आलस्य पर कैसे विजय प्राप्त करें?

हमारी सृष्टि इसलिए हुई है कि हम कठिन परिश्रम करने के द्वारा परमेश्वर को आदर और महिमा दें। जब हम कार्य करते हैं तो हम अपने बनाये जाने के उद्देश्य को परमेश्वर के लिए पूरा करते हैं (उत्पत्ति 1:28; 2:15)। परन्तु वर्तमान समय में ख्रीष्टीय अपने प्रतिदिन के आत्मिक जीवन, व्यक्तिगत, पारिवारिक, कलीसियाई जीवन में आलस के शिकार होते जा रहे हैं। इस पर विजयी होने के लिए लोग भिन्न-भिन्न रणनीतियों को अपनाते हैं। किन्तु  आईये देखें कि एक बाइबलीय दृष्टिकोण से हम कैसे आलस पर विजयी हो सकते हैं।

यीशु ख्रीष्ट ने हमें अपने लहू से खरीदा है वह हमारे पापों को केवल क्षमा ही नहीं करता वरन वह हमको अपने जैसा बनाता है।

1. आलस्य के पाप को मानें और पश्चाताप करें- अपने आलस्य के कारण को पहचानना-(यह मानना कि आप इससे संघर्ष कर रहे हैं) बहुत आवश्यक है। यदि हम यह नहीं मानेंगे कि हम वास्तव में इस पाप के शिकार हैं तो हम इस पर विजय पाने के लिए कुछ भी प्रयास नहीं करेंगे। हम स्वयं का अवलोकन करें कि क्या हम किसी भी काम में देर करने या उसे  करने से बचने, बिना मन से करने या अपर्याप्त ढंग से करने में लगे रहते हैं? या जीवन में सक्रिय नहीं हैं और काम समय पर नहीं करते हैं। क्या हमारा स्वभाव काम से बचने के लिए बहाना ढूंढ़ना या फिर अपना काम दूसरों से करवाना है? यदि हमारे हाथ परिश्रम करने से इनकार करते हैं तो हम आलस्य के दास हैं (नीतिवचन 21:25)। यदि हम ऐसे स्वभाव में हैं तो हमें स्वयं को ईमानदारी से जांचते हुए परमेश्वर के सम्मुख पश्चाताप करने की आवश्यकता है। हम प्रभु के पास इस आश्वासन के साथ जा सकते हैं कि वह हमारे पापों को क्षमा करेगा। यदि हम इस आलस्य के पाप में होने के बाद भी कहें कि हम में आलस्य का पाप नहीं, तो वास्तव में हम स्वयं को धोखा देते हैं, लेकिन यदि हम अंगीकार करें कि हम आलस्य के पाप में हैं तो वह हमारे आलस्य के पाप को क्षमा करने और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है (1 यूहन्ना 1:8-9)।

2. प्रतिदिन स्वयं को सुसमाचार याद दिलाइये- सुसमाचार हमें मेहनती होने के लिए प्रेरित करता है। यीशु ख्रीष्ट ने हमें अपने लहू से खरीदा है वह हमारे पापों को केवल क्षमा ही नहीं करता वरन वह हमको अपने जैसा बनाता है। जब भी आलस्य करने का विचार हमारे सामने हो, जो ख्रीष्ट की तरफ देखें। उसने कभी भी परमेश्वर की आज्ञा पालन में ढ़िलाई नहीं की। उसने परमेश्वर से तथा दूसरों से प्रेम करने के अपने कार्य को मेहनत से पूरा किया। क्रूस की मृत्यु तक वह आज्ञाकारी रहा (फिलिप्पियों 2:8)। उसने सब कार्य पूरा किया ताकि हम भी उसके जैसा बनें। 2 कुरिन्थियों 3:17 हमें स्मरण दिलाता है कि जब हम प्रभु की महिमा को देखते हैं हम आत्मा द्वारा उसी तेजस्वी रूप में अंश-अंश करके बदलते जाते हैं। इस कारण यदि हम अपने कार्य में आलस्यी होते हैं तो यह हमारे हृदय से सम्बन्धित है, हम उस उद्धारकर्ता को भूल जाते हैं। यदि हम वास्तव में जानते हैं कि ख्रीष्ट कौन है, वास्तव में उसे देखते हैं, उसकी आराधना करते हैं तो हम और भी अधिक उसके जैसा बनेंगे। ख्रीष्ट के जैसा होना उसके जैसे परिश्रमी होना भी है। हमें सदैव यह ध्यान रखना चाहिए कि पवित्र आत्मा के सामर्थ्य पर भरोसा किए बिना हम कुछ भी नहीं कर सकते हैं (यूहन्ना 15: 5)। ख्रीष्टीय  जीवन में हमें प्रतिदिन पवित्र आत्मा की सहायता की आवश्यकता है। परमेश्वर के पास सामर्थ्य है कि वह हमें सब प्रकार के पापों पर हमें विजय प्रदान करे इसलिए उस पर निर्भर रहें।

परमेश्वर के पास सामर्थ्य है कि वह हमें सब प्रकार के पापों पर हमें विजय प्रदान करे इसलिए उस पर निर्भर रहें।

3. अपने जीवन के प्रत्येक कार्यों में विश्वासयोग्यता से कठिन परिश्रम करना आरम्भ करें- एक ख्रीष्टीय  होने के नाते हमारा उत्तरदायित्व है कि चाहे हम पढ़ाई करते हों, चाहे ऑफिस में काम करते हों, सेवकाई के क्षेत्र में, हमें जो भी कार्य मिलता है हम उसमें पूरा मन लगाकर मेहनत से करें। हमारी विश्वासयोग्यता छोटे-छोटे कार्यों में दिखती है। चाहे वह झाड़ू लगाने, चाय बनाने, बच्चों को पढ़ाने या किसी भी दी गई ज़िम्मेदारी को पूरा करने में हो। क्योंकि “जो अत्यन्त छोटी-सी बात में विश्वासयोग्य है, वह बहुत में भी विश्वासयोग्य है। और जो अत्यन्त छोटी बात में अधर्मी है, वह बहुत में भी अधर्मी है” (लूका 16:10)। हमें न केवल अपनी आवश्यकताओं तथा परिवार का भरण-पोषण करने के लिए वरन अपने पवित्रीकरण (1 तीमुथियुस 5: 8; 2 पतरस 1: 5–11; फिलिप्पियों 2: 12–13) में बढ़ने हेतु कठिन परिश्रम करने के लिए कहा गया है। विशेष रूप से, हम पवित्रशास्त्र के अध्ययन (2 तीमुथियुस 2:15), नियमित रूप से साथी विश्वासियों के साथ मिलकर (इब्रानियों 10:24-25) प्रार्थना के माध्यम से पवित्रीकरण में बढ़ते हैं। प्रतिदिन के जीवन में कार्य करना बहुत ही आवश्यक है। हमें आवश्यकता है कि हम व्यवहारिक रीति से अपने कार्यों को करने के लिए तत्पर रहें। अपने समय का सही उपयोग करें। कार्य करने के लिए आलसियों को नीतिवचन का लेखक यह चेतावनी देता है, “हे आलसी, चींटी के पास जा। उसके कार्यों को ध्यान से देख और बुद्धिमान बन।.. हे आलस्यी तू कब तक लेटा रहेगा? तू अपनी नींद से कब जागेगा?” (नीतिवचन 6:6-10)।

परमेश्वर ने हम पर अनुग्रह करके अपने पुत्र यीशु ख्रीष्ट के द्वारा हमारा उद्धार किया है कि हम भले कार्य करें।

4. प्रत्येक कार्य को प्रभु का समझ कर करें- ख्रीष्टीय जीवन निष्क्रिय बैठे रहने का जीवन नहीं है। परमेश्वर ने हम पर अनुग्रह करके अपने पुत्र यीशु ख्रीष्ट के द्वारा हमारा उद्धार किया है कि हम भले कार्य करें (इफिसियों 2:1-10)। इसलिए हम अपने क्षेत्र के प्रत्येक कार्य में प्रभु के लिए कार्य करने का प्रयास करेंगे। चाहे हम कोई भी कार्य करते हैं, उन सब में हमें स्मरण रखना है कि हम अपने कार्यों के द्वारा भी उसकी महिमा कर रहे हैं इसलिए हमारे हाथों को जो कुछ भी करने को मिले, सचमुच, उसे अपने शक्ति-भर करे’ (सभोपदेशक 9:10)। हम जो कुछ भी करते हैं उसमें उत्साह के साथ प्रभु की सेवा करने के लिए हमें कहा गया है (रोमियों 12:11; 1 कुरिन्थियों 10:31)। एक ख्रीष्टीय  के जीवन में आलस्य का कोई स्थान नहीं है। इसके साथ ही स्मरण रखें कि हम ख्रीष्ट में भले कार्य करने के लिए सृजे गए हैं (इफिसियों 2:8-10)। हमारा उद्धार कार्य से नहीं हुआ है तो हम यह न सोचें कि हमें कुछ करने की आवश्यकता नहीं है। हम भले काम करने के लिए सृजे गए हैं। इसलिए हम अपने उद्धार पाए जीवन एवं अपने विश्वास का प्रमाण कार्यों से प्रकट करते हैं (याकूब 2:18,26)।

ख्रीष्टीय जीवन में हमें एक-दूसरे विश्वासियों की आवश्यकता है ताकि हम उनकी सहायता से पापों से लड़ सकें।

5. अपने साथ में रहने वाले लोगों की सहायता लें – जब हम आलस्य के पाप से संघर्ष कर रहे हैं तो हमें आवश्यकता है कि हम जिन लोगों के साथ रह रहे हैं, उनके प्रति पारदर्शी हों। यह मानें कि हम आलस्य से संघर्ष कर रहे हैं और हमें उनकी आवश्यकता है कि वे हमारी सहायता करें। दूसरों के सामने हो सके उस समय हमारे लिए बहुत कठिन समय, बेइज्जती की बात हो किन्तु आने वाले समय के लिए अच्छा है। जब कोई हमें टोकता है, हमारी कमी के विषय में सलाह देता है तो हमें उसको मानना चाहिए। क्योंकि “मूर्ख की चाल अपनी दृष्टि में ठीक जान पड़ती है, परन्तु बुद्धिमान वही है जो सम्मति पर ध्यान देता है” (नीतिवचन 12:15)। इसलिए ख्रीष्टीय जीवन में हमें एक-दूसरे विश्वासियों की आवश्यकता है ताकि हम उनकी सहायता से पापों से लड़ सकें।

      अन्तत: हम परमेश्वर की सहायता से, उसके वचन से तथा अन्य भाई-बहन की सहायता, कठिन परिश्रम तथा प्रभु के लिए सब कार्य करने के द्वारा आलस्य पर विजयी हो सकते हैं। इसके लिए हमें निरन्तर प्रयासरत होना चाहिए और दूसरों को भी आलस्य से लड़ने में सहायता करनी चाहिए। हमें स्मरण रखना चाहिए कि हम प्रभु में कार्य करने के लिए बुलाए गए हैं। इसलिए आईये पौलुस के निर्देश के अनुसार कार्य करने के लिए प्रोत्साहित हों, “जो कुछ तुम करते हो, उस कार्य को मनुष्यों का नहीं वरन प्रभु का समझकर तन-मन से करो” (कुलुस्सियों 3:23)।

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