“मैं तुझसे सच कहता हूँ कि आज ही तू मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा।” (लूका 23:43) 

यह क्रूस पर यीशु की दूसरी वाणी है। यीशु के साथ और दो अपराधी भी क्रूस पर थे। उन में से एक ने यीशु की निंदा की। दूसरे ने कहा कि वह अपने अपराध का फल भोग रहा है और यीशु पर विश्वास करते हुए कहा “जब तू अपने राज्य मे आए तो मुझे स्मरण करना!” इस पर यीशु ने उसे स्वर्गलोक का आश्वासन दिया। हम इससे दो बातों को देख सकते हैं –

1. अपराधी को उद्धार का आश्वासन देकर यीशु अपनी सामर्थ को दर्शाता है – क्रूस पर यीशु अत्यन्त पीड़ा, कष्ट और दुख की अवस्था में था। वहाँ खड़े हुए अधिकारी उसे ताने मार रहे थे, सैनिक उसके पास आकर ठट्ठा करने लगे थे। हम लोग छोटी-छोटी बातों से परेशान हो जाते हैं और क्रोध में आकर दूसरों से बिना सोचे दुर्व्यवहार करते हैं, परन्तु यीशु ने किसी के साथ कोई दुर्व्यवहार नहीं किया। क्रूस पर अपने पीड़ा के मध्य में उसने एक पश्चात्तापी अपराधी को अनन्त जीवन का आश्वासन दिया। बाहरी रूप से यीशु का लहूलुहान शरीर एक निर्बल व्यक्ति का चित्र था, परन्तु उस अपराधी के पापों को क्षमा करके, उसे अनन्त जीवन का आश्वासन देकर यीशु ने दर्शाया कि वास्तव में वह सामर्थी परमेश्वर है।

2. स्वर्गलोक का द्वार खोलकर यीशु अपने कार्य को पूरा करता है प्रकाशितवाक्य 2:7 के अनुसार स्वर्गलोक ऐसा स्थान है जहाँ जीवन का वृक्ष है, मृत्यु के ऊपर जय है, अनन्त जीवन है। परमेश्वर ने आदम को अदन की वाटिका मे रखा था जहाँ पर वह परमेश्वर के साथ एक घनिष्ट संगति में था और जहाँ पर मृत्यु नहीं थी। परन्तु उसने परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन किया और उसके कारण संसार में पाप और मृत्यु का प्रवेश हुआ (रोमियों 5:12)। अब किसी मनुष्य के लिए यह सम्भव नहीं था कि वो स्वर्गलोक में प्रवेश करे। परन्तु क्रूस पर यीशु ने अपने कार्य को पूरा किया, क्रूस का दुख सहा और स्वर्गलोक मे प्रवेश करने हेतु हमारे लिए उपाय किया। 

अतः आज हमारे लिए स्वर्गलोक में प्रवेश करने का मार्ग खोल दिया गया है। यदि उस पश्चात्तापी अपराधी के समान हम अपने अपराधों को मान लें और यीशु पर विश्वास करें, तो हम भी उस आश्वासन को प्राप्त कर सकते हैं जिसे उस अपराधी ने प्राप्त किया था कि आज ही मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा।     

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मोनीष मित्रा
मोनीष मित्रा

परमेश्वर के वचन का अध्ययन करते हैं और मार्ग सत्य जीवन के साथ सेवा करते हैं।

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