बलिदान होने वालों के लिए परमेश्वर की योजना
<a href="" >जॉन पाइपर द्वारा भक्तिमय अध्ययन</a>

संस्थापक और शिक्षक, desiringGod.org

उनमें से प्रत्येक को श्वेत चोगा दिया गया, और उनसे कहा गया, “थोड़ी देर तक और विश्राम करो, जब तक कि तुम्हारे संगी दासों और भाईयों की, जो तुम्हारे सदृश वध होने वाले हैं, गिनती पूरी न हो जाए।” (प्रकाशितवाक्य 6:11)

लगभग तीन सौ वर्ष तक, ख्रीष्टीयता उस मिट्टी में बढ़ी है जो मिट्टी बलिदान होने वालों के लहू से गीली हुई थी । 

सम्राट ट्रॉजन (Trajan) के शासनकाल (लगभग 98 ईसवी) तक सताव की अनुमति तो थी किन्तु वह वैधानिक नहीं थी। ट्रॉजन से लेकर डेसियस (Decius) के शासनकाल (लगभग 250 ईसवी) तक सताव संवैधानिक रीति से मान्य था। डेसियस जो ख्रीष्टियों से घृणा करता था और अपने सुधार कार्यों पर उनके प्रभाव से डरता था, उसके समय से लेकर 311 में सहिष्णुता की प्रथम राजविज्ञप्ति तक, सताव न केवल संवैधानिक रीति से मान्य था वरन् यह व्यापक और प्रचलित था।

एक लेखक ने सताव की इस तीसरी अवधि में परिस्थिति का वर्णन इस प्रकार से किया है:

प्रत्येक स्थान पर मण्डलियों में आतंक फैल चुका था; और विश्वास से पीछे हटने वालों [वे लोग जिन्होंने धमकी देने पर अपना विश्वास त्याग दिया] . . . की संख्या बहुत अधिक थी। यद्यपि, ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं थी जो अपने विश्वास में दृढ़ बने रहे, और झुकने अर्थात् विश्वास त्यागने के स्थान पर उन्होंने बलिदान होना स्वीकार किया; तथा जैसे-जैसे सताव व्यापक और तीव्र होता गया, ख्रीष्टियों का उत्साह और उनके प्रतिरोध करने की शक्ति दिन-प्रतिदिन दृढ़ होती गई।

अतः, पहली तीन शताब्दियों तक, एक ख्रीष्टीय होना आपके जीवन और आपकी सम्पत्ति तथा परिवार के लिए अत्यधिक जोखिम भरा कार्य था। यह इस बात की परीक्षा थी कि आप किससे अधिक प्रेम करते हैं। और बलिदान होना उस परीक्षा का चर्मोत्कर्ष था।

और बलिदान होने की घटना के ऊपर एक सम्प्रभु परमेश्वर था जिसने कहा कि बलिदान होने वालों की एक नियत संख्या है। कलीसिया को रोपने और उसे सशक्त बनाने में उनकी विशेष भूमिका है। शैतान का मुँह बन्द करने में उनकी एक विशेष भूमिका है, जो निरन्तर यह कहता है कि परमेश्वर के लोग उसकी (शैतान की) सेवा केवल इसलिए करें क्योंकि जीवन पहले से अच्छा हो जाएगा। अय्यूब 1:9-11 की यही मुख्य बात है।

बलिदान हो जाना कोई आकस्मिक घटना नहीं है। यह परमेश्वर को चौंका नहीं देता है। यह अनपेक्षित नहीं है। और यह निश्चय रूप से ख्रीष्ट के लिए एक रणनीतिक पराजय नहीं है।

यह पराजय के जैसा प्रतीत हो सकता है। किन्तु यह स्वर्ग की एक योजना का भाग है जिसकी कोई भी मानव रणनीतिज्ञ कभी भी कल्पना नहीं कर पाएगा अथवा कभी भी रच नहीं सकता है। और यह योजना उन सभी के लिए विजयी होगी जो परमेश्वर के सर्व-पर्याप्त अनुग्रह में विश्वास के द्वारा अन्त तक धीरज रखते हैं।

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