बच्चों को सुसमाचार कैसे सिखाएं?

“तू उनको यत्नपूर्वक अपने बाल-बच्चों को सिखाना, तथा अपने घर में बैठे, मार्ग पर चलते, और लेटते तथा उठते समय उनकी चर्चा किया करना ”(व्यवस्थाविवरण 6:7)।

परमेश्वर का वचन हमें सिखाता है कि हम अपने बच्चों की आत्मिक चिन्ता करते हुए उनको परमेश्वर के विषय में बताएं। अनेकों ईश्वरभक्त ख्रीष्टीय लोग अपने बच्चों को परमेश्वर के विषय में बताते हैं। किन्तु कुछ माता-पिता अपने बच्चों को सुसमाचार सिखाने में असफल रहते हैं। हो सकता है वे अपने कार्य या व्यवसाय में अत्यधिक व्यस्त हों, या वे सोचते होंगे कि कलीसिया में बच्चे अपने आप सीख लेंगे। कुछ लोग सोच सकते हैं कि उन्हें सुसमाचार का पर्याप्त ज्ञान नहीं है। बच्चों को सुसमाचार न सिखा पाने के हमारे पास अनेक कारण हो सकते हैं, किन्तु न्याय के दिन परमेश्वर के सम्मुख कोई कारण मान्य नहीं होगा। अतः बच्चों को सुसमाचार सिखाने का हमारा प्राथमिक उत्तरदायित्व है। यह लेख हमारी सहायता करेगा कि हम बच्चों के साथ सुसमाचार क्यों, कब और कैसे बांटें।

बच्चों की आत्मिक आवश्यकता को ध्यान रखें
सर्वप्रथम हमें इस बात को गम्भीरता से लेना चाहिए कि हमारे बच्चे हमारे ही समान पापी हैं तथा उन्हें भी उद्धार की आवश्यकता है (भजन 51:5)। और उनका उद्धार केवल सुसमाचार पर विश्वास करने से ही हो सकता है। इसलिए उनके साथ ख्रीष्ट का वचन बांटना आवश्यक है (रोमियों 10:17)। और जब बच्चे यीशु ख्रीष्ट को उद्धारकर्ता के रूप में ग्रहण करके उसके पीछे चलेंगे तो उनमें सुसमाचारीय दृष्टिकोण उत्पन्न होगा। और ऐसा दृष्टिकोण पाप को नकारने तथा सुसमाचार केन्द्रित जीवन जीने में उनकी सहायता करेगा। किन्तु प्रश्न यह है कि हम अपने बच्चों को सुसमाचार कैसे सिखाएं?

बिना यीशु के वे परमेश्वर से दूर सदा के लिए नरक में दण्ड उठाएंगे।

बच्चों के सामने आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करें
बच्चों को सुसमाचार सिखाते समय हमें ध्यान रखना चाहिए कि वे सबसे अधिक अपने माता-पिता या परिवार से सीखते हैं। वे अपना समय परिवार के सदस्यों के साथ बिताते हैं। इसलिए हमें उनके सामने अपने जीवन से एक आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करना अनिवार्य है। बच्चे, हमारे वचन अध्ययन, प्रार्थना और सुसमाचार केन्द्रित जीवन से सीखेंगे। इसके साथ ही यह हमें परमेश्वर के वचन को ठीक रीति से समझने और आत्मिक ज्ञान में बढ़ने में सहायता करेगा। ऐसा करके हम बच्चों के लिए उत्तम साक्षी छोड़ते हुए उसके साथ सुसमाचार बांटने के लिए स्वयं को तैयार करेंगे।

प्रत्येक समय और परिस्थिति को बहुमूल्य जानें
जिस प्रकार बच्चे एक दिन में शारीरिक रूप से बड़े नहीं हो जाते हैं वैसे ही वे एक दिन में आत्मिक रूप से भी परिपक्व नहीं होंगे। हमें उनके साथ नियमित रीति सुसमाचार बांटते रहना है। जीवन में आने वाली प्रत्येक परिस्थिति में उन्हें सुसमाचार दें अर्थात किसी भी क्षण को व्यर्थ न जाने दें। चाहे हमारे जीवन में आनन्द और भरपूरी का समय हो या फिर क्लेश, निर्धनता, बीमारी का समय हो। अपनी स्थित के अनुसार उन्हें बताइए कि बाइबल में ईश्वरभक्त लोगों ने कैसे सुख और दुःख के समय में जीवन जीया। इसके लिए आपको किसी परिस्थिति या विशेष समय की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। हम प्रत्येक परिस्थिति में उन्हें यत्नपूर्वक सिखा सकते हैं। चाहे हम अपने घर में हों, मार्ग में हों, सोने जा रहे हों, खेलने जा रहे हों, हर समय हमें सुसमाचार की चर्चा करना है (व्यवस्थाविवरण 6:7)।

बच्चे परमेश्वर की ओर से प्राप्त आशीष और उपहार हैं, इसलिए माता-पिता का उत्तरदायित्व है कि अपने बच्चों की आत्मिक चिन्ता करते हुए सुसमाचार को सुनाएं और उनके उद्धार के लिए परमेश्वर से निरन्तर प्रार्थना करते रहें।

बच्चों में सुसमचार जानने की रुचि उत्पन्न करें
बच्चों को सुसमाचार सुनाने के लिए हमें किसी विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं है। उन्हें विभिन्न पहलुओं से दिखाएं कि वे पापी हैं तथा उन्हें पाप के दण्ड नरक से बचने के लिए उद्धारकर्ता यीशु ख्रीष्ट की आवश्यकता है। बिना यीशु के वे परमेश्वर से दूर सदा के लिए नरक में दण्ड उठाएंगे। यह सुसमाचार उन्हें सरलता से सुनाएं। यदि आप इसे कठिन बनाएंगे तो सम्भवतः वे ऊबकर सुनना नहीं चाहेंगे। इसलिए बच्चों की उम्र के अनुसार उनसे बातें करें। यद्यपि वे कठिन बातों को समझ सकते हैं फिर भी वार्तालाप को रुचिकर बनाएं। उन्हें कहानियाँ सुनाएं, उनके साथ बाइबल की कहानियों को पढ़ें, बाइबल पर आधारित चलचित्र देखें और बहुत लम्बी वार्ता न करें जब तक कि वे स्वयं रुचि न ले रहे हों। उनके हृदय को भेदने वाले प्रश्नों को पूछें, उनके साथ ईश्वरभक्त लोगों की जीवनी पढ़ें। और मुख्य रूप से अपने जीवन के बारे में बताएं कि परमेश्वर आपके साथ कैसे विश्वासयोग्य रहा है।

उनके उद्धार के लिए प्रभु पर निर्भर रहें
अंत में, इस बात का ध्यान रखें कि आप अपने बच्चे का हृदय नहीं बदल सकते हैं। परमेश्वर अपने समय पर पवित्र आत्मा के द्वारा उन्हें नया जन्म प्रदान करेगा। इसलिए उनसे तुरन्त प्रतिउत्तर पाने की आशा न रखें, किन्तु प्रभु पर निर्भर रहकर उनके लिए नियमित प्रार्थना करें। जिस प्रकार पेड़ लगाने के बाद हम तुरन्त फल की आशा नहीं रखते हैं, वैसे ही बच्चों में निवेश करते रहें प्रभु अपने समय पर फल देगा। 

अतः बच्चे परमेश्वर की ओर से प्राप्त आशीष और उपहार हैं, इसलिए माता-पिता का उत्तरदायित्व है कि अपने बच्चों की आत्मिक चिन्ता करते हुए सुसमाचार को सुनाएं और उनके उद्धार के लिए परमेश्वर से निरन्तर प्रार्थना करते रहें। जो लोग अभी माता-पिता नहीं बनें हैं वे लोग भी इस विषय पर मनन कर सकते हैं और अपने आपको तैयार कर सकते हैं अपने बच्चों को किस प्रकार आत्मिक शिक्षा देंगे और अपने जीवन के आदर्श उदाहरण को प्रस्तुत करेंगे। दोनों स्थिति में हमें अपने आपको तैयार करना है और प्रार्थना और परमेश्वर पर निर्भर रहते हुए अपने बच्चों के उद्धार की अभिलाषा करना चाहिए।