कैसे विश्वास पश्चात्ताप की ओर ले जाता है?

हम… तुम्हें इस अभिप्राय से सुसमाचार सुनाते हैं कि तुम इन व्यर्थ वस्तुओं को छोड़कर जीवित परमेश्वर की ओर फिरो जिसने स्वर्ग, पृथ्वी और समुद्र तथा जो कुछ उसमें है, सब को बनाया “(प्रेरितों के काम 14:15)

माइकल लॉरेन्स अपनी पुस्तक कन्वर्जन में लिखते हैं कि “वह व्यक्ति ख्रीष्टीय (मसीही) नहीं है जो प्रार्थना करता है और भला बनने के लिए कठिन प्रयास करता है। इसके विपरीत ख्रीष्टीय वह व्यक्ति है  जिसका हृदय परमेश्वर के अनुग्रह द्वारा बदला गया हो, जो पश्चात्ताप और विश्वास के द्वारा चिह्नित किया जाता हो तथा जिसकी इच्छा और अधिक परमेश्वर को जानने तथा उसके साथ होने की हो”। यदि आप स्वयं को ख्रीष्टीय व्यक्ति समझते हैं तो अपने विषय में सोचिए कि क्या आप वास्तव में विश्वास और पश्चाताप के सच्चे अनुभव में से होकर गये हैं। और यदि आप विश्वास और पश्चात्ताप के सच्चे अर्थ को नहीं जानते हैं तो मेरी प्रार्थना है कि यह लेख इसे समझने में आपकी सहायता करे।

इससे पहले कि मैं आपसे कहूँ कि ख्रीष्टीय बनने के लिए, आपको विश्वास और पश्चाताप करना अनिवार्य है (जो कि है)। मैं आपको स्पष्ट रीति से अवगत कराना चाहता हूं बिना परमेश्वर पवित्र आत्मा की सहायता के आप उद्धार प्रदान करने वाला पश्चात्ताप और विश्वास नहीं कर पाएंगे। संसार में बहुत से लोग त्रुटि करके पश्चात्ताप करते हैं। वे पुनः वही त्रुटि न दोहराने के लिए प्रयत्न करते हैं। और ऐसा पश्चात्ताप उन्हें बुरी आदतों को छोड़ने में उनकी सहायता कर सकता है, किन्तु यह उन्हें उद्धार प्रदान नहीं कर सकता है। तो फिर परमेश्वर के वचन के अनुसार सच्चा पश्चात्ताप किसे कहते हैं और कैसे यह बचाने वाले विश्वास की ओर ले जाता है?

पश्चात्ताप का अर्थ है मुड़ना या लौट आना जिसे हृदय परिवर्तन भी कहा जाता है। “हृदय परिवर्तन शब्द का अर्थ मुड़ना—यहाँ पर यह आत्मिक रीति से मुड़ने का प्रतिनिधित्व करता है अर्थात पापों से ख्रीष्ट की ओर मुड़ना। पापों से मुड़ने को पश्चात्ताप कहते हैं और ख्रीष्ट की ओर मुड़ने को विश्वास कहते हैं”।[1] विश्वास और पश्चात्ताप एक प्रकार से एक ही सिक्के के दो पहलू के समान हैं। उद्धार के कार्य में जब किसी का परिवर्तन होता है तो ये दोनों कार्य एक साथ होते हैं। ऐसा नहीं हो सकता है कि कोई व्यक्ति केवल अपने पापों से पश्चात्ताप करे और बिना यीशु ख्रीष्ट पर विश्वास किए बच जाए। क्योंकि कोई भी व्यक्ति अपने पुराने मनुष्यत्व से, संसार और शरीर की अभिलाषाओं तथा झूठे ईश्वरों से मुड़कर नये जन्म के मार्ग पर स्वतः नहीं चल सकता है। जब तक कि उसे अन्दर शुद्ध न किया जाए और उसे नया हृदय तथा नई आत्मा न मिले (यहेजकेल 36:25-27)।

किन्तु कोई भी व्यक्ति अपने आप को पूर्ण पवित्र, धर्मी नहीं बना सकता है क्योंकि हम सब पापी हैं (भजन 14:2-3)। और नहीं वह अपने पापी हृदय को बदल सकता है। यह कार्य केवल पापों से पश्चात्ताप तथा यीशु ख्रीष्ट पर विश्वास करके द्वारा ही हो सकता है। यीशु ख्रीष्ट पर विश्वास तथा पापों से पश्चात्ताप केवल सुसमाचार के द्वारा होता है। क्योंकि जब कोई व्यक्ति सुसमाचार सुनता है (जो कि मसीह के वचन से होता है) और अपने मुख से यीशु को प्रभु जानकर अंगीकार करता है तभी उसका उद्धार होता है (रोमियों 10:9-17)।

जब व्यक्ति अपने पापों से पश्चात्ताप करके उसने मुड़ता है तो वह अपने आपको पूर्ण रीति से यीशु के अधीन कर देता है। अब वह स्वयं अपने हृदय के सिंहासन पर नहीं बैठा रहता है परन्तु अब उसके जीवन का स्वामी यीशु बन जाता है। जैसे आग या पानी में मर रहा असहाय व्यक्ति अपने आप को बचावकर्मी के अधीन कर देता है वैसे ही अब एक ख्रीष्टीय अनन्त मृत्यु से बचने के लिये स्वयं को यीशु के अधीन कर देता है। अब स्वयं अपने जीवन को नियन्त्रित नहीं करता है किन्तु यीशु पर विश्वास करते हुए अपने जीवन का नियन्त्रण उसके हाथों में सौंप देता है। क्योंकि अब वह समझ गया है कि बचाने वाला विश्वास यीशु पर पूर्ण निर्भरता रखना है।

अन्त में मेरा आपसे प्रश्न है कि क्या आपने इस प्रकार का पश्चात्ताप किया है जो पापों के प्रति सच्चा शोक उत्पन्न करता है? और यदि आपने ऐसे पश्चात्ताप का अनुभव किया है तो क्या यीशु आप अपने उद्धार के लिए मात्र यीशु विश्वास करते हैं? ऐसा विश्वास हमें अपनी कार्य क्षमता, तथाकथित ईश्वरों या भौतिक संसाधनों पर नहीं, किन्तु सुसमाचार की प्रतिज्ञाओं पर निर्भर होना सिखाता है। यह हमारी सहायता करता है कि हम यीशु को उद्धारकर्ता और प्रभु के रूप में स्वीकार करते हुए उसकी आज्ञाओं का पालन करें। और यदि आपने अभी तक अपने पापों से पश्चात्ताप नहीं किया तो मेरा आपने निवेदन है कि परमेश्वर से पश्चात्ताप करने तथा यीशु पर विश्वास करने की सामर्थ्य मांगिए। अपने आने वाले अनन्तकाल को यीशु में सुरक्षित कीजिए।


[1] Wayne Grudem. (2018). Systematic Theology. Secundrabad: GS books. page 709