कोविड-19 जैसी विपदाओं के विषय में बाइबल हमें क्या सिखाती है?

जब हम विपदाओं, महामारी, तथा अन्य प्रकार की चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में होकर जाते हैं, तो उस समय हमारे मनों में अलग-अलग प्रकार के प्रश्न आते हैं। कई बार हम परमेश्वर पर दोषारोपण करने लगते हैं कि ये विपदाएं क्यों आती हैं, इन बातों को लेकर कई बार हम परमेश्वर पर कुड़कुड़ाने लगते हैं या फिर सन्देह करने लगते हैं कि कहीं ऐसा तो नहीं कि परमेश्वर इस विपदा के द्वारा हमें नाश करना चाहता है? उस समय, जब हम इस प्रकार के प्रश्नों और बातों से संघर्ष करें, तो हमें स्वयं एक प्रश्न पूछना चाहिए और बाइबल में खोजना चाहिए कि परमेश्वर इन विपदाओं के द्वारा क्या सिखाता है?

एक विश्वासी होने के नाते, इन बातों को जानने के लिए हमें परमेश्वर के वचन में जाना आवश्यक है। क्योंकि परमेश्वर का वचन ही हमारा आधार है। परमेश्वर का वचन ही हमें निश्चित रूप से सही उत्तर देता है। इसलिए, आइए हम इस बात को जानें कि विपदाओं के बारे में बाइबल हमें क्या सिखाती है।

हम इस लेख के द्वारा मुख्यतः तीन बातों को सीखेंगे:  

1. बाइबल हमें सिखाती है कि विपदाएं पाप के परिणाम स्वरूप परमेश्वर का न्याय है।
परमेश्वर ने आरम्भ में अर्थात् सृष्टि के समय सब कुछ अच्छा बनाया था। परमेश्वर ने सब कुछ बनाने के पश्चात् कहा, “देखो, वह बहुत अच्छा है” (उत्पत्ति 1:30)। परन्तु उत्पत्ति 3 में हम देखते हैं कि मनुष्य के विद्रोह के कारण संसार में पाप आता है। पाप के आने के पश्चात सब कुछ बदल जाता है। पाप सम्पूर्ण सृष्टि को प्रभावित कर देता है। पाप के कारण मनुष्य और परमेश्वर के मध्य अलगाव हो जाता है। न केवल मनुष्य परन्तु सम्पूर्ण पृथ्वी पाप के कारण श्राप के अधीन हो गई। उस समय से आज तक, सम्पूर्ण मानव जाति प्राकृतिक विपदाओं जैसे, बाढ़, भूकम्प, अकाल तथा अन्य प्रकार के महामारियों का सामना करती आ रही है। 

उदाहरण के लिए, उत्पत्ति 6:5 में देखते हैं कि परमेश्वर लोगों के पापों के कारण उन पर विनाश का दण्ड लाता है। “तब यहोवा ने देखा कि पृथ्वी पर मनुष्य की दुष्टता बहुत बढ़ गई है, और उसके मन का प्रत्येक विचार निरन्तर बुरा ही होता है। ” इसके पश्चात् हम देखते हैं कि परमेश्वर पृथ्वी पर से नूह तथा उसके परिवार को छोड़कर जलप्रलय के द्वारा दुष्टों को नाश कर देता है, क्योंकि परमेश्वर पवित्र है इसलिए वह पाप को अनदेखा नहीं कर सकता है। मनुष्य के विद्रोह और पाप के कारण ही परमेश्वर मिस्रियों पर भी दस महामारियों को भेजता है, ताकि वे परमेश्वर के लोगों को जाने दें ताकि वे परमेश्वर की आराधना कर सकें। और पिछले कई हज़ार वर्षों से परमेश्वर इस पृथ्वी पर अलग-अलग रीति से अकाल, भूकम्प तथा महामारियों के द्वारा इस बात को प्रकट करता है कि पाप और उसका परिणाम बहुत भयंकर है। इसलिए जब तक हम इस संसार में हैं, हम महामारी, भूकम्प, विभिन्न आपदाओं का सामना करने से मुक्त नहीं होंगे। यीशु ख्रीष्ट के द्वारा हमारे पास यह आशा है कि जब यीशु ख्रीष्ट इस संसार में पुनः आएगा, तब सब कुछ नया कर देगा। उस समय पृथ्वी पर कोई महामारी नहीं रहेगी, कोई दुख नहीं होगा, प्रत्येक विश्वासी सब दुखों से मुक्त होकर अनन्त काल के लिए परमेश्वर की आराधना करेंगे। 

हम इस संसार में दुख और पीड़ा का सामना करेंगे और ये सब हमें परमेश्वर से दूर नहीं करती हैं, परन्तु ये हमें और भी अधिक परमेश्वर के निकट लाती है।

2. बाइबल हमें सिखाती हैं कि विपदाएं हमारे जीवन के अस्थायित्व का संकेत हैं।
जब संसार में प्राकृतिक आपदाएं, संकट, दुख, महामारी इत्यादि आती हैं, तो सबसे पहले हमारा मानवीय जीवन मृत्यु के भय और आतंक से ग्रसित हो जाता है। और ये विपदाएं हमारे जीवन की वास्तविकता को दिखा देती हैं कि हमारा जीवन अस्थायी है। यह कभी भी नाश हो सकता है। 

इस संसार में हमारा जीवन कुछ समय का है। हज़ारों लोग सुबह उठकर यह नहीं जानते हैं कि उस दिन उनके साथ क्या होगा। बाइबल हमें बताती है कि “हमारा जीवन भाप के समान है, जो थोड़ी देर के लिए दिखाई देती है, और फिर अदृश्य हो जाती है” ( यशायाह 40:6-8,याकूब 4:14)।  न केवल हमारा जीवन अस्थायी है परन्तु जिस संसार में हम रहते हैं वह और यहां पर सभी वस्तुएं भी अस्थायी हैं। मृत्यु वास्तविक है। यह पाप के कारण लोगों पर आ गई और मनुष्यों पर मृत्यु ने अधिकार किया। अब प्रत्येक व्यक्ति को एक न एक दिन मृत्यु का सामना करना है। 

परन्तु हम जो यीशु ख्रीष्ट पर विश्वास करते हैं हम मरेंगे, फिर भी जीएंगे। क्योंकि यीशु ख्रीष्ट ने कहा “पुनरुत्थान और जीवन मैं ही हूँ। जो मुझ पर विश्वास करता है यदि वह मर भी जाए फिर भी जीएगा।” जब यीशु मसीह पुनः आएगा निश्चय ही हम जिलाए जाएंगे। अब हमारे पास आशा है हमें अनन्तकाल के लिए जीएंगे। पौलुस 2 कुरिन्थियों 5:1 में इस प्रकार कहता है, “क्योंकि हम जानते हैं कि यदि हमारा पृथ्वी पर तम्बू सदृश घर गिरा दिया जाए तो परमेश्वर से हमें स्वर्ग में ऐसा भवन मिलेगा जो हाथों से बना हुआ नहीं, परन्तु चिरस्थायी है। ” हमारी देह और जीवन कुछ समय का है, परन्तु मृत्यु के बाद जो देह हमें मिलेगी वह चिरस्थायी होगी, जो कभी न मिटेगी और हम सब उस देह में सर्वदा के लिए परमेश्वर की आराधना करेंगे। 

3. बाइबल हमें सिखाती है कि इन विपदाओं के मध्य हमारे पास एक जीवित आशा है।
बाइबल में विपदाएं हमें यह भी स्मरण दिलाती है कि यद्यपि इस संसार में पीड़ा, शोक और क्लेश है परन्तु एक दिन जब यीशु ख्रीष्ट पुन: वापस आएंगे वह सब कुछ नया कर देंगे। इस पृथ्वी को वह पूर्णतया से नई सृष्टि में परिवर्तित कर देंगे। यूहन्ना प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में नई सृष्टि को इस प्रकार वर्णन करता है, “देखो, परमेश्वर का डेरा मनुष्यों के बीच में है, वह उनके मध्य निवास करेगा, वे उसके लोग होंगे और परमेश्वर स्वयं उनके मध्य रहेगा और वह उनके सब आंसू पोंछ डालेगा; फिर न कोई मृत्यु रहेगी न कोई शोक, न विलाप और न पीड़ा रहेगी” (प्रकाशितवाक्य 21:3-4)। हमारे लिए कितनी आनन्द की बात होगी हम इन सब पीड़ा और पाप से सर्वदा के लिए मुक्त हो जाएंगे, और हम अनन्तकाल के लिए परमेश्वर हमारे मध्य निवास करेंगे और हम उसकी आराधना करेंगे। परमेश्वर का धन्यवाद हो इस जीवित आशा के लिए। 

इस पतित संसार में, यद्यपि कई प्रकार की विपदाएं, समस्याएं हैं और आती रहेंगी। परन्तु हम मसीहियों को इन सभी विपदाओं और समस्याओं को देखकर भयभीत नहीं होना है क्योंकि यह सभी विपदाएं हमें स्मरण दिलाती हैं कि हम अभी भी एक पतित संसार में हैं। हम इस संसार में दुख और पीड़ा का सामना करेंगे परन्तु यह सब हमें परमेश्वर से दूर नहीं करती हैं परन्तु हमें और भी अधिक निकट लाती है। दुख और पीड़ा और सताव हमारे लिए अनुग्रह के कारण हैं। पौलुस कहता है कि “ख्रीष्ट के कारण तुम पर यह अनुग्रह हुआ कि तुम उस पर केवल विश्वास ही न करो वरन् उसके लिए कष्ट भी सहो” (फिलिप्पियों 1:29)। दुख और पीड़ा हमें परमेश्वर की पवित्रता में बढ़ने के लिए सहायता करती है। परमेश्वर इन सब में हमें सिखाता है कि कैसे हमें उस पर भरोसा रखना है, कैसे हमें उस से प्रार्थना करना है। इन सब के द्वारा परमेश्वर पवित्र आत्मा हमें यीशु ख्रीष्ट के समान बनने में सहायता करता है ताकि हम एक दिन उसके सामने पवित्र और निर्दोष हो सकें। 

इसलिए मेरे मित्रों जब हम और आप इस समय कोरोना महामारी में होकर जा रहे हैं, हमें एक विश्वासी होने नाते परमेश्वर के वचन पर भरोसा रखना है। क्योंकि परमेश्वर का वचन ही है जो हमें प्रत्येक परिस्थिति में प्रभु पर निर्भर होने में सहायता करता है। परमेश्वर का वचन ही है जो हमें हमारे कठिन परिस्थितियों में लड़ने के लिए साहस प्रदान करता है। परमेश्वर का वचन ही है जो हमें बताता है कि प्रत्येक परिस्थिति में हमारे जीवन का उद्देश्य परमेश्वर की महिमा करना है। परमेश्वर का वचन ही है जो हमें जीवित आशा देता है। इसलिए प्रत्येक परिस्थिति में परमेश्वर के वचन को थामे रहिए, उस पर मनन करते रहिए।