कलीसियाई सदस्यता का अर्थ और महत्व क्या है

परिचय
यदि ख्रीष्टीय लोगों से कलीसिया का विवरण पूछा जाए, तो अधिकांश लोग आराधना, वचन का प्रचार, दान, प्रभु भोज इत्यादि जैसे विषय पर महत्व देते हुए कलीसिया का विवरण देंगे। और यदि कलीसियाई सदस्यता का विवरण पूछा जाए, तो अधिकांश लोग इसे कलीसिया के लोगों की संख्या या उनसे जुड़े एक शासकीय विषय का भाग सोचते हैं। भले ही कलीसियाई सदस्यता कलीसिया से जुड़ा हुआ एक विषय है, पर इस विषय को महत्व नहीं दिया जाता। यह इसीलिए है क्योंकि इस विषय को वचन के दृष्टिकोण से समझाया और बताया नहीं जाता है। इस लेख के द्वारा हम कलीसियाई सदस्यता के अर्थ और महत्व को समझने का प्रयास करेंगे। 

कलीसियाई सदस्यता का अर्थ
कलीसियाई सदस्यता विश्वासियों के मध्य एक वाचा है जिसके आधार पर वे अपने विश्वास रुपी अंगीकार का, कलीसियाई विधियों के पालन के द्वारा स्वीकृति देते हैं और मसीही शिष्यता में एक दूसरे के जीवन के ऊपर ध्यान रखते हैं। 

कलीसिया सदस्यता विश्वास और पश्चाताप, परमेश्वर के त्रिएक नाम में बपतिस्मा के पश्चात आत्मिक देखभाल और उन्नति तथा परमेश्वर की महिमा हेतु अपने आपको स्थानिय कलीसिया के अधीन करना या समर्पित करना, एक-दूसरे के साथ वाचा का बांधा जाना है, एक विश्वास वचन अर्थात् यीशु के व्यक्ति और कार्य पर सहमत होना है।

कलीसिया कोई एक स्थान या कोई भवन नहीं है; यह परमेश्वर के राज्य का एक वास्तविक रूप है।

कलीसियाई सदस्यता को लेकर लोगों के पास विभिन्न परिभाषाएं हैं, पर इसकी सही परिभाषा कलीसिया के सही अर्थ को समझने के द्वारा निकल कर आती है। यह सम्भव है कि लोग कलीसिया को लेकर एक परम्परागत समझ रखते हों जहाँ आराधना, वचन सुनना, दान और प्रभु भोज इत्यादि केवल धार्मिक काम हैं। यह भी सम्भव है कि कलीसिया में जाना लोगों के लिए एक मनोरंजन का समय हो जहाँ वह अपने मित्रों और परिचित लोगों से मिलें और बात करें। स्थानीय कलीसिया को लेकर इस प्रकार के विचार हमारे लिए कलीसिया के प्रति एक त्रुटिपूर्ण अर्थ को उत्पन्न करता है। 

सर्वप्रथम, हमें समझना है कि कलीसिया का सही अर्थ क्या है? परमेश्वर का राज्य एक आत्मिक राज्य है। जिस प्रकार हर एक राज्य के नागरिक होते हैं, उसी प्रकार परमेश्वर के राज्य के भी नागरिक हैं। यह आत्मिक राज्य स्थानीय कलीसिया के माध्यम से इस संसार में अपने आप को व्यावहारिक रूप से प्रकट करता है और परमेश्वर के राज्य के नागरिक इस कलीसिया में सदस्य के रूप में पाए जाते हैं। कलीसिया कोई एक स्थान या कोई भवन नहीं है; यह परमेश्वर के राज्य का एक वास्तविक रूप है। कलीसिया का यह अर्थ, अब हमें कलीसियाई सदस्यता को समझने के लिए सहायता करता है। 

इसलिए, परमेश्वर के राज्य की नागरिकता स्थानीय कलीसिया की सदस्यता के रूप में दिखाई देती है और दर्शाया जाता है। इस सदस्यता का उद्देश्य कलीसिया से कुछ भौतिक लाभ और सुविधा प्राप्त करना नहीं है, पर एक बड़े उत्तरदायित्व को उठाना है। कलीसियाई सदस्यता के द्वारा अब हम परमेश्वर के राज्य के प्रतिनिधि बन जाते हैं और कलीसिया के प्रति उत्तरदायी बन जाते हैं। कलीसिया के प्रति यह एक आत्मिक उत्तरदायित्व और उत्तरदायी होने का सम्बन्ध है। भले ही नये नियम में हम “कलीसियाई सदस्यता” के शब्द को प्रत्यक्ष रूप से नहीं पढ़ते हैं, पर नये नियम में कलीसिया शब्द लोगों के झुण्ड का जमा होना, इकठ्ठा होना जैसे शब्दों के द्वारा दर्शाया गया है (प्रेरितों के काम 11:26, 14:27)। 

यदि प्रेरित 2:41 में हम पढ़े तो पाएंगे कि लगभग 3000 लोगों ने प्रेरित पतरस के वचन को सुना और उनके हृदय छिद गए। उन्होंने विश्वास और पश्चाताप किया, फिर बपतिस्मा लेने के साथ ही साथ वे पहले से विद्मान ख्रीष्टीय समूह में सम्मिलित हो गए। यह दृश्य कलीसियाई सदस्यता की ओर इंगित करता है। 1 तीमुथियुस 5:9 में  प्रेरित पौलुस स्थानीय कलीसिया में विधवाओं की देखभाल हेतु निर्देश देते हैं कि उन विधवाओं का नाम सूचि में सम्मिलित किया जाए जो साठ वर्ष से ऊपर हैं और जो एक ही पति की पत्नी रही हो। यह बातें हमें संकेत देती हैं कि प्रारभिक कलीसिया में भी कलीसियाई सदस्यता का महत्व था और उनके पास सदस्यता से सम्बन्धित नामों के प्रलेख हुआ करते थे। मेरा कहने का तात्पर्य यह है कि कलीसिया सदस्यता कोई नई अवधारणा या व्यवस्था नहीं है। यह बाइबलीय व्यवस्था है। हमने अभी तक कलीसियाई सदस्यता के अर्थ और परिभाषा तथा बाइबल में पाए जाने वाले सदस्यता के प्रमाणों को देखा है। कलीसियाई सदस्यता के अर्थ को जानने के साथ साथ उसके महत्व को भी जानना आवश्यक है। 

कलीसियाई सदस्यता का महत्व  
स्थानीय कलीसिया के साथ हमारी सामूहिक पहचान के लिए कलीसियाई सदस्यता महत्वपूर्ण है। प्रायः लोग कलीसिया में अपनी पहचान को सामाजिक, आर्थिक, शिक्षात्मक स्तर के आधार पर बात करते हैं। परन्तु स्थानीय कलीसिया में हमारी पहचान के ये मापदंड नहीं होने चाहिए। हमारी पहचान का आधार यीशु ख्रीष्ट के विषय में हमारा अंगीकार और उसके अनुसार जीवनशैली होनी चाहिए। मत्ती 16:16 में हम पतरस के अंगीकार को पढ़ते हैं जिसके विषय में यीशु ने कहा ” इस चट्टान पर अपनी कलीसिया बनाऊंगा: और अधोलोक के फाटक उस पर प्रबल न होंगे।” यीशु के बारे में यह अंगीकार वह नींव है जिसके ऊपर कलीसिया स्थापित होती है। यह कोई भवन नहीं है जिसके बारे में यीशु बोल रहे हैं, यह एक विश्वासी का अंगीकार है। यह अंगीकार कलीसियाई सदस्यता के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह अंगीकार उन सब लोगों का अंगीकार भी है जो कलीसिया के सदस्य बनते हैं। यह अंगीकार कलीसिया के विभिन्न पृष्ठभूमि के लोगों को जोड़ता है, एक करता है। कलीसिया के लोग कलीसिया में अपनी पहचान इस अंगीकार पर आधारित करते हैं। 

न केवल यह अंगीकार कलीसिया में लोगों को एक करता है,  इसके साथ-साथ लोगों को एक-दूसरे के प्रति उत्तरदायी बनाता है। यह उत्तरदायीपन दूसरों के ऊपर नियंत्रण बनाये रखने के लिए नहीं है, यह दूसरों को तुच्छ दिखाने हेतु नहीं है; यह एक-दूसरे की सहायता करने के लिए है, जिससे लोग पवित्रता और धार्मिकता में बढ़ते रहें। क्योंकि यीशु का बारे में लोगों का अंगीकार उन्हें कलीसिया में एक सामूहिक पहचान में जोड़ता है, इसीलिए वह एक-दूसरे के प्रति उत्तरदायी बनते हैं। कलीसिया में ये उत्तरदायित्व उस अंगीकार के अनुसार जीवन जीने और प्रदर्शित करने के लिए एक-दूसरे तो प्रोहत्साहित करते हैं, सहायता करते हैं। उस अंगीकार के अनुसार जीवन को प्रदर्शित न करने पर कलीसिया सुधार, कलीसियाई अनुशासन करती है ताकि व्यक्ति अपने अंगीकार को थामे रहते हुए यीशु ख्रीष्ट के लिए जीवन जी सके। इन सब बातों हेतु कलीसिया सदस्यता अत्यन्त आवश्यक है।

अतः यदि आप कलीसिया के पहले से सदस्य हैं तो अपनी कलीसिया के प्रति पूर्ण समर्पण को दिखाइए, एक दूसरे का ध्यान रखिए। यदि आप एक विश्वासी हैं और किसी भी स्थानीय कलीसिया के सदस्य नहीं है तो आप से मैं आग्रह करना चाहूँगा कि आप किसी ऐसी कलीसिया के सदस्य बनें जो सच्चे सुसमाचार पर विश्वास करती हो और परमेश्वर के वचन के प्रचार पर महत्व देती हो। क्योंकि हमारी आत्मिक उन्नति हेतु कलीसिया अत्यन्त महत्वपूर्ण है।