परमेश्वर से प्रेम करने का क्या अर्थ है?

परमेश्वर से प्रेम करने का क्या अर्थ है?

What It Means To Love God?
हे परमेश्वर, तू ही मेरा परमेश्वर है; मैं तुझे यत्न से ढूंढूंगा; सूखी और प्यासी, हां, निर्जल भूमि पर मेरा प्राण तेरा प्यासा है, मेरा शरीर तेरा अति अभिलाषी है। इस प्रकार मैंने पवित्रस्थान में तुझ पर दृष्टि की, कि तेरे सामर्थ्य और तेरी महिमा को देखूँ। (भजन 63:1-2)

केवल परमेश्वर ही दाऊद के जैसे हृदय को सन्तुष्ट करेगा। और दाऊद परमेश्वर के मन के अनुसार एक व्यक्ति था। इसी प्रकार का होने के लिए हम भी सृजे गए थे। 

परमेश्वर से प्रेम करने का जो अर्थ है उसका सार यह है: उसमें सन्तुष्ट होना। उस में — न केवल उसके उपहार में, किन्तु स्वयं परमेश्वर में, वह महिमामय व्यक्ति जो वह है! 

परमेश्वर से प्रेम करने में उसकी सभी आज्ञाओं का पालन करना  सम्मिलित होगा; इसमें उसके सम्पूर्ण वचन पर विश्वास करना  सम्मिलित होगा; इसमें उसके सभी उपहारों के लिए उसे धन्यवाद देना  सम्मिलित होगा। परन्तु यह सब परिणाम है। परमेश्वर से प्रेम करने का सार यह है कि वह जो कुछ भी है उसको सराहना और उसका आनन्द  उठाना। और हमारे द्वारा परमेश्वर का इस प्रकार आनन्द उठाना ही है जो हमारी सभी अन्य प्रतिक्रियाओं को वास्तविक रीति से उसे महिमान्वित करने वाला बनाता है। 

हम सब इसे स्वतः जानने के साथ ही पवित्रशास्त्र से भी जानते हैं। क्या हम उन लोगों के प्रेम से अधिक सम्मानित होने का अनुभव करते हैं जो हमारी सेवा कर्तव्य की बाध्यताओं से करते हैं, या उनसे जो ऐसी सहभागिता की प्रसन्नता से करते हैं? 

मेरी पत्नी सबसे अधिक सम्मानित होती है जब मैं कहता हूं “आपके साथ समय बिताना मुझे आनन्दित करता है।” मेरा आनन्द उसकी श्रेष्ठता की प्रतिध्वनि है। और ऐसा ही परमेश्वर के साथ है। वह हम में सर्वाधिक महिमान्वित होता है जब हम उसमें सर्वाधिक सन्तुष्ट होते हैं।   

हम में से कोई भी परमेश्वर में सिद्ध सन्तुष्टि तक नहीं पहुंचा है। मैं प्रायः अपने हृदय की कुड़कुड़ाहट पर शोकित होता हूं जब मैं कुछ सांसारिक आराम या सुविधा खो देता हूं। परन्तु मैंने चखा है कि प्रभु भला है। परमेश्वर के अनुग्रह से अब मैं चिरस्थाई आनन्द के स्रोत को जानता हूँ।  

और इसलिए मैं अपना समय लोगों को इस आनन्द की ओर खींचने में व्यतीत करता हूँ जब तक वे मेरे साथ यह न कहने लगें कि, “मैंने यहोवा से एक वर मांगा है, मैं उसी के यत्न में लगा रहूँगा: कि मैं अपने जीवन भर यहोवा के भवन में ही निवास करने पाऊँ, जिस से यहोवा की मनोहरता निहारता रहूँ और उसके मन्दिर में उसका ध्यान करता रहूँ” (भजन 27:4)।  

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