हमारा अवर्णनीय सौभाग्य
जॉन पाइपर द्वारा भक्तिमय अध्ययन

जॉन पाइपर द्वारा भक्तिमय अध्ययन

संस्थापक और शिक्षक, desiringGod.org

परमेश्वर ने मूसा से कहा, “मैं जो हूँ सो हूँ।” (निर्गमन 3:14)

“मैं जो हूँ सो हूँ” इस भव्य नाम का एक निहतार्थ यह है कि यीशु ख्रीष्ट में यह असीमित, परम, स्व-निर्धारक परमेश्वर हमारे समीप आ गया है।

यूहन्ना 8:56-58 में, यीशु यहूदी अगुवों की आलोचनाओं का उत्तर दे रहा है। वह कहता है, “तुम्हारा पिता अब्राहम मेरा दिन देखने की आशा से आनन्दित हुआ। उसने देखा भी, और मग्न हुआ।” इस पर यहूदियों ने उससे कहा, “तू अभी पचास वर्ष का भी नहीं। क्या तू ने अब्राहम को देखा है?” यीशु ने उनसे कहा, “मैं तुमसे सच सच कहता हूँ कि इससे पहिले कि अब्राहम उत्पन्न हुआ, मैं हूँ।”

क्या यीशु अपने मुख से इन शब्दों से अधिक महिमामय शब्दों को बोल सकता था? जब यीशु ने कहा, “इससे पहले कि अब्राहम उत्पन्न हुआ, मैं हूँ” तो उसने परमेश्वर के नाम के सम्पूर्ण अद्भुत सत्य को लिया, उसने सेवाभाव की नम्रता में उसे लपेटा, और हमारे सम्पूर्ण विद्रोह के प्रायश्चित्त के रूप में स्वयं को दे दिया, और हमारे लिए इस असीमित, परम और स्व-पर्याप्त परमेश्वर की महिमा को बिना किसी भय के देखने हेतु मार्ग बनाया।

यीशु ख्रीष्ट में, हम जो परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं, हमें यहोवा को — मैं जो हूँ सो हूँ है—अपना पिता परमेश्वर करके जानने का अवर्णनीय सौभाग्य प्राप्त है:  

  • जो अस्तित्व में है
  • जिसका व्यक्तित्व तथा सामर्थ्य केवल उसी के कारण है
  • जो कभी परिवर्तित नहीं होता है
  • जिससे सम्पूर्ण सृष्टि में ऊर्जा की शक्ति का प्रवाह होता है
  • और जिसके अनुरूप सम्पूर्ण सृष्टि को अपने जीवन को ढालना चाहिए।

परमेश्वर करे कि जो लोग परमेश्वर के नाम को जानते हैं, वे उस पर भरोसा रखे रहें (भजन 9:10)।