पास्टर जॉन से पूछें
अपनी मँगनी को व्यर्थ न जाने दें
विवाह के लिए तैयारी कैसे करें
<a href="" >जॉन पाइपर के साथ साक्षात्कार</a>

संस्थापक और शिक्षक, desiringGod.org

श्रुति लेख (Audio Transcript)

पॉडकास्ट के एक और सप्ताह में आपका पुनः स्वागत है। हमारा अगला प्रश्न भाई बसन्त की ओर से है, जिनकी मँगनी हो चुकी है तथा पास्टर जॉन से पूछें कार्यक्रम में इन्होंने यह प्रश्न पूछा है: “पास्टर जॉन, ठीक 100 दिनों में मेरा विवाह होने जा रहा है। मैं 21 वर्ष का हूँ, और मेरी होने वाली दुल्हन गुन्जन 18 वर्ष की है। मैं अपनी कलीसिया में होने वाली एक छात्र सेवकाई के अन्तर्गत प्रशिक्षु (इन्टर्न) हूँ। हम पिछले वर्ष मार्च के महीने में मिले थे और उसी के बाद से हमारा यह दूरस्थ सम्बन्ध आरम्भ हुआ। हम दोनों उस समय मिले जब वह अपने महाविद्यालय की ओर से एक भ्रमण हेतु हमारे राज्य में उसी स्थान पर आई थी जहाँ हमारा छात्र सेवकाई शिविर (रिट्रीट) चल रहा था। हमने स्पष्ट रूप से यह आभास किया है कि विवाह करने के लिए परमेश्वर हमारा मार्गदर्शन कर रहा है और हमारे मार्गदर्शक, कलीसिया के अगुवे, हमारे माता-पिता और घनिष्ठ मित्रों ने भी विवाह करने के हमारे इस निर्णय की पुष्टि की है। जिस प्रकार ख्रीष्ट ने कलीसिया से प्रेम किया है, मैं भी एक स्त्री से उसी प्रकार प्रेम करने के लिए उत्साहित हूँ, किन्तु जैसे-जैसे वह दिन निकट आता जा रहा है, पत्नी को उचित रीति से प्रेम करने में सक्षम पति बनने के लिए ज्ञान और सहायता की मेरी आवश्यकता के प्रति, मैं और अधिक सजग होता जा रहा हूँ। मैं विवाह सम्बन्धी सभी एपिसोडों को फिर से सुनूँगा। इन सब बातों के पश्चात् आपके पास मेरे लिए क्या सुझाव है? वे कौन से सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न हैं जिन्हें हमें पूछने की आवश्यकता है—और सम्भवतः मँगनी के इस चरण के उमड़ते उत्साह के कारण—हम कई बार नहीं पूछते हैं?”

1. सबसे पहला कार्य जो मैं करना चाहता हूँ वह यह है कि उसे मार्ग सत्य जीवन (margsatyajeevan.com) की वेबसाइट पर भेजना, जिससे कि वह एक निःशुल्क अभिलेख को डाउनलोड कर सकें, जिसका नाम है “विवाह की तैयारी के लिए पूछने योग्य प्रश्न ।” विवाह से पूर्व आप जितने अधिक विषयों पर साथ मिलकर बात कर सकें, उतना ही उत्तम होगा। विवाह के पश्चात् उन बातों के विषय में सोचना कहीं अधिक निराशाजनक और भयावह हो सकता है, जिनके विषय में आपको पहले ही बात कर लेनी चाहिए थी। यह बात मुझे उस दूसरी बात की ओर ले जाती है जिसे मैं इसके साथ ही रखना चाहूँगा।

“विवाह से पहले आप जितने अधिक विषयों पर एक साथ बात कर सकें उतना ही अच्छा है।”

2. भाई बसन्त, अपनी मँगेतर से किसी भी विषय पर वार्तालाप करने से केवल इसलिए न लजाएँ क्योंकि आप यह सोचते हैं कि मँगनी के समय में मतभेद से बचने का प्रयास किया जाना उचित है। अभी ही वह समय है जब आप ऐसे हर मतभेद को कर सकते हैं जिसका, बाद में सामने आने की सम्भावना है। यदि आप सोचते हैं कि आप मतभेदों से अभी बच सकते हैं जिससे कि बाद में मतभेदों के लिए अधिक उपयुक्त समय होगा, तो आप त्रुटि कर रहे हैं। यदि आपको लगता है कि आपको इस समय संघर्षों से बचना चाहिए  क्योंकि आनन्दमय मँगनी एक आनन्दमय विवाह का मार्ग प्रशस्त करती है, तो यह आपकी अत्यधिक त्रुटिपूर्ण सोच है। इसके विपरीत, मँगनी या विवाह से पूर्व एक-दूसरे से मिलना इसलिए निर्धारित किया गया है कि: यह बात खुलकर सामने आ सके कि आप में से प्रत्येक क्या सोचता है, क्या विश्वास करता है, क्या आभास करता है और क्या करता है, भले ही वह कभी-कभार हो या अभ्यासानुसार — कुछ भी गुप्त न रखें, कुछ भी न छिपाएँ। आप नहीं चाहेंगे कि विवाह अनभिज्ञता पर आधारित हो, परन्तु वह उस विश्वास पर आधारित हो जो कि सम्पूर्ण सत्य पर आधारित हो।

3. अगली बात जो मैं बसन्त भाई से कहूँगा, वह यह है कि ये वे सुनहरे महीने हैं जिनमें आत्मिक अगुवाई की पद्धतियों को स्थापित करना चाहिए। अपनी होने वाली दुल्हन के साथ बाइबल पढ़ने, प्रार्थना करने और सोचने और अध्ययन करने की पहल करें और उसके साथ सभी प्रकार की बाइबलीय और आत्मिक वास्तविकताओं के विषय में बात करें। मैं यह मानकर चल रहा हूँ कि आप दोनों को एक ही जैसी ईश्वरविज्ञानीय (theological) सोच रखना चाहिए। यह कोई कृत्रिम अपेक्षा नहीं है। इसका अर्थ है कि यदि आप दोनों किसी महान उद्देश्य को पूर्ण करने के लिए विवाह में एक साथ कन्धे-से-कन्धा मिलाकर बल लगाने जा रहे हैं तो आप को एक ही दिशा में बल लगाना होगा—और वैसे भी विवाह इसी के लिए तो होता है। अर्थात्, परमेश्वर को देखने का आप दोनों का दृष्टिकोण एक जैसा होना चाहिए और ख्रीष्ट को देखने का और पवित्र आत्मा को देखने का और विश्वास को देखने का और प्रेम और उद्धार और स्वर्ग और नरक और शैतान और पाप और पवित्रता और आज्ञाकारिता को देखने का दृष्टिकोण भी—इन सभी बातों को देखने का दृष्टिकोण, अनिवार्य रूप से एक जैसा ही होना चाहिए। अन्यथा, जब आप एक-दूसरे को आत्मिक रूप से अलग-अलग दिशाओं में धकेलेंगे, तो जुए में एक साथ जुतना बहुत कष्टदायक होने लगेगा। यद्यपि जिस बात की होने की अधिक सम्भावना है, वह यह है कि आप बात करना ही बन्द कर देंगे—जो उससे भी अधिक बुरी है। इस कारण, पहल करें और इन दिनों में आत्मिक जीवन के प्रत्येक आयाम में जितना गहराई तक जा सकते हैं, उतना अवश्य ही जाएँ।

4. और अब मैं जिस अगली बात को कहूँगा — जो कि आप दोनों पर लागू होती है — वह यह है कि आप दोनों को इस बात से अवगत होना चाहिए कि आपके विवाह के बने रहने और फलने-फूलने के लिए यीशु के साथ विश्वास और आनन्द और आशा और आज्ञाकारिता में आपकी व्यक्तिगत संगति आधारभूत है। जिन विवाहों को मैंने असफल होते देखा है, वे आत्मिक वास्तविकता के असफल होने के साथ ही असफल हो जाते हैं। इन युगलों में से एक या दोनों सदस्य, यीशु से किसी न किसी रीति से दूर हो जाते हैं। जब ऐसा होता है, तो सामान्य किन्तु दैनिक संघर्षों से निपटने के लिए उनके आत्मिक संसाधन लुप्त होने लगते हैं।

“यीशु के साथ आपकी व्यक्तिगत सहभागिता आपके विवाह को बनाए रखने तथा फलने-फूलने का आधार है।”

तो, बात यह है: केवल यह सोच कर मत रह जाइए कि आप साथ में मिलकर जो करते हैं वह विवाह को दृढ़ करता है। इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण—और सुनने में यह बढ़ा-चढ़ा कर कही गयी बात लग सकती है, किन्तु मैंने इसके विषय में विचार किया है और मैं अभी भी यही कहने जा रहा हूँ कि—इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह है कि आप एक-दूसरे से पृथक होकर क्या करते हैं, जब आप दोनों यीशु से व्यक्तिगत रूप में मिलते हैं और स्वयं को नए सिरे से पवित्र करके बार-बार समर्पित करते हैं, जिससे कि ख्रीष्ट के प्रति आपकी भक्ति, पूर्णतः अडिग हो और आप जब उसका अनुभव करें तो वह पूर्णतया सन्तोषजनक हो। मेरा आशय है कि दोनों पृथक होकर, व्यक्तिगत रीति से, ख्रीष्ट के सम्मुख उपस्थित व्यक्तियों के रूप में समय व्यतीत कर रहे हैं। जब दो लोग ऐसी व्यक्तिगत गहराई में होकर कार्य करते हैं, तो उनका विवाह बना रहेगा। और न केवल बना रहेगा, वरन् आनन्दपूर्ण तथा फलदायी रूप से उन्नति करेगा।

5. अब उन सभी सैकड़ों बातों में से, जिन्हें कहा जाना चाहिए और जिन्हें कहा जा सकता है, यहाँ एक अन्तिम मुख्य बात है जिसे आप दोनों से अवश्य कहा जाना चाहिए। यह मानकर मत चलिए कि आपकी होने वाली दुल्हन, अपने लिए आपके स्नेह के विषय में जानती है और उसे उसका आभास है। इसके विपरीत, आपको इसे अपने होठों से प्रतिदिन कहना होगा। आज से लेकर अपने जीवन के अन्त तक ऐसा करने के लिए स्वयं को समर्पित करें। इसे कहने के नवीन उपाय खोजें—न केवल इसे दिखाएँ, परन्तु इसे कहें भी। बहुत से पुरुष सोचते हैं कि वैसे तो, मैं अपना प्रेम दिखाता ही हूँ। मैं कमा कर लाता हूँ। मैं उसकी देखभाल करता हूँ। मैं उसकी रक्षा करता हूँ (इत्यादि)  हाँ यह सब तो ठीक है, परन्तु इसको उसे दिखाइए भी। उस प्रकार के कार्य करें जो वह चाहती है कि आप करें।

आपके विवाह के बने रहने और फलने-फूलने के लिए यीशु के साथ विश्वास और आनन्द और आशा और आज्ञाकारिता में आपकी व्यक्तिगत संगति आधारभूत है।

परन्तु केवल करें ही नहीं। बातों के द्वारा कहिये भी। ये बातें आप दोनों के लिए सत्य हैं, परन्तु मैं मुख्यतः बसन्त भाई, आपसे बात कर रहा हूँ। प्रचुरता से अपने शब्दों के द्वारा अपनी पत्नी को हर्ष और प्रशंसा और सराहना और स्नेह और आनन्द की अभिव्यक्तियाँ दें। मुझे आशा है कि अपनी विवाह की प्रतिज्ञा में, आप उसे अन्य सभी से बढ़कर संजोएँगे, और शेष सभी को छोड़कर केवल उसी से मिले रहने की प्रतिज्ञा करने जा रहे हैं। उसको संजोने और उससे मिले रहने की बात को प्रतिदिन शब्दों में व्यक्त करें। यह आश्चर्यजनक रूप से गहन और सुखद स्तर पर महान आनन्द और आत्मा के गहरे बन्धन का लाभ प्रदान करेगा।

यह सत्य है कि सुलैमान द्वारा लिखी गई श्रेष्ठगीत की पुस्तक में एक चेतावनी है कि जब तक प्रेम स्वतः न जाग उठे तब तक तुम उसे न जगाना और न उकसाना (श्रेष्ठगीत 2:7)। मुझे लगता है कि इसका तात्पर्य है कि अन्य बातों के अतिरिक्त, आप समय से पहले ही और अनुचित रीति से सुलैमान के गीत में स्वयं को डुबा सकते हैं, क्योंकि साधारण भाषा में यह आपको असामयिक रीतियों से उत्तेजित कर सकती है। परन्तु—मैं जोखिम उठाकर यह कहूँगा कि—आप उस पुस्तक में जाएँ और सीखें कि मैं यहाँ किस विषय पर बात कर रहा हूँ। आप उसके प्रति जिस स्नेह का आभास करते हैं, उसे शब्दों में बोलना और उससे कहना सीखें। आपकी मँगनी के इस समय में परमेश्वर आपको आशीष दे।

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