परमेश्वर से बात करें, केवल उसके विषय में नहीं
<a href="" >जॉन पाइपर द्वारा भक्तिमय अध्ययन</a>

संस्थापक और शिक्षक, desiringGod.org

भजन 23 का ढाँचा शिक्षाप्रद है। 

भजन 23:1-3 में दाऊद परमेश्वर को “वह” कहता है:

यहोवा मेरा चरवाहा है…

वह मुझे बैठाता है…

वह मेरी अगुवााई करता है…

वह मेरे जी में जी ले आता है।

तब 4 और 5 पद में वह परमेश्वर को “तू” कहता है:

मैं हानि से नहीं डरूँगा क्योंकि तू मेरे साथ रहता है;

तेरी छड़ी और तेरी लाठी से मुझे शान्ति मिलती है।

तू मेरे लिए मेज़ लगाता है।

तू ने मेरे सिर पर तेल उण्डेला है।

तब पद 6 में वह पुनः परमेश्वर को “वह” कहता है:

मैं यहोवा के घर में सर्वदा वास करूँगा।

इस ढाँचे से जो शिक्षा हम ले सकते हैं वह यह है कि बिना परमेश्वर से  बात किए उसके विषय में अधिक बात करना अच्छा नहीं है।

प्रत्येक ख्रीष्टीय कम से कम एक अप्रवीण ईश्वरविज्ञानी है — अर्थात्, एक ऐसा व्यक्ति जो परमेश्वर के चरित्र और उसके मार्गों को समझने का प्रयास करता है और उसके बाद उसे शब्दों में व्यक्त करता है। यदि हम छोटे ईश्वरविज्ञानी नहीं हैं, तो हम कभी भी एक दूसरे से, या परमेश्वर से, परमेश्वर के विषय में कुछ भी नहीं कहेंगे, और हम एक दूसरे के विश्वास में बहुत ही कम वास्तविक सहायता करने पाएँगे।

परन्तु भजन 23 और अन्य भजनों में मैंने दाऊद से सीखा है कि मुझे अपने ईश्वरविज्ञान में प्रार्थना को जोड़ना चाहिए। परमेश्वर के विषय में बात करते समय मुझे प्रायः रुककर परमेश्वर से बात करनी चाहिए।

ईश्वरविज्ञानीय वाक्य “परमेश्वर उदार है,” के थोड़ी ही दूरी पर इस प्रार्थनापूर्ण वाक्य को आना चाहिए, “हे परमेश्वर, आपकी उदारता के लिए धन्यवाद।”

“परमेश्वर महिमामय है,” के तुरन्त बाद यह विचार आना चाहिए, “मैं आपकी महिमा को सराहता हूँ।”

ऐसा ही होना चाहिए, यदि हम अपने हृदयों में परमेश्वर की वास्तविकता का आभास करने के साथ ही इसे अपने मस्तिष्क में सोच रहे हैं और अपने होंठों से इसका वर्णन भी कर रहे हैं।

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