उसके उपदेशों से प्रसन्न
<a href="" >जॉन पाइपर द्वारा भक्तिमय अध्ययन</a>

संस्थापक और शिक्षक, desiringGod.org

क्योंकि परमेश्वर का प्रेम यह है कि हम उसकी आज्ञाओं का पालन करें; और उसकी आज्ञाएँ बोझिल नहीं हैं। क्योंकि जो कुछ परमेश्वर से उत्पन्न हुआ है, वह संसार पर जय प्राप्त करता है; और वह विजय जिसने संसार पर जय प्राप्त की यह है—हमारा विश्वास। और वह कौन है जो संसार पर विजयी होता है, सिवाय उसके जो यह विश्वास करता है कि यीशु ही परमेश्वर का पुत्र है? (1 यूहन्ना 5:3-5)

इन पदों में जो बात स्पष्ट है, वह यह है कि नया जन्म पाना — परमेश्वर से उत्पन्न होना — परमेश्वर की आज्ञाओं को हमारे लिए बोझ की बात होने के स्थान पर आनन्द की बात बना देता है। यह कैसे होता है?

नया जन्म पाना परमेश्वर की आज्ञाओं को बोझ के स्थान पर आनन्द की बात कैसे बना देता है?

प्रेरित यूहन्ना कहता है, “वह विजय जिसने संसार पर जय प्राप्त की यह है—हमारा विश्वास” (1 यूहन्ना 5:4)। दूसरे शब्दों में, विश्वास को उत्पन्न करने के द्वारा ही परमेश्वर में नया जन्म, हमें परमेश्वर की आज्ञाओं को हम पर सांसारिक रीति से बोझिल होने पर विजयी बनाता है। इसकी पुष्टि 1 यूहन्ना 5:1 में की गई है, जो कहता है, अक्षरशः, “जो कोई विश्वास करता है  कि यीशु ही ख्रीष्ट है, वह परमेश्वर से उत्पन्न हुआ है ।”

विश्वास इस बात का प्रमाण है कि हम परमेश्वर द्वारा उत्पन्न हुए हैं। हम विश्वास करने का निर्णय लेने के द्वारा अपना नया जन्म नहीं कराते हैं। जैसे कि पतरस ने अपनी पहली पत्री में कहा कि, परमेश्वर ने “एक जीवित आशा के लिए हमें नया जन्म दिया” (1 पतरस 1:3)। हमारी जीवित आशा, या भविष्य-के-अनुग्रह पर हमारा विश्वास, नये जन्म के द्वारा परमेश्वर का कार्य है।

इसलिए, जब यूहन्ना कहता है, “जो कुछ परमेश्वर से उत्पन्न हुआ है, वह संसार पर जय प्राप्त करता है” और फिर जोड़ता है, “और वह विजय जिसने संसार पर जय प्राप्त की यह है—हमारा विश्वास ” (1 यूहन्ना 5:4), तो मैं यह समझता हूँ कि उसका अर्थ है कि परमेश्वर हमें सक्षम बनाता है, नये जन्म के द्वारा, संसार पर विजयी होने के लिए — अर्थात्, परमेश्वर की आज्ञाओं को न मानने की सांसारिक इच्छा पर विजयी होने के लिए। नया जन्म यह कार्य विश्वास उत्पन्न करने के द्वारा करता है, जिसमें निस्संदेह परमेश्वर की आज्ञाओं से प्रसन्न होने का भाव निहित है, न कि परमेश्वर की आज्ञाओं में रुचि समाप्त होने का, जिससे वे बोझिल लगें।

इसलिए, यह विश्वास ही है जो परमेश्वर और उसकी इच्छा के प्रति हमारी स्वाभाविक शत्रुता पर विजयी होता है, और हमें स्वतन्त्र करता है उसकी आज्ञाओं को मानने के लिए और भजनकार के साथ यह कहने के लिए कि, “हे मेरे परमेश्वर, मैं तेरी इच्छा पूरी करने से प्रसन्न होता हूँ” (भजन 40:8)।

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