पास्टर जॉन से पूछें
मेरे जीवन को क्या महत्वपूर्ण बनाता है?
जॉन पाइपर द्वारा भक्तिमय अध्ययन

जॉन पाइपर द्वारा भक्तिमय अध्ययन

संस्थापक और शिक्षक, desiringGod.org

श्रुति लेख (Audio Transcript)

मैं यह कैसे सुनिश्चित कर सकता हूँ कि मेरे जीवन का कुछ अर्थ है? इस बात को सुनिश्चित करना कि यह जीवन जो परमेश्वर ने मुझे दिया है उसका कुछ महत्व है? यह एक अत्यन्त बड़ी बात है। 

जीवन का सच्चा महत्व क्या है, और यह किस प्रकार जोखिम लेने से सम्बन्धित है? यह एक विश्वव्यापी प्रश्न है जिसका उत्तर जॉन पाइपर इस प्रकार से देते हैं:

जीवन का सच्चा महत्व यह है कि परमेश्वर ने मनुष्य को श्रेष्ठ मूल्य के साथ अपने स्वरूप में बनाया है। और परमेश्वर को जानने, परमेश्वर से प्रेम करने, तथा परमेश्वर को प्रकट करने में वह मूल्य और वह महत्व पाया जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो, जीवन परमेश्वर के विषय में है। मनुष्य इसके केन्द्र में नहीं है। परमेश्वर इसके केन्द्र में है। परमेश्वर ने अपनी महानता का आवर्धन करने के लिए सम्पूर्ण विश्व की और मानवजाति की सृष्टि की है। और इस संसार में हमारा आनन्द, जिसे परमेश्वर ने आवश्यक रूप से बनाया है, वह यीशु ख्रीष्ट में, परमेश्वर पिता में और पवित्र आत्मा में पाया जाता है।

“परमेश्वर की बढ़ाई करने में अपने महत्व को खोजने में और यथासम्भव प्रसन्न होने के बीच में, कोई तनाव नहीं है।”

इसलिए, परमेश्वर की बड़ाई करने में अपने महत्व को खोजने में और यथासम्भव प्रसन्न होने के बीच में कोई तनाव नहीं है। यह तो मेरे जीवन की सबसे बड़ी खोज में से एक बात है: कि परमेश्वर के महिमान्वित होने के उद्देश्य में और मेरे सन्तुष्ट होने की अभिलाषा में कोई भी मतभेद नहीं है। जब मैं परमेश्वर में अपनी सन्तुष्टि पाता हूँ, तो ये दोनों बातें एक साथ आती हैं। इसलिए, मैं इस छोटे से वाक्यांश का उपयोग करता हूँ कि परमेश्वर मुझ में सर्वाधिक महिमान्वित होता है जब मैं उसमें सर्वाधिक सन्तुष्ट होता हूँ। उसे महिमा मिलती है। और मुझे आनन्द मिलता है।

अब, संकट और जोखिम उठाने के विषय में आपके प्रश्न का दूसरा भाग यह है कि जो लोग अपना पूर्ण आनन्द और सन्तुष्टि परमेश्वर में पाते हैं, वह आनन्द और वह सन्तुष्टि जो उनसे कभी छीनी नहीं जा सकती है, यहाँ तक कि मृत्यु भी इसे नहीं छीन सकती है। क्योंकि परमेश्वर की उपस्थिति में आनन्द की भरपूरी है। उसके दाहिने हाथ में सुख सदा-सर्वदा के लिए बना रहता है (भजन 16:11)। इसलिए मृत्यु मेरे आनन्द को रोक नहीं सकती है। और उस प्रकार के लोग सबसे अधिक जोखिम उठाते हैं — वे तो अच्छे अर्थ में खतरनाक होते हैं। वे किसी भी मूल्य को चुकाकर दूसरों से प्रेम करते हैं।

इसलिए, यदि मैं देखूँगा कि आप संकट में हैं, कि आप मर रहे हैं, जैसा कि मैं सोचता हूँ कि प्रत्येक व्यक्ति ख्रीष्ट के बिना मर रहा है और नाश हो रहा है, तो मैं आपके लिए अपना जीवन देने के लिए तैयार हो जाऊँगा, क्योंकि मृत्यु मेरे आनन्द को नहीं छीनती है। और यदि आप ख्रीष्ट पर विश्वास करेंगे, तो मेरा आनन्द दोगुना हो जाएगा, क्योंकि मैं परमेश्वर में आपके आनन्द में अपने आनन्द को पाता हूँ। इसलिए, मैं सोचता हूँ कि यह सबसे अच्छी सम्भावित स्थिति है। परमेश्वर को महिमा प्राप्त होती है। मुझे आनन्द प्राप्त होता है। और आप प्रेम को प्राप्त करते हैं।

“यदि हम यीशु ख्रीष्ट से पृथक अपनी प्रसन्नता और अपने महत्व की खोज करते हैं तो हम अपने जीवन को व्यर्थ में गँवाते हैं।”

यदि हम यीशु ख्रीष्ट से पृथक अपनी प्रसन्नता और अपने महत्व की खोज करते हैं तो हम अपने जीवन को व्यर्थ में गँवाते हैं। यदि परमेश्वर को चित्र से हटा दिया जाए, यदि ख्रीष्ट को चित्र से हटा दिया जाए, और हम करोड़पति बन जाएँ, उन सभी यौन सुखों को प्राप्त कर लें जिनकी हम कल्पना कर सकते हैं, बहुत प्रसिद्ध हो जाएँ, तब तो हमने अपना जीवन व्यर्थ में गँवा दिया है। क्योंकि अन्त में, परमेश्वर ही है जिसने संसार की सृष्टि की है, और परमेश्वर संसार और उसमें उपस्थिति सब कुछ को अपने उद्देश्यों के लिए एक अन्त तक ला रहा है। और यदि हम उन उद्देश्यों में उसके साथ सम्मिलित नहीं हुए हैं, तो हम अपना जीवन व्यर्थ में गँवा रहे हैं।

“यदि हम यीशु ख्रीष्ट से पृथक अपनी प्रसन्नता और अपने महत्व की खोज करते हैं तो हम अपने जीवन को व्यर्थ में गँवाते हैं।”

आप अपना जीवन व्यर्थ में गँवाते हैं यदि आप वह नहीं करते हैं जिसको करने के लिए आपको रचा गया था। और परमेश्वर के स्वरूप में सृजे गए प्रत्येक मनुष्य को परमेश्वर की महिमा, परमेश्वर के मूल्य, परमेश्वर की सुन्दरता को प्रतिबिन्बित करने के लिए बनाया गया था। तो इसलिए, यदि हम ख्रीष्ट में अपना आनन्द नहीं पाते हैं, यदि हम ख्रीष्ट में अपनी सन्तुष्टि नहीं पाते हैं, किन्तु इसके विपरीत, इसे ऐसी अन्य बातों में पाते हैं, जो थोड़े समय के लिए बहुत संतोषजनक प्रतीत होती हैं, तो हमने अपने जीवनों को व्यर्थ में गँवा दिया है।

इसका अर्थ है, अधिकाँश संसार अपना जीवन व्यर्थ में गँवा रहा है, क्योंकि वे परमेश्वर को नहीं जानते हैं। वे परमेश्वर से प्रेम नहीं करते हैं। उनके लिए परमेश्वर बहुत छोटा है, वह जीवन के छोर पर एक सीमांत विचार मात्र है। हो सकता है कभी-कभी संकट के समय में उसे जीवन में प्रवेश कराया जाता है। यह तो एक बड़ी ईश-निन्दा है। यह परमेश्वर के लिए एक बड़ा अपमान है, और अपने जीवन के अन्त में, हम पाएँगे कि यदि हमने परमेश्वर को केन्द्रीय स्थान के विपरीत छोर पर रखा है, तो हमने इसे व्यर्थ में गँवा दिया है।

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