भटकने का भय
<a href="" >जॉन पाइपर द्वारा भक्तिमय अध्ययन</a>

संस्थापक और शिक्षक, desiringGod.org

तेरी भलाई कितनी महान है, जो तू ने अपने भय मानने वालों के लिए संचित कर रखी है, और मनुष्यों के सामने उन पर की है जो तेरी शरण में आते हैं। (भजन 31:19)

भजन संहिता 31:19 से दो महत्वपूर्ण सत्यों पर ध्यान दें। 

1. परमेश्वर की भलाई

परमेश्वर की एक विशिष्ट  भलाई है। अर्थात्, न केवल परमेश्वर की वह समान्य  भलाई जिसे वह सब लोगों पर तब दिखाता है, जब वह सूर्य को भलों और बुरों दोनों पर उदय करता है (मत्ती 5:45), परन्तु एक विशिष्ट भलाई भी है, जो इस भजन के अनुसार उसके “भय मानने वालों” के लिए है।

यह भलाई मापे जाने की क्षमता से बढ़कर कहीं अधिक महान है। यह अन्तहीन है। यह सर्वदा के लिए बनी रहती है। यह सर्व-व्यापक है। उसके भय मानने वालों के लिए केवल  भलाई ही भलाई है। सब बातें  उनकी भलाई को उत्पन्न करती हैं (रोमियों 8:28)। रोमियों 5:3-5 के अनुसार उनके क्लेश भी लाभ से भरे हुए हैं।

परन्तु जो लोग उसका भय नहीं मानते हैं, वे एक अस्थाई भलाई को प्राप्त करते हैं। रोमियों 2:4-5 इसे इस प्रकार से वर्णित करता है: “या तू उसकी कृपा, सहनशीलता और धैर्य-रूपी धन को तुच्छ जानता है, और नहीं जानता कि परमेश्वर की कृपा तुझे मन-परिवर्तन की ओर ले आती है? परन्तु अपने हठीले और अपरिवर्तित मन के कारण तू परमेश्वर के प्रकोप के दिन के लिए और उसके सच्चे न्याय के प्रकट होने तक, अपने लिए क्रोध संचित कर रहा है।” कृपा। सहनशीलता। धैर्य। दया। भलाई। परन्तु इसका प्रत्युत्तर परमेश्वर के भय के स्थान पर हठीपन होता है।

तो यह प्रथम सत्य है: परमेश्वर की भलाई।

2. परमेश्वर का भय

परमेश्वर का भय मानना, उससे भटक जाने का भय है। इसलिए, यह परमेश्वर में शरण लेने में स्वयं को अभिव्यक्त करता है। यही कारण है कि भजन 31:19 में दो  स्थितियों का उल्लेख है — प्रभु का भय मानना और उसमें शरण लेना। “तेरी भलाई कितनी महान है, जो तू ने (1) अपने भय मानने वालों के लिए संचित कर रखी है, और (2) मनुष्यों के सामने उन पर की है जो तेरी शरण में आते हैं।

ये परस्पर विरोधी प्रतीत होते हैं। भय  प्रतीत होता है कि वह हमें परमेश्वर से भगाता है, और शरण लेना  उसकी ओर खींचता हुआ प्रतीत होता है। परन्तु जब हम देखते हैं कि यह भय तो भाग जाने का भय है — उससे भटक जाने का भय — तब वे दोनों एक साथ कार्य करते हैं।

सन्तों के हृदयों में एक वास्तविक कम्पन है। “डरते और काँपते हुए अपने उद्धार का काम पूरा करते जाओ” (फिलिप्पियों 2:12)। परन्तु यह वह कम्पन है जिसे एक ऐसे पिता के हाथों में अनुभव किया जाता है जिसने तुरन्त ही अपने बच्चे को समुद्र की लहरों से सुरक्षित निकाला हो। यह उस विचार की सम्भावना के प्रति कम्पन है कि हमें एक पिता की आवश्यकता ही नहीं है।

इसलिए, प्रभु की भलाई को संजोएँ। उससे भटक जाने से भय खाएँ। प्रत्येक पाप से भागें और उसमें शरण लें। “तेरी भलाई कितनी महान है, जो तू ने अपने भय मानने वालों के लिए संचित कर रखी है, और मनुष्यों के सामने उन पर की है जो तेरी शरण में आते हैं।”

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