अनुभव नहीं, परन्तु ख्रीष्ट के ज्ञान की श्रेष्ठता को समझिए।

मनुष्य एक भावनात्मक और तर्कबुद्धि वाला प्राणी है। हम प्रेम, क्रोध, आनन्द और दु:ख की अनुभूति करते हैं। हमें परमेश्वर ने विवेकपूर्ण व्यक्ति बनाया है। इसलिए हम मनुष्य चीजों का अनुभव करने और तथ्य को समझने हेतु सक्षम हैं। अनुभव और समझ में सामंजस्य का होना अति आवश्यक है, क्योंकि अनुभव बिना सही ज्ञान व समझ के व्यर्थ है। केवल अनुभव मात्र अन्धविश्वास की ओर ले जाता है। हमारे अनुभव वास्तविक व सत्य के ज्ञान और समझ का मार्ग व माध्यम नहीं है। 

कई बार ख्रीष्टीय लोग अपने आत्मिक जीवन में, अनुभवों में और सत्य ज्ञान व समझ के मध्य सामंजस्य नहीं बैठा पाते हैं। वे दोनों के बीच सन्तुलन नहीं बना पाते हैं। वे प्रायः या तो भावनाओं के पीछे भाग जाते हैं या फिर वे भावनारहित होकर केवल समझ और ज्ञान की ओर भागने लगते हैं। ये दोनों चरम सीमाएँ समस्याजनक हैं।

क्योंकि जब हम अनुभववाद की एक चरम सीमा की ओर हमारा पूर्ण झुकाव हो जाता है। तब हम अपने अनुभव/भावनाओं को अनुमति देते हैं कि वे ही ख्रीष्ट में हमारे विश्वास को तथा वर्तमान परिस्थिति को परिभाषित करें और समझाएँ। ऐसे में हम भूल जाते हैं कि वास्तव में बाइबल का परमेश्वर कैसा है। ख्रीष्ट के ज्ञान की श्रेष्ठता को भूल जाते हैं। हम उसके वचन को अपने हृदय संचित करने के अलावा विभिन्न प्रकार के करिश्माई अनुभवों की अनुभूति के लिए प्रयत्नशील होकर सत्य के ज्ञान को अनदेखा करने लगते हैं। 

यदि हम ख्रीष्टीय जगत में अपनी दृष्टि डालें, तो पेन्टेकॉस्टिलिज़्म और करिश्माई आन्दोलनों के कारण – लोग ख्रीष्ट और उसके वचन को संचित करने और उसकी खोज करने के स्थान पर लोग अनुभवों के पीछे दिवाने हो गए हैं। यह चिन्ताजनक बात है। क्योंकि वे बाइबलीय ईश्वरविज्ञान की सही समझ से परे हो रहे हैं। 

दूसरी चरम सीमा – केवल ज्ञान व समझ को प्राथमिकता देने का खतरा यह है कि हम भावना व अनुभव रहित हो जाते हैं। और कहने लगते हैं कि विश्वास तो केवल ईश्वरविज्ञान में निहित है, उसका भावनाओं से कोई लेना-देना नहीं है। इस प्रकार से भावनाओं और विश्वास को एक-दूसरे से पृथक कर देते हैं। जबकि यह सच है कि हमारी भावनाओं को हमारे ईश्वरविज्ञान का नेतृत्व नहीं करना चाहिए, हमारे विश्वास के लिए यह महत्वपूर्ण है कि ईश्वरविज्ञान हमारे त्रिएक परमेश्वर के गहरे अनुभव की ओर ले जाए।

यदि हम परमेश्वर के वचन में ध्यान दें और सही से अवलोकन करें तो इस बात को पाएँगे कि वचन के ज्ञान की समझ पर बल देता है न कि हमारे अनुभवों पर। प्रेरित पौलुस बार-बार अपनी पत्रियों में ज्ञान और समझ में बढ़ने हेतु प्रार्थनाएँ करता है। फिलिप्पियों 3: 1-11 में पौलुस अपने सारे पृष्ठिभूमि के सौभाग्यों को छोड़ देता है। वे सब चीजें उसके लिए लाभ की नहीं थीं। वह उन समस्त बातों को हानि समझता है। इससे भी बढ़कर पौलुस यीशु ख्रीष्ट के ज्ञान की श्रेष्ठता के कारण सब बातों को तुच्छ समझता है। वह यीशु ख्रीष्ट के ज्ञान की श्रेष्ठता के लिए सब कुछ छोड़ देता है न कि वह रहस्यमयी और रोंगटे खड़े कर देने वाले अनुभवों के लिए। 

पौलुस कुलुस्सियों 3:16 में हमें ख्रीष्टीय लोगों को अनुभवों की खोज करने के लिए नहीं उत्साहित करता है, वह हमारी भावनाओं को नहीं कुरेदता है, बड़े-बड़े लाऊडस्पीकर लगाकर भावनात्मक वातावरण को उत्पन्न करने के लिए उत्साहित नहीं करता है। परन्तु वह उत्साहित करता है कि “ख्रीष्ट के वचन को अपने हृदय में अधिकाई से बसने दो।” प्रेरित पौलुस बार-बार परमेश्वर के वचन के ज्ञान में, सत्य के वचन की समझ में बढ़ने हेतु प्रोत्साहित करता है और प्रार्थना करता है। 

परमेश्वर के वचन के ज्ञान तथा उसकी सही समझ ही हमें सही ईश्वरविज्ञान और ईश्वरभक्ति के जीवन की ओर ले जाते हैं। जब-जब केवल अनुभव पर बल दिया जाने लगा, तब-तब कलीसियाएँ परमेश्वर के वचन से अलग हो गईं और अनेक अन्धविश्वास, अनेक अनुभव, अनेक विधर्मिताओं का शिकार हो गईं। परिणामस्वरूप धर्मसुधार से पहले कलीसियाएँ परमेश्वर के वचन के सही ज्ञान व समझ से भटक गईं थी। फिर धर्मसुधार आन्दोलन ने कलीसियाओं को पुनः वचन को पढ़ने, और समझने और वचन के प्रचार पर बल दिया।

इसलिए मैं आपको उत्साहित करूँगा कि अनुभवों के पीछे मत भागिए, उसकी खोज मत कीजिए। अनुभव तो संसार के सब धर्म देते हैं। यदि हम वचन के ज्ञान को छोड़ अनुभव के पीछे भागेंगे तो हम धोखा खा जा जाएँगे। हमारे अनुभवों को हमारे विश्वास और ईश्वरविज्ञान का नेतृत्व व नियंत्रित नहीं करना चाहिए। परन्तु हमारे अनुभवों को परमेश्वर के वचन के ज्ञान व ईश्वरविज्ञान के द्वारा नियंत्रित, मार्गदर्शित होना चाहिए। क्योंकि सच्चा ज्ञान सच्चे अनुभव की ओर ले जाता है। और ये सत्य ज्ञान ख्रीष्ट का ज्ञान है जो कि सब बातों तथा सब प्रकार के अनुभवों से श्रेष्ठ है।

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