हमारे जीवन में दुख उद्देश्यपूर्ण हैं।

जब कभी हम दुखों, क्लेशों और सताव के मध्य से होकर जाते हैं, तब हम सोचते हैं कि संभवतः परमेश्वर हम से अप्रसन्न है, जिसके कारण हमें इन सब बातों का सामना करना पड़ रहा हो। जिसके कारण कई बार हम परमेश्वर पर कुड़कुड़ाना आरम्भ कर देते हैं और उसकी सारी भलाई, प्रेम, दया, और अनुग्रह को भूल जाते हैं। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि लोग सच्चे सुसमाचार को छोड़कर झूठे सुसमाचार की ओर जाने लगते हैं और कभी-कभी लोग यीशु ख्रीष्ट के पीछे नहीं चलना चाहते हैं। परन्तु ध्यान देने वाली बात यह है कि ये दुख हमारे जीवन में परमेश्वर इसलिए आने देता है कि हम यीशु ख्रीष्ट के स्वरूप और समानता में बढ़ें, न कि हम ख्रीष्ट यीशु से विमुख हो जाएं। 

इस लेख में हम तीन बातों को देखेंगे कि परमेश्वर हमें दुखों में होकर क्यों ले कर जाता है –

हमें नम्र करने के लिए

हमारे जीवन में यह बहुत सामान्य बात है, जब हमारे जीवन में सुख-चैन रहता है। तब हम अहंकारी बन सकते हैं। हमारा हृदय कठोर बन सकता है। कई बार हम विश्वास में शिथिल पड़ जाते हैं। और कई बार हम अपने समृद्धि के ऊपर भरोसा करने लगते हैं। तब घमण्ड से भर कर उस धनी मूर्ख की तरह सोचने लगते हैं कि “हे मेरे प्राण, तेरे पास बहुत वर्षों के लिए बहुत सी सम्पत्ति रखी है। चैन से, खा-पी और आनन्द मना” (लूका 12:19)।  जिसके कारण हम परमेश्वर के समीप बहुत कम आते हैं। इसलिए कई बार परमेश्वर सताव को हमारे जीवन में आने देता है। ताकि हम उसके समीप आए, उस पर भरोसा करें, उसके सम्मुख नम्र बने, और उसकी महिमा करें।

हमें संसार से दूर करने के लिए

जब हम अपने जीवन में परमेश्वर से अधिक इस संसार से और उसकी वस्तुओं से अधिक प्रेम करने लगते हैं, और वही हमारी प्राथमिकता बन जाती है। तब हम संसार की मानसिकता के साथ जीने हेतु  प्रेरित होने लगते हैं, और हम चाहते हैं कि यह जीवन जितना हो सके उतना आरामदायक, सुखद, सफल और आनन्ददायक हो। जब हम इस संसार के अनुसार जीने के लिए इच्छुक होते हैं, तब परमेश्वर के लिए हमारा प्रेम हमारे जीवन में ठण्डा पड़ने लगता है। इसीलिए वचन हमको सावधान करता है कि “संसार से प्रेम न करो, और न उन वस्तुओं से जो संसार में है। यदि कोई संसार से प्रेम करता है, तो उसमें पिता का प्रेम नहीं” (यूहन्ना 2:15)। इसलिए क्लेश, दुख, समस्या और संघर्ष हमको स्मरण दिलाता है, संसार से दूर करता है और इस बात से अवगत कराता है कि हम इस संसार के नहीं है, जहाँ हम अपने आराम ढूँढ रहे हैं। किन्तु सिद्ध राज्य आने वाला है, जहां हम वास्तव में विश्राम, सुख-चैन और सच्ची शांति प्राप्त होगी, क्योंकि वहाँ हम त्रिएक परमेश्वर की उपस्थिति में होंगे। इसलिए परमेश्वर की इच्छा अनुसार और उसको प्रसन्न करने वाला जीवन जीएं। 

विश्वास की परख के लिए 

कई बार परमेश्वर हमको शुद्ध करने के लिए, पवित्रता में बढ़ने के लिए, धीरज, संयम और सहनशीलता बढ़ाने के लिए हमें परखता है। इसलिए हमको परीक्षाओं, क्लेशों में, समस्याओं में परमेश्वर पर कुड़कुड़ाना नहीं है किन्तु जैसे पतरस विश्वासियों से कहता है कि विभिन्न परीक्षाओं में दुख सहना पड़ रहा है, तो इसे आनन्द की बात समझो… क्योंकि यह परखा जाकर यीशु मसीह के आगमन के लिए तैयार करता है (1 पतरस 1:6-7)। क्लेश हमको सिद्ध करता है, जिससे हम में किसी बात की कमी न हो (याकूब 1:4)। इसलिए जब भी क्लेशों का समाना करे, तो परमेश्वर पर कुड़कुड़ाने के स्थान पर हमें अपने जीवन का मूल्यांकन करना है कि परमेश्वर हमको क्या सिखाना चाहता है?   

यह सारी बाते हमको अनन्त: यीशु ख्रीष्ट के जैसे बनने में सहायता करती है, क्योंकि हमारा आदर्श यीशु ख्रीष्ट है। उसने हमसे कहीं अधिक दुख सहा है। इसलिए यदि हम उसके चेले हैं, तो केवल उस पर विश्वास ही न करे, किन्तु कष्ट भी उठाए (फिलि. 1:29)। स्मरण रखिए जब कष्टों का या दुखों का आप सामना करते हैं, तो ख्रीष्ट को स्मरण रखिए क्योंकि उसी में हमारा महान प्रतिफल मिलता है जो स्वर्ग रखा है।

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