स्मरण दिलाने हेतु संघर्ष
<a href="" >जॉन पाइपर द्वारा भक्तिमय अध्ययन</a>

संस्थापक और शिक्षक, desiringGod.org

“परन्तु मैं इस पर सोचता रहता हूँ, इसलिए मेरी आशा बनी रहती है: यहोवा की करुणा के कारण हम मिट नहीं गए, उसकी दया तो अनन्त है।” (विलापगीत 3:21–22)

आशा के महान शत्रुओं में से एक है, परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को भूलना । स्मरण दिलाना एक महान सेवकाई है। पतरस और पौलुस दोनों ने कहा कि उन्होंने इसी कारण से पत्रियाँ लिखी थीं (2 पतरस 1:13; रोमियों 15:15)।

जो कुछ हमें जानने की आवश्यकता है उसे हमें स्मरण दिलाने में मुख्य सहायक पवित्र आत्मा है (यूहन्ना 14:26)। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि आप निष्क्रिय हो जाएँ। आप केवल अपने स्वयं को स्मरण दिलाने की सेवा हेतु उत्तरदायी हैं। और सबसे पहले आपके द्वारा जिनको स्मरण दिलाए जाने की आवश्यकता है, वह आप स्वयं है।

मन के पास यह महान शक्ति है: स्मरण के माध्यम से यह स्वयं से बात कर सकता है। मन “मन को पुकार” सकता है, जैसा कि खण्ड कहता है: “परन्तु मैं इस बात पर सोचता हूँ, और इसलिए मेरी आशा बनी रहती है: यहोवा की करुणा के कारण हम मिट नहीं गए” (विलापगीत 3:21-22)।

जो कुछ परमेश्वर ने अपने विषय में और हमारे विषय में कहा है यदि हम उस पर नहीं “सोचते हैं”, तो हम क्षीण हो जाते हैं। ओह, मैं इस बात को कैसे, पीड़ादायक अनुभव द्वारा जानता हूँ! अपने मस्तिष्क में ईश्वरविहीन विचारों के दलदल में मत पड़े रहिए। इस प्रकार के विचार जैसे कि: “मैं नहीं कर सकता . . .” “वह नहीं करेगी . . .” “वे कभी नहीं . . .” “यह कभी काम नहीं किया . . .”

बात यह नहीं  है कि ये सत्य हैं या असत्य। आपका मन सदैव उन्हें सच करने का उपाय खोज लेगा, जब तक कि आप अपने मन में किसी और बड़ी बात के विषय में नहीं “सोचेंगे”। परमेश्वर असम्भव का परमेश्वर है। एक असम्भव स्थिति से बाहर निकलने के लिए तर्क करना उतना प्रभावशाली नहीं है जितना कि स्वयं को यह स्मरण दिलाना कि परमेश्वर असम्भव कार्य करता है।

स्वयं को परमेश्वर की महानता और अनुग्रह और शक्ति और बुद्धि को स्मरण कराए ​बिना, हम निर्बुद्धि निराशावाद में डूब जाते हैं। “मैं निर्बुद्धि और नासमझ था; मैं तो तेरे सम्मुख जानवर ही था” (भजन 73:22)।

भजन 77 में निराशा से आशा की ओर महान परिवर्तन इन शब्दों के साथ आता है: “मैं याह के कामों को स्मरण  करूँगा; निश्चय, मैं प्राचीनकाल के तेरे अद्भुत कार्यों को स्मरण  करूँगा। जो कुछ तू ने किया है मैं उस पर ध्यान करूँगा । और तेरे कार्यों पर मनन  करूँगा” (भजन 77:11-12)।

यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष है, मैं मानकर चल रहा हूँ कि आपका संघर्ष भी यही है। स्मरण दिलाने हेतु संघर्ष! पहले स्वयं को। उसके पश्चात दूसरों को।

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