हमें पश्चाताप क्यों करना चाहिए?

यद्यपि यीशु ख्रीष्ट ने हमारे पापों को क्षमा कर दिया है, हम धर्मी ठहरा दिए गए हैं, हम उसके राज्य के उत्तराधिकारी हो गए हैं, और स्वर्ग की ओर अग्रसर हैं, तो कई बार हमारे सामने यह प्रश्न आता है कि क्यों हमें ख्रीष्टीय जीवन में पश्चाताप करने की आवश्यकता है?

आईये हम तीन कारणों पर ध्यान दें, जो हमारी सहायता करते हैं कि एक ख्रीष्टीय होने के पश्चात भी हमें क्यों पश्चाताप करने की आवश्यकता है:

क्योंकि हम पाप के प्रभाव में हैं 
यीशु ख्रीष्ट में विश्वास करने का तात्पर्य यह नहीं है कि अब हमारे जीवन में कभी पाप से संघर्ष नहीं होगा। परन्तु ख्रीष्टीय होने का तात्पर्य यह है कि आपके समस्त पाप के दण्ड क्षमा कर दिए गए हैं। अब आप पाप के दोष, पाप के दण्ड के अधीन नहीं हैं। परन्तु, फिर भी पापमय संसार में रहने के कारण आप पाप के प्रभाव में हैं, आप पाप की उपस्थिति में हैं। इसलिए हम ख्रीष्टीय लोगों के जीवन में पाप से संघर्ष निरन्तर चलता रहेगा। और यही कारण है कि हमें दैनिक जीवन में पाप से संघर्ष करते हुए पश्चाताप करने की आवश्यकता है।

बाइबल का परमेश्वर हमारे मन के प्रत्येक विचार, हृदय की अभिलाषा, प्रत्येक गुप्त बात, तथा हमारी प्रत्येक गतिविधि को जानता है।

कई बार हम ख्रीष्टीय यह सोचते हैं कि परमेश्वर ने यीशु ख्रीष्ट में उनके समस्त पापों को एक ही बार में क्षमा कर दिया है, इसलिए उन्हें पश्चातापी जीवन जीने की आवश्यकता नहीं है। कुछ लोग यह भी सोचते हैं कि अब वे शुद्ध व पवित्र हो गए हैं, उनमें पाप नहीं है। ऐसे सोच-विचार, स्थिति से हमें सतर्क रहने की आवश्यकता है क्योंकि बाइबल हमारे विषय में इसके विपरीत बताती है “यदि हम कहें कि हम में पाप नहीं, तो अपने आपको धोखा देते हैं और हम में सत्य नहीं है” (1 यूहन्ना 1:8)। यहाँ यह समझने की आवश्यकता है कि हमारा पाप के प्रभाव और पाप की उपस्थिति से पूर्णता छुटकारा अभी तक नहीं हुआ है। हम केवल पाप के दण्ड से छुड़ाये गए हैं। जब तक हम पाप से प्रभावित इस पतित संसार में हैं, हम पाप से संघर्ष करते हुए गिरेंगे और उठेंगे।

इसलिए हमें अपने दैनिक जीवन में पाप के प्रति संवेदनशील रहते हुए पश्चाताप करने के लिए सजग रहना चाहिए। हम पवित्र आत्मा के द्वारा, परमेश्वर के वचन के सामर्थ्य से पाप पर विजय प्राप्त करते जाएंगे, और ख्रीष्ट के स्वरूप में अंश-अंश करके बदलते जाएंगे। सबसे अद्भुत बात हम ख्रीष्टियों के लिए यह है कि यद्यपि हम पाप के प्रभाव में इस संसार में हैं, फिर भी हम एक दिन पाप की उपस्थिति और प्रभाव से छूट जाएंगे और अनन्त काल तक परमेश्वर की उपस्थिति में वास करेंगे।  

व्यक्तिगत पवित्रता के लिए
पवित्रीकरण द्विमुखी प्रक्रिया है। परमेश्वर अपने अनुग्रह में होकर पवित्रआत्मा की सहायाता से दिन-प्रतिदिन पवित्र करता है। परन्तु इसके साथ साथ हम ख्रीष्टीय लोगों का एक महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व यह है कि परमेश्वर के अनुग्रह के द्वारा हम अपने प्रयत्न से दिन-प्रतिदिन पवित्रता में अग्रसर होते जाएं। पवित्रता में अग्रसर होना प्रतिदिन के जीवन में अपने पापों से पश्चाताप करने के द्वारा होता है। बाइबल का परमेश्वर हमारे मन के प्रत्येक विचार, हृदय की अभिलाषा, प्रत्येक गुप्त बात, तथा हमारी प्रत्येक गतिविधि को जानता है, क्योंकि वह हमारे हृदय को जांचने और परखने वाला परमेश्वर है। उससे बचकर हम कहीं नहीं जा सकते और कुछ भी उससे छिपा हुआ नहीं है। इसलिए मैं आपसे अनुरोध करेंगे कि प्रतिदिन अपने हृदय, विचार तथा अपने कार्यों को जाँचे और परखे और परमेश्वर से अपने पापों का अंगीकार करते हुए अपने पापों का पश्चाताप करें। “यदि हम अपने पापों को मान लें तो वह हमारे पापों को क्षमा करने और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है”(1 यूहन्ना 1:9)।

हम एक दिन पाप की उपस्थिति और प्रभाव से छूट जाएंगे और अनन्त काल तक परमेश्वर की उपस्थिति में वास करेंगे।  

परमेश्वर के साथ सहभागिता बनाए रखने के लिए  
हम ख्रीष्टीय लोग ज्योति की सन्तान हैं और हमारी सहभागिता परमेश्वर के साथ है। इसलिए हम अन्धकार के सन्तान के सदृश जीवन नहीं जी सकते हैं। हम अपने पुराने जीवन, अन्धकार के कार्य, पापमय जीवन शैली में लगे नहीं रह सकते हैं। हम उसके निकट संगति में तभी बने रह सकते हैं जब हम नियमित रीति से अपने पापों से पश्चाताप करें। विश्वासी जीवन में पश्चाताप का जीवन परिवर्तित जीवन का प्रकटीकरण है। इसलिए जब विश्वासी पाप में गिरते हैं, तो उसमें पड़े ही नहीं रहते परन्तु पाप के प्रति शोकित होते हैं, और परमेश्वर से अनुग्रह की मांग करते हैं। पश्चाताप के विषय में राजा दाऊद का जीवन हमारे लिए अच्छा उदाहरण है। जब वह पाप में होता है, तो वह परमेश्वर के सम्मुख अपने अपराधों को मानता और विनती करता है कि वह अपनी करूणा के अनुसार उस पर अनुग्रह करे, अपनी बड़ी दया के अनुसार उसके अपराधों को मिटा दे और उसे उसके पापों से शुद्ध करे (भजन 51:1,2,3)।

परमेश्वर हमें शुद्ध करता है और पुनर्स्थापित करता है। इसलिए आइये, हम टूटे हृदय के साथ अपने समस्त पापों का अंगीकार करें, और पश्चाताप करें: हमारे पाप “चाहे लाल रंग के हों, तौभी वे हिम के समान श्वेत हो जाएंगे; चाहे वे किरमिजी लाल ही क्यों न हों, वे ऊन के समान उजले हो जाएंगे” (यशायाह 1:18)।