अनुग्रह जो नकारा गया और दिया भी गया
<a href="" >जॉन पाइपर द्वारा भक्तिमय अध्ययन</a>

संस्थापक और शिक्षक, desiringGod.org

हमें बड़े क्लेश उठा कर परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना है। (प्रेरितों के काम 14:22)

आन्तरिक सामर्थ्य की आवश्यकता न केवल प्रतिदिन के तनाव के कारण उत्पन्न होती है, परन्तु समय-समय पर आने वाले कष्टों और पीड़ाओं से भी उत्पन्न होती है। और वे अवश्य ही आती हैं। 

स्वर्ग के मार्ग पर पीड़ा को स्वतः ही हृदय की शिथिलता में जोड़ दिया जाता है। जब पीड़ा आती है, तो हृदय डगमगा सकता है और जीवन की ओर ले जाने वाला सकरा मार्ग असम्भव रूप से कठिन प्रतीत हो सकता है। सकरा मार्ग और सीधी ढाल वाली पहाड़ियों का होना तो अत्यधिक कठिन है ही जो पुरानी टूटी-फूटी कार की क्षमता को एक सीमा तक परखते हैं, परन्तु तब हम क्या करेंगे जब कार चलना ही बन्द हो जाए? 

पौलुस ने अपने जीवन के कष्टों के कारण तीन बार इसी प्रश्न को रोते हुए पुकारा। उसने अपनी देह में चुभाए गए काँटे के कारण सहायता माँगी। परन्तु परमेश्वर का अनुग्रह वैसे नहीं आया जैसे उसने पाने के लिए विनती की थी। यह दूसरे ही रूप में आया। ख्रीष्ट ने उत्तर दिया, “मेरा अनुग्रह तेरे लिए पर्याप्त है, क्योंकि मेरा सामर्थ्य निर्बलता में सिद्ध होता है” (2 कुरिन्थियों 12:9)। 

यहाँ हम देखते हैं कि घोर क्लेश में ख्रीष्ट की बनाए रखने वाली सामर्थ्य के द्वारा अनुग्रह प्रदान किया गया है — हम कह सकते हैं, एक अनुग्रह तो दिया गया है परन्तु वह दूसरे अनुग्रह के घेरे के अन्तर्गत अस्वीकार कर दिया गया है। और पौलुस ने भविष्य में होने वाले अनुग्रह की पर्याप्तता में विश्वास के साथ उत्तर दिया: “अतः मैं सहर्ष अपनी निर्बलताओं पर घमण्ड करूँगा, जिससे कि ख्रीष्ट की सामर्थ्य मुझ में निवास करे” (2 कुरिन्थियों 12:9)।

परमेश्वर प्रायः हमें “नकारे गए अनुग्रह” के घेरे में एक “दिए गए अनुग्रह” के साथ आशीषित करता है। 

उदाहरण के लिए, जुलाई महीने में एक भयंकर गर्मी के दिन, हमारी कार के पानी के पम्प ने कार्य करना बन्द कर दिया और किसी भी नगर से बीस मील दूर हम टेनेसी (जो कि एक नगर का नाम है) की एक सड़क पर फँसे हुए थे। 

मैंने उसी सुबह प्रार्थना भी किया था कि कार अच्छी रीति से कार्य करे और हम सुरक्षित अपने गन्तव्य तक पहुँच सकें। परन्तु अब कार खराब हो चुकी थी। संकट-मुक्त यात्रा करने का अनुग्रह नकारा गया था। वहाँ पर जब हम अपनी कार के पास खड़े हुए थे हमारी सहायता करने के लिए कोई भी नहीं रुक रहा था। तब मेरे पुत्र अब्राहम (जो उस समय लगभग 11 वर्ष का था) ने कहा, “पिता जी, हमें प्रार्थना करना चाहिए।” अतः हमने अपने सिरों को झुका कर भविष्य में होने वाले अनुग्रह के लिए विनती की — अर्थात् आवश्यकता के समय में सहायता की माँग। जब हमने प्रार्थना समाप्त करके अपना सिर ऊपर किया तो देखा कि एक ट्रक चालक ने हमारे लिए अपने ट्रक को मार्ग के किनारे रोका।

वह चालक एक मिस्त्री था जो लगभग बीस मील दूर कार्य करता था। उसने कहा कि वह कार में लगने वाले सामान को लाकर के उसे ठीक करने हेतु सहायता करने के लिए तैयार है। मैं उसके साथ नगर तक गया और मुझे उसे सुसमाचार बताने का अवसर मिला। हम लगभग पाँच घण्टे पश्चात् अपने मार्ग में वापस चल पड़े।

अब हमारी प्रार्थना के उस उत्तर के विषय में अदभुत बात यह है कि वह एक नकारी गयी प्रार्थना के घेरे में आता है। हमने संकट-मुक्त यात्रा की माँग की थी। परन्तु परमेश्वर ने हमें समस्या दी। परन्तु अनुग्रह के नकारे जाने के मध्य में, हमें अनुग्रह प्रदान भी किया गया। और मैं परमेश्वर की बुद्धि पर भरोसा करना सीख रहा हूँ जो मुझे मेरे लिए सर्वोतम अनुग्रह देता है तथा उन अविश्वासी मिस्त्रियों के लिए तथा विश्वास में बढ़ते हुए ग्यारह वर्षीय बालकों के लिए। 

हमें आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए कि परमेश्वर हमें उन दुखों के मध्य अद्भुत अनुग्रह प्रदान करता है जिन दुखों से बचने के लिए हमने विनती की थी। वह अच्छी रीति से जानता है कि उसे अपने अनुग्रह को हमारी भलाई और अपनी महिमा के लिए कैसे बाँटना है। 

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