प्राण का अन्तिम भोज
जॉन पाइपर द्वारा भक्तिमय अध्ययन

जॉन पाइपर द्वारा भक्तिमय अध्ययन

संस्थापक और शिक्षक, desiringGod.org

मैंने यहोवा से एक वर माँगा है, मैं उसी के यत्न में लगा रहूँगा: कि मैं अपने जीवन भर यहोवा के भवन में ही निवास करने पाऊँ, और उसके मन्दिर में उसका ध्यान करता रहूँ। (भजन 27:4)

परमेश्वर प्राण की पश्चात्तापी लालसा के प्रति अनुत्तरदायी नहीं है। वह आता है और पाप का भार उठाता है और हमारे हृदय को प्रसन्नता और कृतज्ञता से भर देता है। “तू ने मेरे शोक-वस्त्र को उतारकर उल्लास का कमरबन्द बाँधा है, कि मेरा हृदय तेरी स्तुति करता रहे। हे मेरे परमेश्वर यहोवा, मैं सदा-सर्वदा तेरा धन्यवाद करता रहूँगा!” (भजन 30:11-12)।

परन्तु हमारा आनन्द केवल कृतज्ञता में पीछे की ओर देखने से ही नहीं उदित होता है। परन्तु यह आशा में आगे की ओर देखने से भी उठता है: “हे मेरे प्राण, तू निराश क्यों है? और भीतर ही भीतर तू व्याकुल क्यों? परमेश्वर पर आस लगाए रह; मैं तो उसकी स्तुति करूँगा जो मेरा उद्धारकर्ता, मेरा परमेश्वर है” (भजन 42:5-6)।

“मैं यहोवा की बाट जोहता हूँ, हाँ, मेरा प्राण उसी को चाहता है, और उसके वचन पर मेरी आस लगी रहती है” (भजन 130:5)।

अन्त में, हृदय परमेश्वर के किसी भी भले वरदानों के लिए नहीं, वरन् स्वयं परमेश्वर के लिए लालसा करता है। उसे देखना और जानना और उसकी उपस्थिति में होना प्राण का अन्तिम भोज है। इसके आगे कोई लालसा नहीं है। शब्द पर्याप्त नहीं हैं। हम इसे हर्ष, आनन्द, प्रसन्नता कहते हैं। परन्तु ये शब्द तो उस अकथनीय अनुभव के धुँधले संकेत मात्र हैं:

“मैंने यहोवा से एक वर मांगा है, मैं उसी के यत्न में लगा रहूँगा: कि मैं अपने जीवन भर यहोवा के भवन में ही निवास करने पाऊँ, और उसके मन्दिर में उसका ध्यान करता रहूँ” (भजन 27:4)।

“तेरी उपस्थिति में आनन्द की भरपूरी है; तेरे दाहिने हाथ में सुख सर्वदा बना रहता है” (भजन 16:11)।

“यहोवा में मग्न रह” (भजन 37:4)।