एक ख्रीष्टीय का माता-पिता के प्रति व्यवहार

प्रत्येक ख्रीष्टीय जो यीशु पर विश्वास करता है उसे इस संसार में ख्रीष्ट को अपने जीवन से प्रदर्शित करना है। परमेश्वर का धन्यवाद हो कि परमेश्वर ने हमें आत्मिक आशीषों के साथ ही भौतिक आशीषें भी प्रदान की हैं। जिनमें माता-पिता हमारे जीवन में महत्वपूर्ण भाग हैं। एक ख्रीष्टीय होने के नाते हमें आवश्यक है कि हम अपने सब प्रकार के सम्बन्ध में ख्रीष्ट को प्रदर्शित करें। इसलिए चाहे हमारे माता-पिता साथ में रहते हों, या हम उनसे दूर रहते हों, चाहे हम अविवाहित हो या विवाहित हैं, आइये हम कुछ बातों पर विचार करें कि एक ख्रीष्टीय होने के नाते हमें अपने माता-पिता के लिए क्या करना चाहिए, या उनके साथ कैसा व्यवहार हमें करना चाहिए!

उनके लिए परमेश्वर की स्तुति करें: माता-पिता बच्चों के लिए उपहार हैं, जो परमेश्वर अपनी योजना में हमारे जीवन में देता है। अपने माता-पिता के लिए परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ हों। आपके माता-पिता इसलिए आपके माता-पिता नहीं हैं कि आपने उन्हें अपना माता-पिता माना है, वरन इस कारण से क्योंकि परमेश्वर ने आपको इस संसार में लाने के लिए उन्हें मुख्य रूप से चुना। हम उनके बच्चे यों ही नहीं हो गए वरन यह परमेश्वर की योजना का भाग है। परमेश्वर अपने अनुग्रह में हमारा पालन-पोषण एवं देख-रेख में उनको उपयोग करता है। इसलिए उनके जीवन के लिए परमेश्वर को सराहें, उसको धन्यवाद दें और माता-पिता के जीवन के लिए परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ हों!

उनके जीवन में निवेश करें: हममें से अधिकतर लोग अपने माता-पिता के साथ सम्बन्ध में अनेकों चुनौतियों का सामना करते हैं। किन्तु चाहे हमारा सम्बन्ध मधुर हो या चुनौतीपूर्ण हो, हमें आवश्यकता है कि हम उनके जीवन में भी निवेश करें। उनके आत्मिक जीवन की चिन्ता करें। उन्हें सुसमाचार बताएं और बार-बार स्मरण दिलाएं। उनकी आवश्यकताओं को अनदेखा मत करें। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि अपना सब कुछ माता-पिता पर लुटा दें वरन उनकी आवश्यकताओं का ध्यान रखें। आपके माता-पिता को सदैव आपका धन नहीं चाहिए। वे आपको चाहते हैं। यदि हमारा सम्बन्ध माता-पिता से ज्यादा दृढ़ नहीं है इसका यह अर्थ नहीं है कि यह कभी बदल नहीं सकता। जब हम ख्रीष्टीय जीवन में प्रभु से प्रेम करना सीखते हैं तो हम लोगों से प्रेम करने में भी परिपक्व बनते हैं। हमें आवश्यकता है कि कभी-कभी हम उनके साथ समय निकालने का अवसर ढ़ूँढ़ें। उनके जीवन के विषय में बात करें। उनके साथ प्रार्थना करें। यह वास्तव में धैर्य, समय और परिश्रम की माँग करता है, किन्तु यह सहायक है। उनके साथ सम्बन्ध रखने के प्रयास में हमारा धैर्य, नम्रता तथा वास्तविक बोझ माता-पिता पर प्रभाव डाल सकते हैं जो हम उनको जानने और प्रेम करने में करते हैं। 

यदि आप अपने माता-पिता से प्रेम करते हैं तो उन्हें सुसमाचार अवश्य ही बताएंगे।

उनको महत्व दें: मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि हम अपने जीवन में माता-पिता को परमेश्वर मान लें या परमेश्वर का स्थान उन्हें दें। वरन अपने जीवन में, हृदय में उनके लिए भी स्थान दें और उनके साथ सम्पर्क में रहें। उनके साथ समय व्यतीत करें। उनके साथ आनन्द मनाएं। उनके साथ अपने सम्बन्धों को सुधारें। उनसे बात करें, उनकी इच्छाओं को जानने का प्रयास करें, उनके हृदय की बातों को सुनें। यह सम्भव है कि हम अपने जीवन में बहुत कार्यों में व्यस्त हों किन्तु अपने जीवन में उनको पूर्णतया: अनदेखा न करें। जब भी आप उनसे मिलें या बात करें तो उनको केवल सुझाव तथा आज्ञा न दें। उनको समझने का प्रयास करें। यद्यपि उनके समय की और हमारी वर्तमान परिस्थितियाँ बदल गई है फिर भी उनके जीवन का सम्मान करें। उनसे दुर्व्यवहार न करें। यदि आप विवाहित हैं और आपका अपना परिवार है तो ध्यान दें कि आप अपने माता-पिता के साथ कैसा व्यवहार करते हैं क्योंकि जैसा आप अपने माता-पिता के साथ व्यवहार करेंगे वैसा आपके बच्चे भी सीखेंगे। इसलिए अवश्य ही बच्चों के समक्ष एक आदर्श ख्रीष्टीय का उदाहरण प्रस्तुत करें।

उनसे वास्तव में प्रेम करें: हमें परमेश्वर से दया की आवश्यकता है कि हम अपने माता-पिता का हृदय से और अपने कार्यों से प्रेम करें। यदि आप अविवाहित हैं और माता-पिता के साथ रहते हैं, तो अवश्य ही प्रभु को प्राथमिकता देते हुए माता-पिता की अधीनता में जीवन जियें। परन्तु जब हम स्वयं कहीं काम करते हैं, स्वयं को धन से सहायता करते हैं, या हमारा विवाह होता है, हमारा अपना परिवार है, तो माता-पिता से प्रेम करने में हमें परिपक्व होने की आवश्यकता है। हमारे पास पहले जैसा समय नहीं होगा, किन्तु प्रभु के भय में हमें उनसे व्यवहारिक रीति से प्रेम दिखाना है। हमें प्रभु में संसारिक माता-पिता का भी आदर करें (निर्गमन 20:12; इफिसियों 6:1) परमेश्वर से प्रार्थना करें कि हम उनसे प्रेम कर सकें। जब हमें उनसे कुछ चाहिए तभी प्रेम मत दिखाइये वरन वास्तव में उनसे प्रेम करें न कि उनसे प्राप्त होने वाले लाभों के कारण केवल उस समय के लिए प्रेम दिखाएँ।

यदि आपके माता-पिता अविश्वासी हैं तो उनके उद्धार के लिए निरन्तर प्रार्थना करें।

उनके साथ शान्तिपूर्ण सम्बन्ध बनाये रखने के लिए परिश्रम करें: एक ख्रीष्टीय होने के नाते हमारा उत्तरदायित्व है कि हम अपने प्रत्येक सम्बन्धों में ख्रीष्ट को प्रदर्शित करें। हम इसलिए बुलाये गए हैं कि हम ख्रीष्ट का अनुसरण करें और सबके साथ शान्ति से रहें। (रोमियो 12:18) हमें प्रयास करना है कि जहाँ तक सम्भव हो हम माता-पिता के साथ शान्ति के साथ रहें। यदि हमारा उनसे किसी बात या घटना को लेकर मतभेद है तो इसको शीघ्र ही निपटाने का प्रयास करें। कई बार अपनी गलती न होने पर भी क्षमा माँगे और उनको क्षमा भी करें। प्रभु से प्रार्थना करें कि आप उनके साथ धैर्य रखें, उनको समझ सकें, टूटे रिश्तों को पुन: जोड़ सकें। हम अपनी सामर्थ्य से लोगों के साथ शान्ति के सम्बन्ध में रह नहीं पाएंगे इसलिए हमें आवश्यक है कि हम परमेश्वर पर निर्भर रहें।  

उनके लिए प्रार्थना करें: यदि हम अपने माता-पिता के साथ हों या उनसे दूर रहके पढ़ाई कर रहें हों, या कार्य करते हों, या आप विवाहित हों, हम अपने माता-पिता के लिए जो सबसे उत्तम कर सकते हैं वह है उनको अपनी प्रार्थनाओं में स्मरण रखना। चाहे हमारा सम्बन्ध उनसे बहुत घनिष्ट हो या न भी हो किन्तु हम परमेश्वर के सम्मुख उनको अपनी प्रार्थना में रख सकते हैं। चाहे जो भी परिस्थिति हो हम परमेश्वर के सम्मुख उनको लाएँ और उनके लिए प्रार्थना करते हुए आदर दिखाएं। चाहे वे आपके साथ जो कुछ भी करें परन्तु आप अवश्य ही उनके लिए प्रार्थना करें कि परमेश्वर अपनी दया उन पर दिखाए। यदि आपके माता-पिता अविश्वासी हैं तो उनके उद्धार के लिए निरन्तर प्रार्थना करें। प्रार्थना करें कि परमेश्वर उनकी आत्मिक आँखों को खोले ताकि वे ख्रीष्ट को अपने जीवन का उद्धारकर्ता के रूप में देख सकें। यदि आपके माता-पिता विश्वासी हैं तो उनके लिए प्रार्थना करिए कि वे यीशु की ओर दृष्टि करें और यीशु के स्वभाव में बढ़ते जाएँ।

अत: यदि हम विश्वासी हैं, तो अवश्य ही हम अपने माता-पिता का प्रभु में आदर करेंगे। यदि वे विश्वासी हैं तो प्रभु को धन्यवाद दें और प्रार्थना करें कि आप उनके साथ अपने सम्बन्ध को इस पृथ्वी पर भी अच्छा रखने का प्रयास करें, क्योंकि वे यीशु के कारण वहीं जाएंगे जहाँ आप जाएंगे। यदि हमारे माता-पिता अविश्वासी हैं तो उन्हें सुसमाचार बताएँ तथा परमेश्वर के प्रेम को अपने जीवन से प्रकट करें ताकि वे हमारे विश्वास और कार्यों को देखकर यीशु को जान सकें। यह हमारा उत्तरदायित्व है कि हम यदि उनसे प्रेम करते हैं तो उनको सुसमाचार बताएं और उनके लिए प्रार्थना करते रहें ताकि वे प्रभु के पास आएं और अनन्त जीवन पाएं।  

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