अपनी प्यास के द्वारा परमेश्वर की सेवा करें।

इसलिए हमारी अभिलाषा यह है, चाहे साथ रहें या अलग रहें हम उसे प्रिय लगते रहें। (2 कुरिन्थियों 5:9)

क्या होगा यदि आपको पता चलता है (जैसा कि फरीसियों को पता चला) कि आपने अपना सम्पूर्ण जीवन परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए समर्पित किया था, परन्तु इस पूरे समयकाल में आप वैसे कार्य कर रहे थे जो परमेश्वर की दृष्टि में घृणित है (लूका 16:14-15)?

कोई व्यक्ति इस पर प्रश्न उठाते हुए कह सकता है, “मैं नहीं सोचता कि ऐसा सम्भव है; परमेश्वर  ऐसे व्यक्ति को नहीं ठुकराएगा जो उसको प्रसन्न करने का प्रयास करता आया है।” परन्तु क्या आप देख रहे हैं कि इस प्रश्न उठाने वाले ने क्या किया है? उसने अपनी इस बात की निश्चयता को कि परमेश्वर को क्या प्रसन्न करता होगा, इस बात पर आधारित किया है कि वह क्या सोचता है कि परमेश्वर कैसा है। यही कारण है कि हमें पवित्रशास्त्र में प्रकट परमेश्वर के चरित्र के साथ आरम्भ करना चाहिए।

परमेश्वर पहाड़ के सोते के समान है न कि एक पानी की नाँद के समान। एक पहाड़ का सोता स्वयं ही बहता रहता है। यह निरन्तर उमड़ता रहता है और दूसरों के लिए उपलब्ध कराता है। परन्तु एक पानी की नाँद को पम्प या बाल्टी द्वारा भरे जाने की आवश्यकता होती है। इसलिए बड़ा प्रश्न है: आप सोते की सेवा कैसे कर सकते हैं? और: आप पानी की नाँद की सेवा कैसे कर सकते हैं? परमेश्वर वास्तव में जैसा है, उसमें आप कैसे उसको महिमा देते हैं?

यदि आप किसी पानी की नाँद के महत्व की महिमा करना चाहते हैं, तो आप परिश्रम करते हुए उसको भरा हुआ और उपयोगी बनाए रखेंगे। परन्तु यदि आप किसी सोते के महत्व की महिमा करना चाहते हैं, तो आप ऐसा करने के लिए अपने घुटनों पर आते हैं और अपने हृदय की सन्तुष्टि तक उसमें से तब तक पीते रहते हैं, जब तक कि आपके पास ऊर्जा और सामर्थ्य ना आ जाए कि आप घाटी में उतरें और लोगों को बताएँ कि आपने क्या पाया है।

एक आशाहीन पापी के रूप में मेरी आशा इस बाइबलीय सत्य पर टिकी हुई है: कि परमेश्वर उस प्रकार का परमेश्वर है जो उस एकमात्र बात से प्रसन्न होगा जो मैं दे सकता हूँ: मेरी प्यास। यही कारण है कि परमेश्वर की सम्प्रभु स्वतन्त्रता और आत्मनिर्भरता मेरे लिए इतनी बहमूल्य है: वे मेरी इस आशा के लिए नींव हैं कि परमेश्वर बाल्टी भरने की मेरी कुशलता से नहीं, वरन् अनुग्रह के सोते पर टूटे मन वाले पापियों के झुककर पीने से हर्षित होता है।

हमें अब और सर्वदा परमेश्वर को प्रसन्न करने का हर सम्भव प्रयास करना चाहिए। परन्तु हाय हम पर यदि हमारा सम्पूर्ण जीवन इस विषय में एक झूठे दृष्टिकोण पर आधारित पाया जाए कि परमेश्वर को क्या प्रसन्न करता है। प्रभु उन लोगों द्वारा प्रसन्न नहीं होता है जो उसे एक पानी की नाँद के समान समझकर उससे व्यवहार करते हैं, परन्तु उन लोगों से जो उसे कभी न समाप्त होने वाला, सर्व-सन्तुष्टिदायक सोता समझकर उससे व्यवहार करते हैं। जैसा कि भजन 147:11 कहता है, “यहोवा उन पर अनुग्रह करता है . . . जो उसकी करुणा की आस लगाए रहते हैं।”

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जॉन पाइपर
जॉन पाइपर

जॉन पाइपर (@जॉन पाइपर) desiringGod.org के संस्थापक और शिक्षक हैं और बेथलेहम कॉलेज और सेमिनरी के चाँसलर हैं। 33 वर्षों तक, उन्होंने बेथलहम बैपटिस्ट चर्च, मिनियापोलिस, मिनेसोटा में एक पास्टर के रूप में सेवा की। वह 50 से अधिक पुस्तकों के लेखक हैं, जिसमें डिज़ायरिंग गॉड: मेडिटेशन ऑफ ए क्रिश्चियन हेडोनिस्ट और हाल ही में प्रोविडेन्स सम्मिलित हैं।

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