अपनी कलीसिया के अगुवों से प्रेम कीजिए।

परमेश्वर प्रेमी है। उसने अपने प्रेम में होकर ख्रीष्ट में बुलाया है कि हम कलीसिया में एक-दूसरे से प्रेम करें। इसके साथ ही परमेश्वर ने उपहार के तौर पर हमारे लिए प्राचीन/अगुवे/एल्डर/बिशप/पास्टर दिए हैं जो कलीसिया के लाभ के लिए हैं। इसलिए कलीसिया के भाग होने के तौर पर हम सब विश्वासियों का उत्तरदायित्व है कि हम अपने अगुवों से प्रेम करें। आइये हम कुछ बातों पर विचार करें जिन्हें करने के द्वारा हम अगुवों से अपने प्रेम को प्रकट कर सकते हैं। 

अपनी प्रार्थनाओं में उन्हें स्मरण रखिए – प्राय: हमारी प्रार्थनाएं हमारी आवश्यकताओं की सूची इतनी लम्बी होती है कि हमें दूसरों के विषय में अधिक सोच ही नहीं पाते हैं। कलीसिया में प्रभु ने अगुवे दिये हैं जो प्रचार के कार्य एवं प्रार्थना में लगे रहें। सप्ताह के मध्य जब वे लोगों से मिलते हैं, प्रचार की तैयारी करते हैं, कलीसिया के लोगों की चिन्ता करते हैं तथा अन्य प्रबंधन का कार्य करते हैं। वे हमारे आत्मिक जीवन की चिन्ता करते हैं इसलिए हमें उनके लिए प्रार्थना करने की आवश्यकता है कि वे प्रभु की सहायता से चरवाही का कार्य प्रभु के भय में परिश्रमपूर्ण कर सकें। हमारी कलीसिया में अगुवे भी हमारे जैसे ही हैं, उनके अन्दर भी बचा हुआ पाप है। वे भी पाप से संघर्ष करते हैं। वे भी सेवा करते हुए कभी कभी हताश, निराश और सेवा में कई कारणों से दुखी हो सकते हैं। उनके सामने भी विभिन्न प्रकार के प्रलोभन है। इसलिए हमें आवश्यकता है कि उनके लिए नियमित रीति से प्रार्थना करते रहें। 

स्वयं को उनके अधीन कीजिए – परमेश्वर ने कलीसिया में अगुवे देिए हैं जो परमेश्वर के झुण्ड की रखवाली करते हैं, सम्भालते हैं, चरवाही करते हैं, मार्गदर्शन करते हैं। और यह उत्तरदायित्व उन्हें परमेश्वर के द्वारा मिला है और उनका एक दिन कलीसिया के प्रत्येक व्यक्ति का लेखा देना है (इब्रानियों 13:17)। उनके इस चरवाही के कार्य को आनन्द से करने देने के लिए हमें आवश्यकता है कि हम प्रेम में होकर उनकी अधीन रहें। जिससे कि कलीसिया के संचालन, अगुवाई में बाधा न आए और वे हमारे जीवन को वचन के अनुसार प्रभु में बढ़ने में सहायता कर सकें। जब वे हम पर प्रभुता न जताते हुए हमारी चिन्ता करते हैं, तो हमें प्रभु में उनके अधीन होना है। परमेश्वर की दृष्टि में उचित है कि हम कलीसिया में उनके अधीन रहते हुए शिक्षा प्राप्त करें। अगुवों के अधीन रहना सरल नहीं है किन्तु प्रभु हमारी सहायता करे कि हम स्वयं को उनके अधीनता में रहते हुए कलीसियाई रीति से जीवन जियें।

उनकी आवश्यकताओं का ध्यान रखिए –  कलीसिया का उत्तरदायित्व है कि अगुवों की आवश्यकता का वे ध्यान रखें। कई बार कलीसिया में लोग अगुवों से अपेक्षा ही करते हैं किन्तु उनकी सहायता के विषय में नहीं सोचते। उनका भी अपना परिवार है, उनकी भी आवश्यकताएँ हैं, उनको भी विभिन्न प्रकार से आत्मिक, भौतिक, भावनात्मक साथ की आवश्यकता होती है। हम कलीसिया में बुलाये गए हैं कि कलीसिया में हमारे मध्य जो अगुवे कठिन परिश्रम करते हैं, जो हमारे ऊपर नियुक्त हैं, जो शिक्षा देते हैं, उनके कार्य के कारण प्रेमपूर्वक उनका सम्मान करें (1 थिस्स 5:12-13)। यह बाइबल की शिक्षा है कि जो प्राचीन अच्छा प्रबन्ध करते हैं वे दो गुने आदर के योग्य समझे जाएं, विशेषकर वे जो प्रचार और शिक्षा- कार्य में कठिन परिश्रम करते हैं (1 तीमुथियुस 5:17-18)। हमारे अगुवे कलीसिया में प्रभु द्वारा दिए गए दान हैं इसलिए आवश्यक है कि हम उन्हें उत्तम वस्तुओं में साझीदार बनाएं और आर्थिक रीति से उनकी सहायता करें (गलातियों 6:6)।

उनको उत्साहित कीजिए – प्राय: हम सोचते हैं कि हम अगुवों द्वारा उत्साहित किए जाएँ। किन्तु हम अधिकाँशत: अगुवों के जीवन के विषय में नहीं सोच पाते। हमें अपने अगुवों की निर्बलताओं के साथ भी धैर्य रखने की आवश्यकता है। प्राय: हम अपने पाप के विषय में इतने गम्भीर नहीं होते, किन्तु जब हमारे अगुवों से कोई त्रुटि पूर्ण व्यवहार, कार्य, निर्णय होता है तो हमारे लिए उन्हें क्षमा करना बहुत मुश्किल होता है। किन्तु स्मरण रखिए प्रेम असंख्य पापों को ढ़ाप देता है (1 पतरस 4:8)। हमें अगुवों से प्रेम करना है। जब हम चरवाही करने के अधिकार में नहीं हैं तो यह बहुत ही सरल होता है कि हम बहुत सारे नकारात्मक समीक्षा करें, उन पर बहुत से प्रश्न उठाएँ। यदि वास्तव में उनके जीवन में बाइबल के विपरीत कोई बात हम देखते हैं तो हम उनसे बात कर सकते हैं। परन्तु स्मरण रखें कि वे भी हमारे जैसे ही विश्वासी हैं। हमें उनके परिश्रम, लोगों के प्रति उनकी चिन्ता, उनके प्रचार, उनके परामर्श, मेहमानवाज़ी, कलीसिया के प्रति उनके समर्पण और सेवा के लिए उनके प्रति धन्यवादी होना चाहिए। हमें उनकी समस्याओं के मध्य उन्हें सम्भालना चाहिए। यह सरल है कि हम अगुवों के जीवन में केवल कमियाँ ढ़ूँढ़ने का प्रयास करें किन्तु हमें उनकी निर्बलताओं के बाद भी उनकी त्यागपूर्ण सेवा के लिए उन्हें उत्साहित करना चाहिए। 

वह अन्तिम समय कब था, जब आपने अपने अगुवों के लिए प्रार्थना किया? वह अन्तिम समय कब था जब आपने उन्हें सेवकाई में कठोर परिश्रम के लिए प्रोत्साहित किया? वह अन्तिम समय कब था जब आपने उनके परिवार की आवश्यकताओं पर ध्यान दिया? यदि हम और आप ऐसा कर रहे हैं तो प्रभु जी का धन्यवाद हो। यदि हम ऐसा करने से चूके हैं तो आइये हम प्रार्थना करें कि प्रभु हम पर दया करे कि हम अपने अगुवों से वास्तव में प्रेम कर सकें और अपने शब्दों एवं जीवन के द्वारा उनके प्रति कृतज्ञता को प्रकट करें।  

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