असफलताओं का भविष्य
<a href="" >जॉन पाइपर द्वारा भक्तिमय अध्ययन</a>

संस्थापक और शिक्षक, desiringGod.org

“डरो मत। तुमने यह सब बुराई तो की है, फिर भी यहोवा के पीछे चलना मत त्यागो, परन्तु अपने सम्पूर्ण हृदय से यहोवा की उपासना करो। और तुम कदापि न हटना। अन्यथा व्यर्थ वस्तुओं के पीछे जाओगे जो न लाभ पहुँचा सकती हैं और न छुड़ा सकती हैं क्योंकि वे व्यर्थ हैं। यहोवा तो अपने महान् नाम के कारण अपनी प्रजा को नहीं त्यागेगा क्योंकि उसे यह भला लगा कि वह तुम्हें अपनी निज प्रजा बनाए।” (1 शमूएल 12:20–22)

जब इस्राएलियों में भय समा गया और उन्होंने शमूएल से अन्य राष्ट्रों के समान अपने लिए भी एक राजा की माँग करने के अपने पाप से पश्चाताप किया, तब एक शुभ समाचार आया: “डरो मत। तुमने यह सब बुराई तो की है।” क्या आप सुन पा रहे हैं कि यह कितना उल्टा सुनाई देता है — बहुत ही उत्तम रीति से उल्टा। सम्भवतः आप उससे यह अपेक्षा कर रहे थे कि वह कहेगा, “डरो, क्योंकि तुमने यह सब बुराई तो की है।” यह डरने के लिए तो एक उचित कारण होता: तुमने परमेश्वर के स्थान पर एक अन्य राजा की माँग करने की यह बड़ी बुराई की है! परन्तु शमूएल यह नहीं कहता है। इसके विपरीत वह कहता है कि, “डरो मत। तुमने यह सब बुराई तो की है।”

वह आगे कहता है, “फिर भी यहोवा के पीछे चलना मत त्यागो, परन्तु अपने सम्पूर्ण हृदय से यहोवा की उपासना करो। और तुम कदापि न हटना। अन्यथा व्यर्थ वस्तुओं के पीछे जाओगे जो न लाभ पहुँचा सकती हैं और न ही छुड़ा सकती हैं क्योंकि वे व्यर्थ हैं।”

यही सुसमाचार है: यद्यपि तुमने बहुतायत से पाप किया है, और बड़ी ही भद्दी रीति से प्रभु का निरादर किया है, यद्यपि अब तुम्हारे पास एक राजा है जिसकी माँग करना स्वयं में एक पाप है, और यद्यपि इस पाप को या उसके आने वाले पीड़ादायक परिणाम को पलटा नहीं जा सकता है, फिर भी एक भविष्य है और एक आशा है। तुम्हारे लिए अनुग्रह है।

डरो मत! डरो मत!

और इसके बाद वह बड़ा कारण आता है — जो 1 शमूएल 12:20–22 में सुसमाचार के लिए—एक आधार है और एक नींव है । जबकि तुमने यह सब बुराई की है, तो तुम्हें डरना की आवश्यकता क्यों नहीं है? क्योंकि “यहोवा तो अपने महान नाम के कारण अपनी प्रजा को नहीं त्यागेगा क्योंकि उसे यह भला लगा कि वह तुम्हें अपनी निज प्रजा बनाए।”

सुसमाचार का आधार ही परमेश्वर का अपने स्वयं के नाम के प्रति समर्पण है। क्या आप ने इसे सुना? डरो मत, यद्यपि तुमने पाप किया है, “यहोवा तो अपने महान नाम के कारण अपनी प्रजा को नहीं त्यागेगा।” इस बात का आप के हृदय पर दो प्रकार से प्रभाव पड़ना चाहिए: मर्मभेदी दीनता और उत्साह से भर देने वाला आनन्द। दीनता इसलिए क्योंकि आप के उद्धार की नींव आप स्वयं नहीं हैं। आनन्द इस कारण है क्योंकि आप का उद्धार उतना ही निश्चित है जितना अपने नाम के प्रति परमेश्वर की निष्ठा निश्चित है। यह बात इस से अधिक निश्चित नहीं हो सकती है। 

यदि आप इस प्रकार के और भी संसाधन पाना चाहते हैं तो अभी सब्सक्राइब करें

"*" indicates required fields

पूरा नाम*