क्या आप अपने उद्धार की उपेक्षा करते हैं?

क्या आपके मन में अपने उद्धार के विषय में महानता का भाव है? या क्या आप उसकी उपेक्षा करते हैं? 

क्या आप अपने उद्धार की महानता के विषय में प्रतिक्रिया देते हैं? या क्या आप इसके साथ वैसा ही  व्यवहार करते हैं जैसा आप अपने अन्तिम इच्छापत्र या वसीयतनामा, या अपनी गाड़ी का पँजीकरण प्रमाण-पत्र, या अपने घर के बैनामा के साथ करते हैं? आपने एक बार उस पर हस्ताक्षर किया और अब यह कहीं पेटी में रखी हुई है, किन्तु वास्तव में आपके मस्तिष्क पर इसका कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता है। आप विरले ही इसके विषय में सोचते हैं। इसका आपके प्रतिदिन के जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। एक अर्थानुसार आप इसकी उपेक्षा करते हैं। 

परन्तु जब आप अपने महान् उद्धार की उपेक्षा करते हैं, तो वास्तव में आप किस बात की उपेक्षा कर रहे हैं? जब वह कहता है, “अपने महान् उद्धार की उपेक्षा न करो!” तो उसके कहने का क्या अर्थ है:

  • परमेश्वर के द्वारा प्रेम किये जाने की उपेक्षा मत करो।
  • सर्वसामर्थी परमेश्वर के द्वारा क्षमा किए जाने और स्वीकार किए जाने और संरक्षित किए जाने और दृढ़ किए जाने और निर्देशित किए जाने की उपेक्षा मत करो।
  • क्रूस पर ख्रीष्ट के जीवन के बलिदान की उपेक्षा मत करो।
  • विश्वास के द्वारा अभ्यारोपित धार्मिकता के सेंतमेंत वरदान की उपेक्षा मत करो।
  • परमेश्वर के क्रोध के हटाए जाने और उसके साथ मेल मिलाप की मुस्कुराहट की उपेक्षा मत करो।
  • हमारे भीतर पवित्र आत्मा के निवास और जीवित ख्रीष्ट की मित्रता और संगति की उपेक्षा मत करो।
  • यीशु के मुख पर परमेश्वर की महिमा के प्रकाश की उपेक्षा मत करो।
  • अनुग्रह के सिहांसन तक बिना बाधा पहुँच की उपेक्षा मत करो।
  • परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं के कभी न समाप्त होने वाली धरोहर की उपेक्षा मत करो।

यह वास्तव में एक महान्  उद्धार है। इसकी उपेक्षा करना बहुत ही बुरा है। इतने महान् उद्धार की उपेक्षा मत करो। क्योंकि यदि आप इसकी उपेक्षा करते हैं तो क्या आप न्याय से बच पाएँगे? इसी बात को लेखक पूछता है: “यदि हम इतने महान् उद्धार की उपेक्षा करते हैं तो हम कैसे बच पाएँगे?”

इसलिए, ख्रीष्टीय होना बहुत ही गम्भीर कार्य है — यह खट्टास भरा कार्य नहीं है, वरन् गम्भीर कार्य है। हमें अपने महान् उद्धार में आनन्दित होने के लिए अति गम्भीर होना चाहिए।

हम इस संसार द्वारा क्षणभंगुर और आत्मघाती सुखों के पाप से विचलित नहीं होंगे। हम परमेश्वर में अपने शाश्वत आनन्द की उपेक्षा नहीं करेंगे — जो कि इस उद्धार का लक्ष्य है। ऐसे महान् उद्धार से बहलाए जा कर दूर लिए जाने के स्थान पर हम अपनी आँखों को काट कर निकाल देंगे।

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जॉन पाइपर
जॉन पाइपर

जॉन पाइपर (@जॉन पाइपर) desiringGod.org के संस्थापक और शिक्षक हैं और बेथलेहम कॉलेज और सेमिनरी के चाँसलर हैं। 33 वर्षों तक, उन्होंने बेथलहम बैपटिस्ट चर्च, मिनियापोलिस, मिनेसोटा में एक पास्टर के रूप में सेवा की। वह 50 से अधिक पुस्तकों के लेखक हैं, जिसमें डिज़ायरिंग गॉड: मेडिटेशन ऑफ ए क्रिश्चियन हेडोनिस्ट और हाल ही में प्रोविडेन्स सम्मिलित हैं।

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