यीशु के दुःख-भोग के दिन

प्रायः ख्रीष्टीय लोग प्रति वर्ष यीशु के दुःख-भोग के दिन को मनाते हैं। वे यीशु के बलिदान को स्मरण करते हैं, स्वयं के पापों पर विचार करते हैं और प्रार्थना करते हैं। उपवास रखते हैं या कम भोजन लेते हैं, और मनोरंजन से अपने आपको दूर रखते हैं। परन्तु यह सब एक परम्परा के रूप में मनाया जाता है और उसके पश्चात वे वापस अपने सामान्य जीवन शैली में लौट जाते हैं। परन्तु, यीशु के दुःख-भोग का कारण क्या था? इसके 4 कारणों को हम इस लेख में देखेंगे –    

1. यह एक पूर्व-निर्धारित योजना के अनुसार था। यशायाह 53:3,5 के अनुसार मसीहा का अपने लोगों के समस्त अपराध और पाप क्षमा हेतु कुचला जाना निश्चित था। हमें शांति प्रदान करने के लिए ही उसने दुःख सहा। लूका 9:22 के अनुसार उसने अपने चेलों से कहा की उसका दुःख उठाना आवश्यक है अर्थात यीशु का दुःख उठाना हमारे उद्धार के लिए परमेश्वर की योजना थी।  

2. यह हमारे प्रति उसके प्रेम का प्रदर्शन था। यूहन्ना 15:13 और मत्ती 20:28 के खण्ड स्पष्ट रीति से उस प्रेम का वर्णन करते हैं जो प्रेम यीशु हमारे प्रति रखता है। उसका दुःख-भोग एक दुर्घटना नहीं परन्तु उसका दुःख-भोग हमारे साथ व्यक्तिगत रीति से जुड़ा हुआ है। जब हम पाप में मरे हुए थे, उसमें डूबे हुए थे और विनाश की ओर जा रहे थे, तो हमें बचाने के लिए उसने दुःख सहा और अपने प्राण को दे दिया। यह, हमारे प्रति उसके महान प्रेम का प्रदर्शन था। 

3. यह हमारे विरुद्ध में विधियों के अभिलेख को मिटाने के लिए था। कई ख्रीष्टीय लोग इसे समरण करते हुए भले कर्म करने लगते हैं। उनके लिए यह एक उचित समय होता है जब वो धर्म के कार्य करें और अपने उद्धार को सुनिश्चित करें। लेकिन यशायाह 64:6 के अनुसार परमेश्वर के सामने हमारे धर्म के काम मैले चिथड़ों के समान हैं। विधियों के अभिलेख को हम धर्म के कार्यों से मिटा नहीं सकेंगे। उद्धार की प्राप्ति भले कर्मों के द्वारा नहीं है। इसलिए यीशु ने हमारे लिए दुःख और क्रूस की मृत्यु को सहा, हमारे अपराधों को क्षमा किया और हमारे विरुद्ध में विधियों के अभिलेख को मिटा डाला (कुलुस्सियों 2:14)।             

4. यह हमें परमेश्वर के समीप लाने के लिए था। कई लोगों यीशु के दुःख-भोग को केवल एक ऐसी घटना के रूप में देखते हैं जिसके द्वारा उनकी किसी बड़ी समस्या का समाधान हो गया। पहले वो निराशा, समस्या, गरीबी और बीमारी में थे, जिसका निवारण अब उन्हें मिल गया। परन्तु, यीशु के दुःख-भोग का कारण यह नहीं था। 1 पतरस 3:18 के अनुसार यीशु हम जैसे अधर्मियों के लिए मरा जिस से वह हमें परमेश्वर के समीप ले आए। 

अतः यीशु के दुःख-भोग के दिन को एक पारम्परिक दृष्टिकोण से न देखकर उसके वास्तविक महत्व और कारण को समझें। हम यीशु के बलिदान के लिए सच्चे हृदय से धन्यवादी, कृतज्ञ बनें और अपने पापों को गम्भीरता से लेते हुए एक निरन्तर पश्चात्ताप का जीवन भी जिएँ।

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मोनीष मित्रा
मोनीष मित्रा

परमेश्वर के वचन का अध्ययन करते हैं और मार्ग सत्य जीवन के साथ सेवा करते हैं।

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