प्रतिदिन के जीवन में पवित्रता में कैसे बढ़ें?

प्रतिदिन के जीवन में पवित्रता में बढ़ना एक मसीह के लिए अर्थपूर्ण / विचारपूर्ण विषय होना चाहिए। यह सम्भव है कि जीवन, परिवार, नौकरी, व्यवसाय, पढ़ाई इत्यादि से जुड़े हुए कुछ आवश्यक विषय हैं जो हमारे सोच-विचार को प्रभावित करती हैं। हमारा समय उन पर विचार करने में एवं चिन्ता करने में व्यतीत होता है। भले ही ऐसा करना अनुचित न हो, पर यह सम्भव है कि हमारा अधिकांश समय इन विषयों पर सोचने और चिन्ता करने में व्यतीत हो जाए। हम इस संसार में रहते तो हैं, पर हम परमेश्वर के द्वारा एक पवित्र प्रजा होने के लिए ज्योति में बुलाये भी गए हैं (1 पतरस 2:9)। हमें यह स्मरण रखना होगा कि परमेश्वर ने हमें अपने वचन के द्वारा पवित्रता से जुड़ी कुछ आज्ञाओं और दायित्वों को भी दिया है –

1 पतरस 1:15 -” पर जैसा तुम्हारा बुलाने वाला पवित्र है, वैसे ही तुम भी समस्त आचरण में पवित्र बनो”।

इब्रानियों 12:14 – ….. “उस पवित्रता के खोजी बनो, जिस के बिना प्रभु को कोई भी नहीं देख पाएगा”।

हम इस संसार में रहते तो हैं, पर हम परमेश्वर के द्वारा एक पवित्र प्रजा होने के लिए ज्योति में बुलाये भी गए हैं

 सम्भवतः हम प्रतिदिन बाइबल पढ़ते हों और प्रार्थना भी करते हों, पर पवित्रता से जुड़े आज्ञा और दायित्व के कारण हमें निरन्तर और प्रतिदिन पवित्रता में बढ़ना होगा। हमारे पवित्र परमेश्वर का हमारे जीवन के निमित्त यह आज्ञा भी है और इच्छा भी है। तो हम प्रतिदिन के जीवन में पवित्रता में कैसे बढ़ें? बाइबल पढ़ने और प्रार्थना करने के साथ साथ हमें कुछ प्रयास और अभ्यास व्यक्तिगत एवं सामूहिक रूप से करने की आवश्यकता है जिससे हम प्रतिदिन के जीवन में पवित्रता में बढ़ सकेंगे। इस लेख में हम इस विषय को देखेंगे –

प्रतिदिन यह स्मरण रखें कि परमेश्वर पवित्र और न्यायी है । 
प्रतिदिन पवित्रता में बढ़ने को केवल कुछ कार्यों और क्रियाओं से जोड़ने से पहले हमें यह स्मरण करते रहना अति आवश्यक है कि परमेश्वर न्यायी है। यदि हम यह भूल जाते हैं या इसको लेकर गम्भीर नहीं हैं, तो हम पवित्रता में बढ़ने के लिए इच्छुक भी नहीं होंगे। और यदि हम इच्छुक नहीं हैं तो हमारे लिए प्रतिदिन पवित्रता में बढ़ना एक विकल्प बनकर रह जाएगा। क्योंकि परमेश्वर न्यायी है, इसलिए वह पवित्रता को बहुत गम्भीरता से लेता है। क्योंकि परमेश्वर पवित्र है वह अपवित्रता / अशुद्धता के साथ कोई मेल नहीं रख सकता है। उसका क्रोध केवल एक पवित्र / शुद्ध / निष्कलंक बलिदान के द्वारा ही शांत हो सकता था। पुराने नियम में वह केवल एक पवित्र बलिदान ग्रहण करता था, नए नियम में यीशु ख्रीष्ट ने पवित्र बलिदान बनकर अपने आप को अर्पण और परमेश्वर के प्रकोप को शान्त कर दिया है। अब हमें अपने आप को एक जीवित, पवित्र और ग्रहणयोग्य बलिदान के रूप में (रोमियों 12:1) परमेश्वर को समर्पित करना है। यह आवश्यक है कि हम अपने प्रतिदिन के व्यवहारिक जीवन को इस विचार पर आधारित करते रहें। यह एक दिन में नहीं होगा पर यह हमारा नित्य प्रयास होना चाहिए जिसके फलस्वरूप यह हमारा नित्य अभ्यास भी बन जाएगा। रोमियों 12:1 हमारे लिए एक मापदंड / मानक बन जाता है जिसके आधार पर हम प्रतिदिन अपने जीवन में अपने चुनाव को करेंगे। यह स्मरण करते हुए कि परमेश्वर पवित्र और न्यायी है, हम पवित्र – अपवित्रता के मध्य, शुद्ध – अशुद्ध के मध्य चुनाव कर सकेंगे और प्रतिदिन पवित्रता में बढ़ सकेंगे। 

यीशु ख्रीष्ट ने पवित्र बलिदान बनकर अपने आप को अर्पण और परमेश्वर के प्रकोप को शान्त कर दिया है। अब हमें अपने आप को एक जीवित, पवित्र और ग्रहणयोग्य बलिदान के रूप में परमेश्वर को समर्पित करना है।

प्रतिदिन परमेश्वर के पवित्र और भले भय में बने रहना। 
यह सत्य है कि परमेश्वर हमसे प्रेम रखते हैं, पर यह भी सत्य है कि उसका प्रेम एक अनियंत्रित और अप्रतिबंधित प्रेम है। वह अपने किसी एक चरित्र / गुण को प्रकट करने के लिए अपने अन्य चरित्रों / गुणों को अनदेखा नहीं कर सकता है। इसीलिए वह प्रेमी भी है और भययोग्य भी है। हमारा भय परमेश्वर के प्रति इसलिए नहीं होना चाहिए क्योंकि वह डरावना और कठोर है। ऐसा भय पवित्र और भला नहीं होता है। हम किसी दबाव या बोझ में आकर ऐसा भय नहीं रखते। परमेश्वर की पवित्रता, महानता, प्रधानता, सम्प्रभुता के कारण हम उससे पवित्र और भले भय रखते हैं। यह भय हमें प्रतिदिन पवित्रता में बढ़ाता है। यह पवित्र और भला भय हमारी सहायता करता है कि हम अपवित्र वस्तु – कार्य – विचार – संगति इत्यादि को त्यागें और पवित्र वस्तु – कार्य – विचार – संगति को ग्रहण कर सकें। इसी पवित्र और भले भय ने युसूफ को व्यभिचार के पाप के ऊपर जय पाने के लिए सहायता किया और उसने कहा कि “मै ऐसी बड़ी दुष्टता करके परमेश्वर के विरोध में कैसे पाप कर सकता हूँ” (उत्पत्ति 39:9)। यदि हमें प्रतिदिन पवित्रता में बढ़ना है तो हमारे जीवन में प्रतिदिन परमेश्वर के प्रति उस पवित्र और भले भय का होना भी आवश्यक है। प्रतिदिन जब हम परमेश्वर के वचन को पढ़ते और अध्ययन करते हैं, तो उसका वचन हमारे अंदर उसके भले और पवित्र भय को भरता है। यह भय हमें बुद्धि देता है कि हम अपने प्रतिदिन के जीवन में पाप के प्रलोभन में न गिरें, बुराई से दूर रहें, पापमय विचारों के ऊपर जय प्राप्त कर सकें और पवित्रता में बढ़ें। 

स्थानीय कलीसिया के लोगों के साथ जवाबदेहिता और सहभागिता में जुड़ना। 
प्रतिदिन पवित्रता में बढ़ने के लिए हमारा सामूहिक जीवन जो हमारे स्थानीय कलीसिया से जुड़ा हुआ है, वह भी आवश्यक है। परमेश्वर हमें एक स्थानीय कलीसिया से जोड़ता है क्योंकि परमेश्वर जानता है कि हमें प्रतिदिन पवित्रता में बढ़ने के लिए दूसरे विश्वासियों की आवश्यकता है। यह विश्वासी हमें स्थानीय कलीसिया में मिलते हैं। यिर्मयाह 17:9  के अनुसार “मन सब वस्तुओं से अधिक धोखेबाज़ होता है, और असाध्य रोग से ग्रस्त है; उसे कौन समझ सकता है ?” इस धोखे / छल – कपट से भरा हमारा मन हमारे प्रतिदिन के जीवन में पवित्रता की ओर बढ़ने में प्रायः बाधाओं को लाता है। इस कारण हमें अन्य लोगों की आवश्यकता है। परमेश्वर स्थानीय कलीसिया में अन्य विश्वासियों के द्वारा हमारे लिए सहायता का प्रावधान करता है। हम कलीसिया में किसी दूसरे विश्वासी या कुछ विश्वासियों के साथ एक जवाबदेहिता में जुड़ सकते हैं। उनके साथ हम पवित्रता से जुड़े अपने संघर्ष, चुनौतियों को साझा कर सकते हैं, प्रार्थना के लिए मिल सकते हैं। इस प्रकार की संगति और उत्तरदायी होने के द्वारा हम अनुशासन में भी बढ़ सकते हैं जो हमें प्रतिदिन के जीवन में पवित्रता में बढ़ने के लिए सहायता करेगा। इस संगति में हम अपने जीवन में पवित्रता से सम्बन्धी विषयों को लेकर पारदर्शिता रख सकते हैं और अपने संघर्षों को बता सकते हैं जिससे  लोग हमें आत्मिक, व्यावहारिक सुझाव दे सकते हैं और हमारे लिए प्रार्थना कर सकते हैं। इस प्रकार हम इस संगति में उत्तरदायी होने और अनुशासन का पालन करते हुए प्रतिदिन पवित्रता में बढ़ सकते हैं। 

अतः पवित्रता में बढ़ना प्रतिदिन का अभ्यास है। यह एक दिन में पूरा नहीं हो जाता है और न ही हम इसे कुछ दिनों में सीख जाते हैं। परमेश्वर ने हमें जगत कि उत्पत्ति से अपने अभिप्राय में चुन लिया है, वह हमारे पवित्रीकरण में हमारी सहायक भी भी करेगा। उसकी यह इच्छा है कि हम पवित्रता को गम्भीरता से लें क्योंकि वह स्वयं पवित्र है।

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