उसकी ख्य़ाति के लिए प्रार्थना करें
<a href="" >जॉन पाइपर द्वारा भक्तिमय अध्ययन</a>

संस्थापक और शिक्षक, desiringGod.org

“अतः तुम इस प्रकार प्रार्थना करना: ‘हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है, तेरा नाम पवित्र माना जाए।’” (मत्ती 6:9)

पवित्रशास्त्र में दर्जनों बार परमेश्वर “अपने नाम के लिए” कार्यों को करता है।

धार्मिकता के मार्गों में वह अपने नाम के निमित्त मेरी अगुवाई करता है। (भजन 23:3)

हे यहोवा, अपने नाम के निमित मेरा अधर्म, जो बड़ा है, क्षमा कर। (भजन 25:11)

फिर भी उसने अपने नाम के निमित्त उनको बचाया। (भजन 106:8)

अपने नाम के कारण मैं कोप करने में विलम्ब करता हूँ। (यशायाह 48:9)

तुम्हारे पाप उसके नाम के कारण क्षमा हुए हैं। (1 यूहन्ना 2:12)

यदि आप पूछें कि वास्तव में इन सभी कथनों में (और इनके जैसे अनेक कथनों में) परमेश्वर के हृदय को क्या प्रेरित करता है, तो इसका उत्तर है कि परमेश्वर हर्षित होता है जब उसके नाम को जाना जाता है और उसका आदर किया जाता है।

सबसे प्रथम और सबसे महत्वपूर्ण प्रार्थना जिसे किया जा सकता है वह यह है, “तेरा नाम पवित्र माना जाए।” मैं पहले सोचता था कि यह एक उत्साहपूर्ण स्तुति की घोषणा है। जैसे, “हाल्लेलूयाह‍! प्रभु का नाम पवित्र है!” परन्तु यह उत्साहपूर्ण स्तुति की घोषणा नहीं है। यह तो एक याचना है। वास्तव में तो एक प्रकार का आदेश या एक प्रकार की आज्ञा है। हे प्रभु, ऐसा ही हो! इसको ऐसा कराइए। ऐसा हो कि आपका नाम पवित्र माना जाए। यह मेरा निवेदन है, यह मेरी प्रार्थना है। मैं इसके लिए आपसे आग्रह करता हूँ: लोगों में ऐसा कार्य कीजिए कि वे आपके नाम को पवित्र मानें। मुझ  में कार्य कीजिए कि मैं आपके नाम को पवित्र मानूँ!

परमेश्वर को भाता है कि अधिक से अधिक लोग उसके नाम को “पवित्र मानें।” इसीलिए उसका पुत्र ख्रिष्टियों को सिखाता है कि वे इस बात के लिए प्रार्थना करें। वास्तव में, यीशु इसे प्रथम और सर्वोपरि प्रार्थना बनाता है। क्योंकि यह पिता की प्रथम और महान अभिलाषा है।

“हे प्रभु, ऐसा होने दीजिए कि अधिक से अधिक लोग आपके नाम को पवित्र मानें,” अर्थात्, आपके नाम का आदर करें, उसकी सराहना करें, उसका सम्मान करें, उसको संजोएंँ, उसको प्रतिष्ठा दें, उसका भय मानें, और उसकी प्रशंसा करें। अधिक से अधिक लोग! इसलिए, आप देख सकते हैं कि यह तो आधारभूत रीति से एक सुसमाचार प्रचार-प्रसार (मिशनरी) हेतु प्रार्थना है।

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