की सभी प्रतिज्ञाएँ यीशु में ‘हाँ’ ही ‘हाँ’ हैं,” तो वर्तमान में उस पर भरोसा करने का अर्थ है यह विश्वास करना कि उसकी प्रतिज्ञाएँ सत्य होंगी।

उस पर भरोसा करना और उसकी प्रतिज्ञाओं पर विश्वास करना — ये कोई दो प्रकार के विश्वास नहीं हैं। यीशु पर भरोसा करने — अर्थात् उद्धार के लिए यीशु पर विश्वास करने — का अर्थ है यह विश्वास करना कि वह अपना वचन पूरा करता है। क्रूसित तथा जी उठे यीशु में सन्तुष्ट होने में यह विश्वास भी सम्मिलित है कि भविष्य के प्रत्येक क्षण तथा अनन्तकाल तक, कुछ भी हमें उसके प्रेम से अलग नहीं कर सकता है अथवा सब बातों के द्वारा हमारे लिए भलाई को उत्पन्न करने से उसे रोक नहीं सकता है। और अनन्तः यह “भलाई” ख्रीष्ट में परमेश्वर के महत्व और सुन्दरता को निहारना और उसका रसास्वादन करना है जो कि हमारी उत्तम धरोहर है।

यह भरोसा कि पूर्ण सन्तुष्टि प्रदान करने वाली भलाई हमारे लिए सदाकाल के लिए होगी, यह भूतकाल के महिमामय अनुग्रह पर आधारित है और विशेषकर इस अनुग्रह पर कि परमेश्वर ने अपने पुत्र को भी नहीं छोड़ा परन्तु उसे हम सब के लिए दे दिया (रोमियों 8:32)।

अब हमें परमेश्वर की पिछली सभी उपलब्धियों में —  विशेषकर हमारे पापों के लिए ख्रीष्ट की मृत्यु तथा पुनरुत्थान — एवं उसकी समस्त प्रतिज्ञाओं में उसकी आत्मिक सुन्दरता का स्वाद चखने की आवश्यकता है। इस अतीत-के-अनुग्रह में निहित हमारा विश्वास और भरोसा उस सब पर दृढ़ होता है जो अगले क्षण में, और अगले महीने में, और कभी न अन्त होने वाले अनन्त काल में परमेश्वर स्वयं हमारे लिए होगा।

केवल वही है जो भविष्य में हमारे प्राणों को सन्तुष्ट करेगा। और हमें इस भविष्य के विषय में पूर्णतः निश्चित होना होगा यदि हमें वह क्रान्तिकारी ख्रीष्टीय जीवन अभी और यहीं जीना है जिसके लिए ख्रीष्ट हमें बुलाता है।

यदि ख्रीष्ट में हमारे वर्तमान के आनन्द में — अर्थात् हमारे वर्तमान के विश्वास में — परमेश्वर की सभी प्रतिज्ञाओं के लिए “हाँ” नहीं है, तो यह उस शक्ति में क्रान्तिकारी सेवा के लिए प्रदत्त सामर्थ्य को नहीं अपना पाएगा जिसे परमेश्वर (भविष्य के हर क्षण में) प्रदान करेगा (1 पतरस 4:11)।

मेरी प्रार्थना है कि भविष्य-के-अनुग्रह पर विश्वास की प्रकृति पर इस रीति से विचार करने से हमें परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर विश्वास करने के विषय में उथली, अतिसरलीकृत भाषा से बचने में सहायता मिलेगी। यह एक गहरी और अद्भुत बात है।