कोरोना वायरस हमारे हृदय की स्थिति के बारे में क्या प्रकट करता है?

महामारी कोविड -19 के प्रकोप ने पूरे संसार में उथल-पुथल मचा दी है। हां, इसकी संक्रामक और विनाशकारी प्रकृति को जानकर हमें इसके प्रभाव के बारे में विचार करना चाहिए। यद्यपि संकट के कारण परमेश्वर के छुटकारा पाए हुए लोगों पर घबराहट और निराशा नहीं प्रबल होनी चाहिए। हम भय का अनुभव कर सकते हैं, परन्तु हमें इससे पराजित नहीं होना चाहिए, इस प्रकार से न ही चिंता और असुरक्षा की स्थिति में रहना चाहिए।

एक बुद्धिमान व्यक्ति
अपने पहाड़ी उपदेश के अन्त में, प्रभु यीशु ने हृदय को भेदने लेने वाले वचन दिए। उसने कहा कि जो कोई मेरे इन वचनों को सुनकर उन पर चलता है, वह उस बुद्धिमान मनुष्य के समान है जिसने अपना घर चट्टान पर बनाया। और मेंह बरसा, बाढ़ें आईं, आंधियों चलीं और उस घर से टकराईं; फिर भी वह नहीं गिरा, क्योंकि उसकी नींव चट्टान पर डाली गई थी। परन्तु जो कोई मेरे इन वचनों को सुनता है और उनका पालन नहीं करता है वह उस मूर्ख के समान है जिसने अपना घर बालू पर बनाया। और मेंह बरसा, बाढ़ें आईं, आंधियां चलीं और उस घर से टकराईं; तब वह गिर पड़ा और पूर्णतः ध्वस्त हो गया। (मत्ती 7:24-27; लूका 6:46-49)

तो, प्रभु यीशु के वचनों का क्या अर्थ है?

यदि हम परमेश्वर के वचन को सुनते रहते हैं, परन्तु उसका पालन नहीं करते हैं, तो जब कठिनाईयां हमारे जीवन में आती हैं तो हम गिर जाएंगे। बिना हृदय से आज्ञाकारिता के मानसिक-ज्ञान संकट के समय स्थिर नहीं रह सकता है। इसके स्थान पर हम एक मूर्ख व्यक्ति की स्थिति को दर्शाते हैं। परन्तु यदि हम परमेश्वर के वचन को सुनते और उसका पालन करते रहें, तो हम जीवन के तूफानों के मध्य में भी एक स्थिर और अडिग जीवन जीएंगे। यही एक बुद्धिमान व्यक्ति का स्वभाव है।

आंधी नींव को निर्बल नहीं करती है परन्तु यह प्रकट करती है कि नींव कितनी अदृढ़ और दृढ़ है।

एक परीक्षा का समय
आंधी नींव को निर्बल नहीं करती है परन्तु यह प्रकट करती है कि नींव कितनी अदृढ़ और दृढ़ है। उसी प्रकार से कोरोना वायरस का आक्रमण भी हृदय को अदृढ़ नहीं बनाता परन्तु हमारे हृदय की सही स्थिति को उजागर करता है। यह हमारी आज्ञाकारिता और वास्तविक ज्ञान के बारे में परमेश्वर के लोगों के लिए एक परीक्षा का समय है।

अपनी पुस्तक “हाउ पीपल चेंज” में, तिमोथी लेन और पॉल डेविड ट्रिप हमें विनम्र सत्य को दिखाते हैं: “परीक्षाएं हमें वह नहीं बनाती हैं जो हम नहीं थे; परन्तु , वे प्रकट करती हैं कि हम अभी तक क्या थे। परीक्षा के कारण जो कटनी होती है वह उस परिणाम के कारण है जिसकी जड़ हमारे हृदय में पहले से ही है।”

तो कोविड -19 महामारी हमें क्या बताती है कि हम परमेश्वर को कितना जानते हैं? परमेश्वर के वचन के प्रति हमारी आज्ञाकारिता के बारे में यह हमें क्या प्रकट करता है, जिसे हम पढ़ते और सुनते आ रहे हैं? यह हमें परमेश्वर के अधिकार और सम्प्रभुता में हमारे विश्वास के बारे में क्या प्रकट करता है? यह हमें इस दु:ख में परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता के बारे में क्या दर्शाता है?

इससे बढ़कर, क्या हम इस भयावह समय में परमेश्वर की शान्ति का अनुभव कर रहे हैं? क्या हम परमेश्वर की देखभाल करने वाले हाथों पर विश्राम कर रहें हैं? क्या हम परमेश्वर की उस शान्ति को जान रहे हैं जो समझ से परे है? क्या हम परमेश्वर की दया भरी सहायता के लिए निरन्तर प्रार्थना कर रहे हैं? और यदि परमेश्वर हमें घर बुलाता है, तो क्या हम मसीह की मृत्यु और पुनरुत्थान के द्वारा अपने अनन्त जीवन के लिए आश्वस्त हैं?

एक जागृति करने वाली बुलाहट
अब तक, कोविड -19 ने हमें यह दिखा दिया होगा कि: परमेश्वर के साथ हमारी घनिष्ठता में कितनी कमी है, परमेश्वर में हमारा विश्वास कितना अदृढ़ है, हम परमेश्वर के वचन का पालन करने की कितनी उपेक्षा करते हैं, हमारे पास अनन्त दृष्टिकोण का कितना अभाव है, और हम वास्तविक परिस्थितियों में परमेश्वर का अनुभव करने से कितने दूर हैं! क्या हम हृदय और मस्तिष्क के बीच बड़े भेद का अनुभव करते हैं?

और जब तक हम परमेश्वर को नहीं जानेंगे (केवल उसके बारे में जानना ही नहीं) कि वह सब कुछ पर सम्प्रभु है, अपने प्रताप में महिमामय है, अपनी सामर्थ्य में पराक्रमी है, और अपनी प्रतिज्ञाओं के प्रति विश्वासयोग्य है-तब तक हम कोविड की आंधी का सामना नहीं कर पाएंगे।

हमें यह जान लेना चाहिए कि उथली भक्ति, अदृढ़ विश्वास और थोड़ा सा ज्ञान परीक्षा के समय स्थिर नहीं रह सकते। भय वास्तविक है। दुख उठाना पीड़ादायक है। मृत्यु भयावह है। और जब तक हम परमेश्वर को नहीं जानेंगे (केवल उसके बारे में जानना ही नहीं) कि वह सब कुछ पर सम्प्रभु है, अपने प्रताप में महिमामय है, अपनी सामर्थ्य में पराक्रमी है, और अपनी प्रतिज्ञाओं के प्रति विश्वासयोग्य है-तब तक हम कोविड की आंधी का सामना नहीं कर पाएंगे।

यह हमारे लिए समय है कि हम प्रतिदिन परमेश्वर में बने रहें, निरन्तर उसके मुख को देखें, अपने पापों को स्वीकार करें, परमेश्वर में अपने विश्वास में बढ़ते जाएं, उसके वचन में सान्त्वना को पाएं, और एक दूसरे को ख्रीष्ट के लहू से क्रय किए गए समुदाय के रूप में प्रोत्साहित करने का अभ्यास करें। हो सकता है कि परमेश्वर कोविड का उपयोग कर के हमें घनिष्ठ रूप से जानने के लिए और आज्ञाकारी रूप से उसके साथ चलने के लिए बुला रहा हो।

आत्मनिरीक्षण के लिए एक बुलाहट
अन्ततः, पहाड़ी उपदेश के अंत में बोले गए प्रभु यीशु के वचनों का सन्दर्भीकृत करते हुए (मत्ती 7:24 -27), मुझे इस प्रकार से कहने दीजिए: प्रत्येक जो मेरे इन वचनों को सुनता है और उनका पालन करता है, वह उस बुद्धिमान व्यक्ति के समान है जिसने चट्टान पर अपना घर बनाया। जब कोरोना वायरस उसके द्वार के निकट आता है या उसके जीवन में तूफान आता है, तो वह स्थिर और अडिग होता है क्योंकि उसने अपना घर चट्टान (आज्ञाकारिता के साथ ज्ञान) पर बनाया है।

परन्तु जो कोई मेरी ये बातें सुनता है और उन पर चलता नहीं, वह उस मूर्ख मनुष्य के समान है, जिस ने अपना घर बालू पर बनाया। जब कोरोना वायरस उसके द्वार के निकट आता है या उसके जीवन में आंधी आती है, तो वह डर से हिल जाता है और निराशा में गिर जाता है क्योंकि उसने अपना घर रेत (बिना आज्ञाकारिता के मानसिक-ज्ञान) पर बनाया है)।

महामारी कोविड -19 हमारे हृदय की स्थिति के बारे में क्या बताती है? आइए अपने हृदय का आत्मनिरीक्षण करें और स्वयं को परमेश्वर-विवेकी, ख्रीष्ट-केंद्रित, सुसमाचार-चलित, बाइबल से ओत-प्रोत और आत्मा से भरे सामुदायिक जीवन जीने के लिए प्रतिबद्ध करें।


यह लेख ‘एक्विप इण्डियन चर्चस’ पर प्रकाशित लेख से अनुवादित किया गया है, जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं:https://equipindianchurches.com/blog/what-does-coronavirus-reveal-about-the-condition-of-our-heart/