कलीसियाई आराधना में किन बातों का होना आवश्यक है?

रविवार को जब विश्वासी सामूहिक रूप से आराधना के लिए इकट्ठा होते हैं, तो उनका उद्देश्य होता है कि कलीसियाई रीति से परमेश्वर की आराधना उत्तम रीति से करें। किन्तु क्या आपने विचार किया है कि कलीसिया में जब आराधना के लिए हम जाते हैं तो वास्तव में कलीसिया में क्या महत्वपूर्ण बाते हैं जिनका आराधना में होना आवश्यक है? आइये हम छ: महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान दें जो हमारी कलीसियाई आराधना को वचन के आधार पर समझने एवं करने में आवश्यक है।

1. वचन आधारित प्रार्थना प्रार्थना ख्रीष्टीय जीवन का महत्वपूर्ण भाग है। हम व्यक्तिगत रूप से प्रार्थना करते हैं और जब विश्वासियों के साथ इकट्ठे होते हैं तो कलीसियाई रीति से प्रार्थना में समय व्यतीत करते हैं। आरम्भिक कलीसिया में जब विश्वास इकट्ठे होते थे, तो वे प्रार्थना करने में समय व्यतीत करते थे। परमेश्वर ने ख्रीष्ट के द्वारा जो उनके जीवन में किया था, उसके कारण वे परमेश्वर की प्रशंसा करते, धन्यवाद देते तथा अपनी विनतियों को प्रभु के सम्मुख रखते थे। 

प्रेरितों के काम 2:42 स्पष्ट करता है कि जब आरम्भिक कलीसिया के लोगों ने विश्वास किया तो कलीसिया में सम्मिलित होकर प्रार्थना करने में लवलीन रहते थे। प्रार्थना हमारा परमेश्वर के प्रति निर्भरता को प्रदर्शित करता है। कलीसिया ख्रीष्ट की देह है और कलीसिया का सिर ख्रीष्ट है। इसलिए कलीसिया ख्रीष्ट पर आश्रित है और उसके द्वारा परमेश्वर के सम्मुख हमारी पहुँच है। हमारी प्रार्थना पवित्रशास्त्र से ओत-प्रोत होनी चाहिए। जिसमें हम परमेश्वर की स्तुति, धन्यवाद, एवं अपनी विनतियों को उसके सम्मुख रख सकते हैं। 

2. वचन आधारित प्रचार एवं शिक्षा- आराधना पवित्रशास्त्र द्वारा संचालित होती है। कलीसियाई आराधना में परमेश्वर के सत्य वचन की उद्घोषणा की जाती है। इसलिए पौलुस तीमुथियुस को निर्देश देता है कि वह पवित्रशास्त्र पढ़कर सुनाने में लगा रहे (1 तीमुथियुस 4:13)। जब हम आराधना के लिए इकट्ठे होते हैं तो हमारा केन्द्र बिन्दु उनकी अपनी सोच, उनकी साक्षी, उनके अनुभव या केवल गीत नहीं है वरन पवित्रशास्त्र अर्थात परमेश्वर का वचन है। पवित्रशास्त्र परमेश्वर के गुणों को स्पष्ट करता है। वर्तमान समय में कलीसियाओं का आत्मिक जीवन गिरता जा रहा है एवं स्वस्थ्य कलीसियाओं का अभाव है। इसके पीछे प्राय: यह कारण देखने को मिलता है कि वचन का सही प्रचार न होने से लोग सही सिद्धान्तों में नहीं बढ़ सकते। हमें स्मरण रखना है कि आराधना में वचन का प्रचार केन्द्र बिन्दु है जिसके द्वारा हम परमेश्वर की इच्छा को जानते हैं। 

वचन हमारे जीवन का केन्द्र है इसीलिए पौलुस तीमुथियुस को निर्देश देता है, “कि वचन का प्रचार कर, समय और असमय तैयार रह, बड़े धैर्य से शिक्षा देते हुए ताड़ना दे, डांट और समझा’ (2 तीमुथियुस 4:2)। वचन का प्रचार हमारे लिए बहुत आवश्यक है क्योंकि “सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है और शिक्षा, ताड़ना, सुधार और धार्मिकता की शिक्षा के लिए उपयोगी है, जिससे कि परमेश्वर का भक्त प्रत्येक भले कार्य के लिए कुशल और तत्पर हो जाए” (2 तीमुथियुस 3:16-17)। जब कोई भी हमारी कलीसिया आता है तो ऐसा होना चाहिए कि वह इस बात को समझे कि हमारी कलीसिया परमेश्वर के वचन को गम्भीरता से लेती है और हमें भी उनसे यही अपेक्षा करनी चाहिए कि वे भी परमेश्वर के वचन को गम्भीरता से लें। 

3.  वचन आधारित गीत– परमेश्वर के लोग हमेशा से गीत गाने वाले लोग रहे हैं। पूरे पवित्रशास्त्र में हम देखते हैं कि परमेश्वर के लोग संसार में परमेश्वर एवं उसके कार्यों को गीत के माध्यम से प्रकट करते हैं। पवित्रशास्त्र आधारित भजन या गीत हमें उन सत्यों को प्रकट करने के लिए शब्द देते हैं जिन पर हम विश्वास करते हैं। ये हमें दूसरों तक उन सत्यों को पहुँचाने के लिए मार्ग प्रदान करते हैं। पुराने नियम से नये नियम में हम परमेश्वर के लोगों को परमेश्वर की आराधना के लिए गीत गाते हुए देखते हैं। जब परमेश्वर के लोग मन्दिर में आराधना के लिए मिलते थे तो वे भजन गाने के द्वारा आराधना करते थे। जो आराधना के मुख्य भागों में से एक था। 

नये नियम में पौलुस आरम्भिक कलीसिया में विश्वासियों को परमेश्वर की महिमा के लिए गीत गाने के लिए प्रोत्साहित करता है, “….आत्मा से परिपूर्ण होते जाओ, और आपस में भजन, स्तुति-गान व आत्मिक गीत गाया करो, और अपने अपने मन में प्रभु के लिए गाते तथा कीर्तन करते रहो। सदैव सब बातों के लिए हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम में परमेश्वर पिता को धन्यवाद दो” (इफिसियों 5:18-21)। प्रभु के द्वारा किये गए छुटकारे के कार्य  के लिए गीत के माध्यम से हम उसकी आराधना करते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि वर्तमान में कलीसियाएं परमेश्वर के वचन के आधार पर गीतों को गाएं, सुसमाचार केन्द्रित, एवं परमेश्वर के गुणों को प्रदर्शित करने वाले भजन गाएं। 

4.  वचन आधारित विधियाँ– कलीसियाई विधियों में वचन के अनुसार हमारे पास केवल दो विधि बपतिस्मा और प्रभु-भोज है। नये नियम में कलीसिया में इन्हीं दो विधियों का पालन होता था। 

बपतिस्मा उन लोगों के लिए है जो यीशु पर विश्वास कर यह घोषणा करते हैं कि वे ख्रीष्ट के हैं, तथा प्रभु भोज उनके लिए है जो ख्रीष्ट के परिवार के हैं। बपतिस्मा हमारे हृदय में हुए उद्धार के कार्य का बाहरी प्रमाण है और प्रभु भोज के द्वारा हम ख्रीष्ट में बने रहते हैं। आरम्भिक कलीसिया का वर्णन करते हुए लेखक लूका वर्णन करता है कि, “जिन लोगों ने सुसमाचार सुना, अपने पापों से पश्चाताप किया उन्होंने बपतिस्मा लिया (प्रेरितों के काम 2:37-41)। बपतिस्मा ख्रीष्टीय होने का बाहरी प्रमाण है। जिसमें हम यह प्रकट करते हैं कि हम यीशु के साथ मरे और जी उठे हैं और हम अब उसके एवं उसके परिवार के अंग हैं।

प्रभु यीशु ख्रीष्ट ने क्रूसीकरण से पहले अन्तिम भोज में प्रभु-भोज का उदाहरण प्रस्तुत किया। “जब वे भोजन कर रहे थे, यीशु रोटी ली और आशिष मांगकर तोड़ी और चेलों को देकर कहा, “लो, खाओ; यह मेरी देह है।” फिर उसने प्याला लेकर धन्यवाद दिया और उन्हें देते हुए कहा, “तुम सब इसमें से पियो, क्योंकि यह वाचा का मेरा वह लहू है जो बहुत लोगों के निमित्त पापों की क्षमा के लिए बहाया जाने को है”(मत्ती 26:26-27)। यीशु ख्रीष्ट के बलिदान को स्मरण करते हुए आरम्भिक कलीसिया से अब तक प्रभु भोज की विधियों का पालन किया जाता है। प्रभु भोज हम यीशु की मृत्यु को स्मरण करने के लिए करते हैं। इसके साथ ही यह आत्मिक पारिवारिक भोज है जिसमें केवल यीशु के लहू द्वारा बचाए गए उसके लोगही सम्मिलित होते हैं। 

5.  वचन आधारित भेंट – परमेश्वर अपने अनुग्रह में हमें सब कुछ उपलब्ध कराता है। उसने यीशु ख्रीष्ट के द्वारा हमारा उद्धार किया, और भली वस्तुओं से हमें तृप्त किया है। इस कारण जब आरम्भिक कलीसिया में लोग इकट्ठे होते थे तो वे अपना धन कलीसियाई सेवा हेतु देने के द्वारा परमेश्वर की उपासना करते थे।यह स्वेच्छा से एवं उदारता से कृतज्ञतापूर्ण होती है। पुराने नियम में भी परमेश्वर के लोग अपनी वस्तुओं को परमेश्वर के भवन में अर्पित करते थे, जो परमेश्वर के लिए होता था। 

उसी तरह अभी भी जब हम कलीसियाई रीति से मिलते हैं, तो हम अपना धन प्रभु की सेवा के लिए देते हैं। और यह सब हम उसकी बढ़ाई के लिए करते हैं, “क्योंकि उसी की ओर से, उसी के द्वारा और उसी के लिए सब कुछ है। उसी की महिमा युगानुयुग होती रहे। आमीन” (रोमियों 11:36)। जब हम उदारता के साथ देते हैं, तो हम परमेश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रदर्शित करते हैं। ( नये नियम के लेखक कलीसियाओं को प्रभु के राज्य की बढ़ोत्तरी हेतु उदारता से देने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। 2 कुरिन्थियों 9:11-15; इब्रानियों 13:16; रोमियों 12:13; 1 कुरिन्थियों 16:1-4)

6. वचन आधारित संगति- ख्रीष्टीयों के जीवन में कलीसियाई आराधना विशेष महत्व रखता है। परमेश्वर का वचन ख्रीष्टियों की संगति का आधार है। विश्वासी जब इकट्ठे होते हैं तो वे वचन पढ़ने, प्रार्थना करने, कलीसियाई विधियों में सहभागी होनें, प्रचार सुनने, भेंट देने के द्वारा परमेश्वर की महिमा करते हैं। किन्तु यहीं पर सब कुछ समाप्त नहीं होता है! विश्वासियों के मध्य संगति का बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। हमारे संगति में परमेश्वर के वचन का आदर किया जाना चाहिए। हमारी बातें, प्रोत्साहन का केन्द्र वचन होना चाहिए।

रविवार को प्रचार के बाद कलीसिया, जो आत्मिक परिवार है, इस आत्मिक परिवार में लोग एक साथ मिलते है और उसके साथ ही एक-दूसरे के साथ वचन के विषय में बात करते हैं। परमेश्वर ने हमें बनाया है कि हम आराधकों की मण्डली में संगति करें। संगति ख्रीष्ट में हमारे भाई एवं बहनों के साथ सुसमाचार में सम्बन्ध को दृढ़ करती है जो पाप से लड़ रहे हैं। कलीसियाई संगति में हम दूसरे विश्वासियों को पवित्रता का पीछा करने एवं अपने जीवन से यीशु ख्रीष्ट को प्रदर्शित करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। (प्रेरितों के काम 2:42, 20:4, 20)

अन्त में, आइये हम स्मरण रखें कि जब हम कलीसियाई आराधना के लिए मिलते हैं तो हम वचन के अनुसार आराधना करने को गम्भीरता से लें। परमेश्वर ने स्वयं इस बात को अपने वचन में स्पष्ट किया है कि हमें आराधना उसकी इच्छा के अनुसार करना चाहिए। इसलिए हम जब कलीसियाई रीति से परमेश्वर की आराधना के लिए इकट्ठे हों, तो आइये हम परमेश्वर के वचन को गाएं, वचन को पढ़ें, वचन अनुसार प्रार्थना करें, वचन अनुसार कलीसियाई विधियों को करें और वचन के संगति करने के द्वारा परमेश्वर की प्रशंसा करें। 

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